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कितना सफल रहा महासभा का आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण

अ.भा. माहेश्वरी महासभा द्वारा इस सत्र में सम्पूर्ण समाज की जानकारी जुटाने के लिए आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण करवाया गया। इसका लक्ष्य समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के आंकड़ें जुटाकर उनके लिए योजनाएँ बनाना तो था ही, साथ ही इसे समाजजनों की पहचान बनाकर मतदान के अधिकार से भी जोड़ा गया। इसकी पूर्णता के बाद कई प्रश्न खड़े हो गए हैं। क्या यह सर्वेक्षण सम्पूर्ण समाज तक पहुँच पाया? क्या इससे आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को लाभ पहुँच पाएगा? क्या इसे पूर्ण पारदर्शी ढंग से किया गया? इन सभी उत्तरों के आधार पर ही तय किया जा सकता है कि कितना सफल रहा ‘आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण’? आईये जाने, इस स्तम्भ की प्रभारी मालेगांव निवासी सुमिता मूंदरा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।

बिना रूपरेखा के कारण असफल
-सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा ने बड़े नेक दिल से माहेश्वरी समाज के उत्थान के लिए आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण करवाया। जिसका उद्देश्य एक-एक समाजबंधु से जुड़ने के साथ-साथ समाज के कमजोर वर्ग को आर्थिक संबल प्रदान करना था। महासभा का सर्वेक्षण कराने का निर्णय दूरदर्शिता और सूझ-बूझ भरा था। निश्चित ही इसकी सफलता माहेश्वरी समाज के लिए हितकारी साबित होती। पर आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण की यथोचित रूपरेखा तैयार नहीं होने के कारण ही यह पूर्णतः सफल नहीं हो पाया। पूरे विश्व इतिहास में माहेश्वरी अपने एडमिनिस्ट्रेशन और मैनेजमेंट का लोहा मनवाता है, पर अपने ही कार्यक्षेत्र में वह खरा नहीं उतर पाया। इसके अंदरुनी कारणों से तो हम जैसे आम समाजबंधु अवगत नहीं हैं और सर्वेक्षण प्रतिनिधिमंडल के ऊपर उंगलियां उठाकर हम अपना विरोध जता रहे हैं। हर बड़े कार्य में कुछ ना कुछ खामियां तो रह ही जाती हैं फिर यह तो इस विशाल माहेश्वरी समाज का लेखा-जोखा एकत्र करने जैसा अथाह कार्य था पर इतना मुश्किल भी नहीं था। आज भी आधुनिक तकनीक और स्थानीय संगठनों की मदद से यह सर्वेक्षण शत-प्रतिशत सफल हो सकता है। समाज के आर्थिक-समाजिक सर्वेक्षण का उत्तम विचार महासभा लेकर आई, योजना के तहत प्रसारित पारिवारिक सर्वेक्षण के फॉर्म जिन स्थानों पर घर-घर जाकर वितरित किए गए थे, वो भी बंधुओं से भरकर वापिस जमा नहीं किए। अगर सभी समाजबंधु अपना सामाजिक-कर्तव्य समझकर इसमें अपना सहयोग देते तो भी यह कार्य आसान बन जाता। भले ही देर हो गई हो पर सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कार्य आज भी हमारे माहेश्वरी समाज की सबसे बड़ी जरूरत है।

चुनाव उचित या अनुचित

इसका उचित प्रचार-प्रसार नहीं हुआ
-रमेश काबरा

अखिल भारतीय माहेश्वरी महासभा द्वारा इस सत्र में आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण करने का ढिंढोरा पीटा गया था। इसका उद्देश्य महासभा के निर्धन परिवारों को आर्थिक मदद करना घोषित किया गया था। लेकिन सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण को मतदाता सूची से जोड़ना आश्चर्यजनक कदम था। बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि यह आर्थिक सर्वेक्षण था या महासभा की जनसंख्या का। नाम के हिसाब से तो ऐसा लग रहा है कि यह आर्थिक सर्वेक्षण है और जिन समाजबंधुओं को कुछ मदद की जरूरत है, वे अपने को रजिस्टर करें यह इको सर्वे अभी आधा अधूरा ही था कि इसे समाज पर थोप दिया गया व मताधिकार से वंचित किया गया जो कतई उचित नहीं। इसके लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं किए गए। सिर्फ सोशल मीडिया द्वारा ही इसका प्रचार-प्रसार करके इसकी खानापूर्ति कर दी गई।

उद्देश्यों पर सफल नहीं हुआ
-अनिता मंत्री, अमरावती

पिछले दो-तीन वर्षों से सर्वेक्षण कार्य समाज में किया गया है। सामान्य जानकारी में नाम, पता, पारिवारिक विवरण, जन्म, स्थान, व्यापार-व्यवसाय, शिक्षा आदि विषयों पर जानकारी एकत्रित करने का कार्य तालुका अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और प्रदेशाध्यक्षों के जिम्मे था। मान लो एक शहर में चार हजार परिवार हैं तो वहां चार हजार फॉर्म आए या नहीं, यह देखना भी तो अनिवार्य था। हर कार्य सही पद्धति से करते हैं, तो फिर सामाजिक सर्वेक्षण का कार्य क्यों नहीं किया गया? सर्वेक्षण में अवलोकन, प्रश्नावली और साक्षात्कार होना जरूरी है। समाज के निम्न स्तर पर जीवन यापन कर रहे समाज के नागरिक से शुरुआत होना चाहिए थी। सर्वेक्षण क्षेत्रों का चयन कर समाज के कार्यकर्ताओं को उनकी जिम्मेदारी देना अनिवार्य थी। इस कार्य का पूरा ब्योरा लेने की जिम्मेदारी समाज के वरिष्ठ पद पर बैठे व्यक्ति की थी, लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं है। सभी समाजसेवी मंच पर भाषण, फोटो आदि दिखावे में जुटे हैं। जो सर्वे फॉर्म वितरित किए गए हैं, वे समाज के आम नागरिक तक पहुंचे ही नहीं। इसके लिए एक एप भी बनाया गया लेकिन बहुत खेद से कहना पड़ रहा है कि समाज के कार्यकर्ताओं को ही यह समझ नहीं आया। इसकी जानकारी पूछने पर वे सभी एक-दूसरे के नाम बताते हैं। यह सर्वेक्षण का कार्य सिर्फ और सिर्फ समाज के कुछ ही गिने-चुन व्यक्ति तक पहुंचा है। इससे समाज का यह कार्य निष्फल रहा व समय और पैसे सभी पानी में गए। सर्वेक्षण का नतीजा हुआ कि समाज की सही स्थिति सामने नहीं आई, न ही जनगणना पूरी हुई। समाज की आर्थिक स्थिति भी सही रूप से सामने नहीं आई। इस परिस्थिति में कोई भी समाज हित में लिया हुआ निर्णय समाज के लिए घातक भी हो सकता है।

आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण

सही सोच की शुरुआत ही सफलता की मंजिल
-शालिनी चितलांगिया

आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण आर्थिक सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से किया गया। जब सोच ही जनकल्याण की हो तो इसकी शुरुआत ही इसकी सफलता की कहानी बयान करती है। नन्हे कदम ही परिपक्वता की पहचान होते हैं। सर्वेक्षण के कारण कम से कम आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आंकड़े तो आए, कम से कम इनके सामाजिक व आर्थिक सुधार की सोच तो आई। नींव तो रखी गई और जहां नींव पक्की हो वहां देर सवेर ही सही पर पक्की इमारत बन ही जाती है। योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन करना नितांत आवश्यकता है। कोई भी मुहिम तभी सफल होती है। जब सब एकजुट होकर उसकी सही दिशा में पूर्णता की कामना करते हुए जिम्मेदारी लें। रही बात सफलता के प्रतिशत की तो जब हाथ से हाथ मिलते हैं तो 40 प्रतिशत मिली सफलता को भी 100 प्रतिशत होने में समय नहीं लगता। अतः महासभा द्वारा सफलता और उत्थान की ओर उठाया गया उचित कदम है।

आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण

हर समाजजन तक नहीं पहुंचा
-विकासकुमार कचौलिया

महासभा द्वारा करवाया गया आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण वास्तव में समाज के कमजोर वर्ग तक पहुंचने का अच्छा प्रयास था। फिर भी यह पूरी तरह समाजजनों तक पहुंच नहीं पाया। शायद कहीं न कहीं कमी रह गई। इससे जो लाभ समाजजनों को मिलना था, वह नहीं मिल पाया। मेरे विचार में यह महासभा का एक सराहनीय कमद था। अब इसे हर घर तक पहुंचाने के लिए जिलासभाओं को जिम्मेदारी सौंपना चाहिए। इनके माध्यम से ही सभी सहायता के प्रयास हों तथा इसके लिए सेवा ट्रस्टों को भी पत्र प्रेषित किर प्रेरित करें।

आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण

कई लोगों ने नहीं भरे फॉर्म
-गोपीकिशन पेड़ीवाल

जहां तक आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण की बात है, महासभा द्वारा ये योजना समाज हित के लिए ही चलाई गई है। हमें ये नहीं पता कि हम कितने माहेश्वरी हैं? समाज में कमजोर बंधु कौन हैं? समाज में लिंगानुपात क्या है? इत्यादि। अगर लोगों ने फॉर्म पूरा भरकर दिए हैं तो ये महासभा के लिए बहुत उपयोगी होंगे। ये सब स्थानीय पदाधिकारी या सदस्यों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वो इस योजना को कितना सफल बना पाते हैं? इसमें पूरे समाज को भी जागरूक करना पड़ता है। अन्यथा सभा के सदस्य घर-घर जाकर फॉर्म भरवाते हैं तो भी लोग नहीं भरकर देते हैं। महासभा कोई भी योजना लाती है, तो वो निश्चित रूप से समाज के भले के लिए ही लाती है। हमने बीकानेर में घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए लेकिन फिर भी कई परिवारों ने फॉर्म अभी तक भरकर नहीं दिए जो लोग इसका महत्व नहीं समझते, तो ऐसे लोगों का कोई क्या कर सकते हैं?

आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण

सर्वेक्षण को चुनाव से जोड़ना अनुचित
-श्रीकांत झंवर

जिस तरह बढ़ती आबादी देश के लिए चिंतन का विषय है, उसी प्रकार माहेश्वरी समाज की घटती आबादी महासभा के लिए चिंतन का विषय है। इसके लिए आर्थिक-सामाजिक सर्वेक्षण बहुत जरूरी था, लेकिन जैसे ही महासभा ने इस आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण को चुनाव से जोड़ा, जिस कार्य के लिए यह सर्वेक्षण कराया गया उसका महत्व कम हो गया। तेलंगाना प्रदेश के एक छोटे से जिले निजामाबाद में जहां लगभग 200 माहेश्वरी परिवार बसते हैं, वहां की जिला सभा ने भी महासभा के इस कार्य में भागीदारी करते हुए जिले के हर घर तक जाकर लगभग 70 प्रतिशत परिवारों के फॉर्म भरवाए थे। आज निजामाबाद जिले की यह स्थिति है कि यहां पर जिला सभा के चुनाव तीन बार स्थगित हो चुके हैं, कारण सर्वेक्षण डाटा से किसी ने छेड़खानी की, जैसे कि हेड ऑफ द फैमिली का नाम चेंज हो गया, नंबर ऑफ फैमिली मेंबर्स कम हो गए इत्यादि। इसके लिए आज भी माहेश्वरी समाज, प्रादेशिक एवं महासभा के महानुभाव के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है। जिस भावना से जिला सभा ने महासभा के मोटो ‘साथ चलेंगे तभी बढ़ेंगे’ का साथ दिया एवं 90 प्रतिशत आर्थिक सामाजिक सर्वेक्षण को निःस्वार्थ भाव से पूरा किया, उन्हें पता ही नहीं चला कि साथ चलते-चलते कब उन्हें साइड कर दिया गया।


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