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बड़प्पन की विदुर-नीति

घर-परिवार, समाज या राष्ट्र में लोग जिसके नेतृत्व में रहकर कार्य करते हैं, उस नेता से सभी को अपेक्षा होती है कि वह बड़ा तो हो ही, मगर बड़प्पन भी रखे। इसलिए की बड़ा बनना आसान है, बड़प्पन रखना कठिन है। पद पाना सरल है, मगर पद की अपेक्षित गरिमा के अनुरूप सभी के प्रति समान और निष्पक्ष व्यवहार करना ही असल चुनौती है, जो इस चुनौती से धर्मसम्मत नीतियों द्वारा आचरण कर पाते हैं, उन्हें यश मिलता है। अन्यथा वे धृतराष्ट्र की भाँति अपयश के भागी होते हैं।

महाभारत की कथा आपने सुनी ही है। धृतराष्ट्र शरीर से तो जन्मांध था ही, भाग्यवश पद पाकर मन से भी अंधा हो गया था। पुत्र और धन के मोह में हालत यह हुई कि वह घोर पक्षपाती हो गया। सही को सही और गलत को गलत मानना तो दूर वह अपने लोगों के गलत को भी सही साबित करने में जुटा रहा।

महाकाव्य के उदयोग पर्व की कथा है कि वनवास पूरा होने के बाद भी जब दुर्योधन पांडवों को उनका न्यायोचित राज्यभाग देने को तैयार नहीं हुआ तब विदुरजी धृतराष्ट्र को समझाने पहुँचे। उदयोग पर्व के उपपर्व “प्रजागर पर्व” के पूरे आठ अध्यायों में महात्मा विदुर के यही उपदेश हैं, जो संसार में “विदुर-नीति” के नाम से प्रसिद्ध हैं।

कथा के अनुसार विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा कि पांडव भी आपके अपने हैं। दुर्योधन की तुलना में वे अधिक योग्य भी हैं और धन के मामले में दीन अर्थात गरीब हैं, जो योग्य है, पात्र हैं, निर्धन या कमज़ोर हैं, राजा को सबसे पहले उनका हित करना चाहिए, न कि मोह में पड़कर अयोग्य और बलवानों की हाँ में हाँ मिलाना चाहिए।

इसलिए कि यदि पद पर बैठा व्यक्ति इस प्रकार का आचरण करता है, तो कुल ही नहीं समूचे जाति भाइयों के भी विनाश का निमित्त बनता है। अद्भुत वचन है ! विदुर बोले, ‘भरतश्रेष्ठ! मुझे आप अपना हितैषी समझे।

तात! शुभ चाहने वाले को अपने जाति भाइयों के साथ झगड़ा नहीं करना चाहिए, बल्कि सबके साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिए। जाति भाइयों के साथ परस्पर भोजन, बातचीत एवं प्रेम करना ही “राजा” का कर्तव्य है। उनके साथ कभी विरोध नहीं करना चाहिए।

“इस जगत में जाति भाई ही तारते हैं और जाति भाई ही डुबोते भी हैं। उनमें जो सदाचारी हैं, वे तारते हैं और जो दुराचारी हैं वे डुबो देते हैं।”

मत भूलिए! धृतराष्ट्र ने महान विदुर के इस हितोपदेश को सुनकर भी अनसुना कर दिया। यहाँ तक कि उसे हस्तिनापुर से निकाल दिया था। परिणाम क्या हुआ, कुल तो नष्ट हुआ ही, जाति भाई भी पक्षपात, अहंकार, लोभ और मोह में मर मिटे। जो जाति की महाभारत से बचना चाहते हैं, उन्हें विदुर नीति सदैव स्मरण रखना चाहिए।

-डॉ विवेक चौरसिया

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