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मुखिया के लिए प्रश्न-दर्पण!

नया-नया कुर्सी पर बैठा पदाधिकारी पद पाकर कैसा व्यवहार करें? उसका आचरण कैसा हो? कैसे वह विगत को भूलकर भावी समाज के निर्माण के लिए सबको साथ लेकर चले? अगर किसी को यह समझना हो तो महाभारत के सभापर्व का पाँचवा अध्याय अवश्य पढ़ें।

इस अध्याय में देवर्षि नारद और युधिष्ठिर का संवाद हैं जिनमें कुल 129 श्लोकों में नारदजी ने अभी-अभी इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर बैठे युधिष्ठिर से पूरे 100 प्रश्न किए हैं। इन प्रश्नो के जरिये मानों पद पर विराजमान हर देश, काल, समाज, संगठन के मुखिया को सीख है कि उसका आचरण और व्यवहार कैसा हो।

इनमें एक राजा के लिए ज़रूरी राजनीति और कूटनीति का उपदेश तो है ही, व्यक्ति मात्र के लिए या “मुखिया” की छोटी से छोटी भूमिका निभाने वाले के लिए भी अनेक कारगर सूत्र हैं।

उदाहरण के लिए जैसे नारदजी ने पुछा कि युधिष्ठिर क्या तुमने पहले अपनी इन्द्रियों और मन को जीता है? क्या तुम्हे हर प्रकार के व्यक्ति की पहचान है? क्या तुम समय पर सारे काम करते हो? क्या तुम्हारे सलाहकार समझदार और समाज के कल्याण की धर्मसम्मत सलाह देने वाले हैं? क्या

तुम धन का सदुपयोग करते हो और क्या तुम सभी की सहमति से काम करते हो? क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, कठोरता, और दीर्घसूत्रता; इन छह दोषों को त्याग दिया है या नहीं? इसलिए कि जो स्वयं इनके विपरीत आचरण व व्यवहार करता हो वह कैसे दूसरों से इनकी अपेक्षा का अधिकारी होगा! और उससे भी अधिक महत्त्व का प्रश्न !

क्या तुम्हे किसी के किए हुए उपकार का पता चलता है? क्या तुम उस उपकार की प्रशंसा करते हो? साधु पुरुषों से भरी हुई सभा के बीच उस उपकारी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसका आदर सत्कार करते हो की नहीं? आशय है हर युग के मुखिया को स्वयं से लगातार ये प्रश्न करते रहना चाहिए।

ये दर्पण की भाँति हमें अपने आप को देखना सिखातें हैं। ये प्रश्न अपने आप में सिद्धांत हैं, सूत्र हैं, कर्तव्य हैं और उत्तर भी हैं। स्मरण रखिए कथा में युधिष्ठिर ने नारदजी को कोई उत्तर नहीं दिया था। जैसे कि सवाल किए जाने पर आजकल के मुखिया तुनककर जवाब देने या सफ़ाई देने लगते हैं।

युधिष्ठिर ने बस इतना ही कहा था, आपने जैसा उपदेश दिया है, वैसा ही करूँगा। आपके इन ‘प्रवचन’ से मेरी प्रज्ञा और भी बढ़ गई है।

-डॉ विवेक चौरसिया

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