सामर्थ्यवान बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर हक जमाना उचित या अनुचित?

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वर्तमान में हिन्दू उत्तराधिकार नियम के अनुसार बेटे और बेटियों को पिता की संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त हो गया है जिसके अनुसार बेटे के होने पर भी बेटियों का पिता की संपत्ति पर अधिकार बना रहेगा। अधिकांशतः ब्याहता बेटियाँ अपने पिता की संपति पर अपना अधिकार नहीं जतातीं और अपने भाई को पिता की संपति पर पूरा अधिकार दे देती हैं। परंतु कहीं-कहीं स्थिति विपरीत होती हैं, ब्याहता बेटियां अपने पिता की संपति पर अपना हक चाहती हैं। ऐसी परिस्थिति में कभी-कभी रिश्तों में जीवनभर की खटास आ जाती है।

ऐसे में विचारणीय हो गया है कि अगर बेटी के पीहर का परिवार सामर्थ्यवान ना हो तो अथवा बेटी अपने ससुराल में सुखी-सम्पन्न हो तो भी विवाह के बाद बेटियों का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार जताना उचित है अथवा अनुचित? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


उत्तरदायित्व निभाने वाला ही सम्पति का उत्तराधिकारी
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

सुमिता मूंधड़ा

सामर्थ्यवान विवाहित बेटी का अपने पिता की संपति पर अधिकार मेरे दृष्टिकोण में उचित नहीं है। बेटी को विवाह के पश्चात सिर्फ और सिर्फ अपने पति के हिस्से की संपत्ति पर अधिकार रखना चाहिए। देखा जाये तो विवाह के समय बेटी को जो दहेज माता-पिता द्वारा दिया जाता है वह उनकी संपत्ति का ही तो हिस्सा होता है। बेटी को उस दहेज रूपी सम्पत्त्ति को पाकर संतुष्ट रहना चाहिए। अन्यथा पीहरवालों के साथ मधुर संबंध कटुतापूर्ण हो सकते हैं।

वैसे भी हिन्दू विशेषकर हमारे माहेश्वरी समाज में विवाहित बेटी को विवाह से मृत्युपर्यन्त कुछ न कुछ, किसी न किसी रूप में देने की लाग बनी ही रहती है, फिर चाहे बेटी के घर में खुशी का आगमन हो अथवा दुःख का। इतना ही नहीं माता-पिता से अथवा भाई-भाभी से अथवा पीहर परिवार से विवाह के बाद बेटी को लेने की सीमा और मर्यादा रखनी चाहिए। साथ ही बहन बेटी को ‘भाई द्वारा लेकर और भतीजों के देते रहना’ चाहिए, इससे बेटी का पीहर में रुतबा और सम्मान बना रहता है।

अगर विवाहित बेटी को ही अपने माता-पिता को संभालना है और उनकी बुढ़ापे में देख-रेख करने हेतु आवश्यक हो तो वह अवश्य उनकी संपत्ति पर अपना अधिकार जताए। उत्तरदायित्व निभानेवाले ही संपत्ति पर अधिकार जताने के उत्तराधिकारी होते हैं।

हिन्दू उत्तराधिकार नियम में बेटे और बेटी को समानता का अधिकार देने के साथ जिम्मेदारियों के बाबत भी नियम बनाये दिए गए हैं जिसको हम जान-बूझकर नजरअंदाज करते हैं। सामाजिक कार्यप्रणाली को सुचारू रूप में चलाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं को परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यक कदम उठाने चाहिए।


बेटियों को बनाऐं आत्मनिर्भर
विनीता काबरा, जयपुर

बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा ‘आधुनिक समाज की सोच’ को इंगित करता है। प्राचीन काल से ही बेटियों को पराया धन मानते आए हैं और शादी के बाद पीहर पक्ष से बेटी के सब अधिकार गौण हो जाते हैं। पर समानता की बयार में कुछ विचारों में भी परिवर्तन हुआ है।

अब लड़के व लड़की को समान अधिकार हैं तो फिर चाहे वह पैतृक संपत्ति में ही क्यों ना हो, पर इस बात से इत्तेफाक रखना कि बेटियों को सिर्फ अधिकार ही मिले गलत है। अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों का भी समान रूप से वहन हो तो यह बात जायज है। लेकिन हमारी भारतीय संस्कृति में माता- पिता बेटी के घर ना तो रहना पसंद करते हैं ना अपनी जिम्मेदारी बेटी पर डालना।

जब जिम्मेदारी बेटा अकेला उठाए तो अधिकार भी बेटे को ही मिले। अगर बेटी भी बेटे के बराबर उत्तरदायित्व निभा रही है तो बेटी को पिता की संपत्ति में अधिकार मिलना चाहिए फिर चाहे वह आर्थिक रूप से संपन्न ही क्यों ना हो। बेटियों को पढ़ा लिखा कर इतना आत्मनिर्भर व मजबूत बनाएं कि उनको किसी की भी संपत्ति की जरूरत ही नहीं पड़े।


संबंध बिगड़ने का बनता है कारण
लखन माहेश्वरी, अजमेर

हिन्दू उत्तराधिकार नियम के अनुसार पिता की सम्पत्ति पर बेटी, बेटों का समान अधिकार है। लेकिन प्राय: कम बेटियां ही इस अधिकार का उपयोग करती हैं। मेरे विचार से करना भी नहीं चाहिये। बेटी अपना भाग्य लेकर आता हैं। जिस बेटी का ससुराल पक्ष पूर्णत: सम्पन्न होता है वो बेटी इससे हमेशा दूर रहती है।

वह पिता की सम्पत्ति का समस्त अधिकार अपने भाईयों को ही दे देती है। जो बेटी दूसरों की अनुचित बातों में आकर पिता की सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार जताती है, वह अपने पीहर के परिवार से हमेशा के लिये अलग थलग पड़ जाती है।

भाईयों के साथ उसका प्रेम हमेशा के लिये समाप्त हो जाता है। यदि बेटी की सुसराल में आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो भाईयों को स्वयं उसकी सहायता करनी चाहिये ताकि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही ना हों और भाई-बहनों का प्यार बना रहे।


सामर्थ्यवान बेटी के लिये हक जताना अनुचित
मीनू नवनीत भट्टड़, नागपुर

हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 में हुए संशोधन के पश्चात पिता द्वारा अर्जित की गई संपत्ति पर पुत्र एवं पुत्री का समान अधिकार होता है। किंतु अधिकांशतः संपत्ति ही सभी विवादों की जड़ होती है। देश के कई उत्तरी एवं पश्चिमी राज्य में तो बेटियों का स्वेच्छा से संपत्ति को छोड़ने का रिवाज तक है।

किंतु कई बार संपत्ति के बंटवारे को लेकर भाई और बहन के बीच का रिश्ता कटुता से भर जाता है। पुत्री के विवाह पश्चात पिता एवं भाई द्वारा उसे उपहार स्वरूप वस्तुएं, कपड़े एवं धन कभी दहेज के रूप में, कभी मायरे के रूप में तो कभी विभिन्न त्योहारों में दी जाने वाली भेंट के रूप में व कभी विदाई के रूप में समय-समय पर दिए जाते हैं।

मेरा मानना है कि यदि बेटी का ससुराल पक्ष आर्थिक रूप से कमजोर हो एवं पिता पक्ष संपन्न हो तो अवश्य ही पुत्री को संपत्ति में भागीदारी दी जानी चाहिए। किंतु सामर्थ्य वान बेटी का पिता की संपत्ति पर हक जमाना अनुचित है।


जिम्मेदारियों पर भी हक जताऐं
ज्योति माहेश्वरी, कोटा

बेटा और बेटी को समान मानना एक बहुत ही उच्च विचारधारा है। इससे बेटियों को आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। जहाँ तक बात बेटी के पिता की संपत्ति में अधिकार की है, तो मैं इसके पक्ष में नहीं हूं। बंटवारा अगर अधिकारों का हो तो जिम्मेदारी का भी समान रूप से होना चाहिए।

बेटी अगर सक्षम नहीं है तो कुछ हिस्सा उनके नाम किया जा सकता है। सुख-सुविधा से सम्पन्न होते हुए प्रलोभन के कारण संपति के लिए कानूनी प्रक्रिया करना उचित नहीं है। अधिकार पाने की राह पकड़ते-पकड़ते रिश्तों की मर्यादा ही ना भूल जाऐं।

पिता अपनी स्वेच्छा से संपति का कुछ अंश दे तो वह स्वीकार्य है। रिश्तो में विश्वास और अपनत्व खोकर जीवन बंजर सा लगता है। जिम्मेदारी के लिए अगर हम बेटों से अपेक्षा रखते है तो बेटी को समान हिस्सेदारी कैसे दे सकते है? एक तरफ हमारी सोच यह है कि बेटियों के यहाँ खाना नही चाहिये, रहना नहीं चाहिए, उन पर कैसे माता पिता अपनी जिम्मेदारी सौंपे? तो संपत्ति में हम कैसे अधिकारी बना सकते है? मेरी सोच में यह उचित नहीं है।


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