समाज को मृत्युभोज देना कितना उचित अथवा अनुचित?

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मृत्युभोज का सामान्य अर्थ किसी की मृत्यु होने पर परिवार और समाज को दिया जाने वाला प्रीतिभोज है। इसमें मृतक की त्रयोदशी पर तेरह ब्राम्हणों, रिश्तेदारों और समाज के लोगों को सामूहिक रूप से भोजन कराया जाता है। परिवार के लिए यह इतना दुखद और संवेदनशील वक्त होता है कि उनके गले से खाने का एक निवाला भी नहीं उतरता पर अन्य लोगों को भोज खाने का निमंत्रण देना पड़ता है। साथ ही समय के साथ यह इतना खर्चीला हो गया है कि कई दुखी गरीब परिवारों की इसके कारण कमर टूट जाती है और वो कर्ज के तले दब जाते हैैं। यह स्थिति तब और दुखद हो जाती है, जब छोटी उम्र में किसी का स्वर्गवास हो जाता है और तब भी लोग भोज का आनंद लेने उमड़ पड़ते हैं।

ऐसे में इस विषय पर चिंतन अनिवार्य हो गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार ब्राह्मणों को मृत्युभोज देना आवश्यक भी है और सर्वथा उचित भी, पर ब्राह्मणों को छोड़कर परिवार-समाज को मृत्युभोज ग्रहण करना उचित है अथवा अनुचित? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


शास्त्रों ने भी कहा इसे अनुचित
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

sumita mundra

सुख का समय हो तो खुशी से और गम का समय हो तो दुःखी मन से ही सही पर धार्मिक रीति-रिवाज तो निभाने ही पड़ते हैं। ऐसे ही किसी के मरणोपरांत मृतक के नाम से उसके परिवार द्वारा ब्राह्मणों को मृत्युभोज देना भी हिंदू धार्मिक विधान है। वर्तमान समय में तो ब्राह्मणों के साथ-साथ परिवार और समाजबंधुओं को भी मृत्युभोज देना एक नई परंपरा बनती जा रही है।

इसके कारण कभी-कभी साधारण परिवार को आर्थिक संकट से भी गुजरना पड़ता है। शोकाकुल परिवार अर्थ-संपन्न हो या ना हो पर जब परिवार में मातम छाया हो उस समय समाजबंधुओं और सगे-संबंधियों को मान-मनुहार से निमंत्रण देना और भोजन कराना सर्वथा अनुचित है। ब्राह्मणों को छोड़कर अन्य लोगों का मृत्युभोज ग्रहण करना भी निंदनीय है। ऐसे समय में हमें शोकाकुल परिवार को ढाँढस बंधाना चाहिए, आवश्यक सहायता करनी चाहिये, ऐसी दुखद घड़ियों में उनके साथ खड़े रहना चाहिये।

परिवार सम्पन्न हो या ना हो; जब हमारे धर्मग्रंथों में भी मृत्युभोज ग्रहण करना अनुचित बताया गया है तो हमें उसका पालन अवश्य करना चाहिए। यह भी देखा गया है कि कहीं-कहीं शोकाकुल परिवार भी दुख में शामिल होनेवाले स्नेहीजनों से बार-बार भोजन करने का आग्रह करता है अथवा निमंत्रण देता है तो ना चाहते हुए भी मान रखने के लिए अंततः भोज करना पड़ जाता है। शोकाकुल परिवार से भी निवेदन है कि मृत्युभोज करने के लिए मान-मनुहार और आग्रह करके सामने वाले को भोजन ग्रहण करने के लिए मजबूर ना करें।


अनुचित है मृत्युभोज
किरण अटल, विराटनगर (नेपाल)

जिसके घर में दुख पड़ा है जिसके आंसू नहीं थम रहे हैं, चाहे वह बड़ा हो या छोटा गया तो इंसान ही है। उसके पीछे लोगों को बुलाना, आडंबर, फिर व्यंजनों का भोज। ब्राह्मणों को खिला रहे वैसे ही अनाथ आश्रम में एक भोज करें। परमगति को श्रद्धांजलि स्वरुप सुबह मंदिर के बाहर भिखारियों को नाश्ता दे लेकिन वह सब नहीं होगा। हम खुद अपने मरणोपरांत के लिए लिख दें कि यह चीज नहीं होनी चाहिए। कहते हैं यह प्रसाद है इसको तो लेना ही चाहिए।

ठीक है यदि प्रसाद के नाम से कर रहे हैं तो ब्राह्मणों को दें बाकी सब सिर्फ प्रसाद के समान ही ग्रहण करें। थाली भरकर बैठ जाना पेट फटे तक खाना वह प्रसाद नहीं महाभोज होता है। गांव परिवार उस वक्त सात पीढ़ी के भी लोग उठ कर आते हैं और बुलाते हैं। अनाज की बर्बादी के हिसाब से नहीं, पैसे के अभाव के हिसाब से भी नहीं, सोचिए जो इंसान चला गया आपका उनसे नाता प्रेम अब उनको आगे धर्म के रास्ते में अड़चन न आए।

उनके नाम पर कुछ धर्म करते जाऐं मृत्यु भोज से बढ़कर कोई और भोज है ही नहीं। मैं नेपाल से हूं यहां जो किसी की क्रिया करता है उसके लिए अड़ोसी-पड़ोसी दुध, दही, भात, चिवडा ला देते है वहीं खाता हैं। जमीन पर सोना, सफेद कपड़ा खुद धोना पहनना। जो स्वयं दुखी हैं निवाला मुख में जा नहीं पा रहा तो हम मुंह का स्वाद लेने वाले कौन होते हैं?


शास्त्र सम्मत नहीं है मृत्यु भोज
अयोध्या चौधरी (सोमानी), अलीराजपुर

मनुष्य की मृत्यु के उपरांत उसकी द्वादशी या त्रयोदशी पर समाज को दिया जाने वाला भोज ही मृत्युभोज है। मृत्युभोज किसी भी दृष्टि से उचित नही है। समाज को दिये जाने वाले मृत्युभोज को कई जगह एक सामाजिक ऋण मानकर इस औचित्यहीन परिपाटी का निर्वहन किया जा रहा है। इस मृत्युभोज का संबंध मृत व्यक्ति की उत्तर क्रियाओ में कहीं नही आता है।

यह तर्क शास्त्र सम्मत है। (गरूड पुराण) मृत्युभोज की जड़ें समाज में इतनी गहरी पैठी हैं कि वर्तमान पीढ़ी का एक शिक्षित युवा चाहकर भी विरोध नही कर पा रहा है। समाज मे दिखावे के कारण एक मध्यमवर्गीय परिवार नीचे रसातल मे जा रहा है। कभी-कभी तो हालात इतने विकट बन जाते है कि व्यक्ति ऋण लेकर घी पीने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे मे मृत्युभोज कहां तक उचित है? दु:ख की बात तो यह है कि सब कुछ समझते हुए भी मृत्युभोज के मामले मे समाज बंधु लकीर के फकीर बने हुए है।

रूढ़िवादिता को समूल नष्ट करने के लिए समाज संगठन को संकल्पबद्ध होना ज़रूरी है। समाज को मृत्युभोज देना शायद संबंधित व्यक्ति की मजबूरी बनी हो, लेकिन अगर हम मृत्युभोज ग्रहण न करने का संकल्प ले लें तो मृत्युभोज उन्मूलन एवं समाज हित में सकारात्मक परिणाम अवश्य सामने आयेंगे।


समर्थ हों तो अनुचित नहीं
सुरेश राठी, जोधपुर

समाज को मृत्युभोज देना इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं। नुकसान तो ये है कि यदि छोटी उम्र में किसी की मृत्यु होती है तो अच्छा नहीं लगता खाना खाना। या बिल्कुल गरीब आदमी है उसके लिए भी अच्छा नहीं मृत्युभोज देना। जिस हिसाब से महंगाई बढ़ रही है खर्चे ही नहीं निकल रहे और मृत्युभोज का अतिरिक्त खर्च।

इसके फायदे है कि आजकल लोगों का मिलना जुलना कम हो गया है। कोई एक दूसरे के घर आते जाते नहीं है। तो मृत्युभोज के बहाने अगर कोई फायनेंशियल और स्ट्राँग हो, 70 प्लस हो तो मृत्युभोज में 400-500 लोग एकत्रित हो जाते हैं और एक दूसरे से मिलना जुलना हो जाता है।

तो छोटी उम्र के लिए मृत्युभोज नहीं होना चाहिए और गरीब आदमी के लिए भी मृत्युभोज नहीं होना चाहिए और अगर आदमी के पास अच्छा पैसा और उम्र है तो मृत्युभोज जरूर होना चाहिए। उसका उद्देश्य मिलने का है तो मृत्युभोज के दोनों पहलु अपनी अपनी जगह सही हैं।


मृत्युभोज क्यों करते हैं?
जुगलकिशोर सोमाणी, जयपुर

मानव जीवन में मुख्यतः षोडश (सोलह) संस्कारों का महत्व ज्यादा माना गया है। हालांकि हम सरलता से इनके नाम नहीं गिना सकते। बौद्धिक, आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से हम बहुत पतित हो चुके हैं। जीवन पद्धतियों को तोड़-मरोड़ कर न जाने हम तीज-त्यौहार कैसे-कैसे मनाने लग गये हैं। सोलह संस्कारों में अंतिम है मृत्यु उपरांत ‘अग्निसंस्कार’।

‘गर्भाधान’ वैसे ही है जैसे मकान का ‘पाया’ (भूमिपूजन) और ठीक इसी तरह इहलोक से विदा होने के बाद ‘दाग’ (दाह-संस्कार)। अब इनमें एक जैसी बात है अविभाज्य संख्या 9 (नौ) की। नौ महीनों बाद नवागमन, नौ प्रकार की व्यवस्थाओं से निर्माण और नौ दिवसीय विधि के बाद गमन (दाह-संस्कार के तीसरे दिन अस्थि या फूल चुनने के बाद नौ दिन यानि कुल 3+9=12 दिन)।

नौ दिन का गरुड़ पुराण सुनने के बाद होता है ‘मृत्युभोज’ (मारवाड़ी में ओसर-मोसर)। यदि आप कभी किसी विद्वान पण्डित जी से वास्तविक गरुड़ पुराण सुनेंगे तो सारी भ्रांतियां दूर हो जाएगी कि गर्भ के नौ महीने या मृतात्मा के नौ दिन क्या होते हैं? मृत्युभोज को कम से कम एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण या ज्यादा हो तो तेरह ब्राह्मणों को जिमाया जाता है। बड़े-बुजुर्ग इस भोज में भी सम्मिलित नहीं होते हैं। अब आप किस श्रेणी में रहना चाहते हैं, आप समझें?


हम मृत्युभोज में न जाऐं
लखनलाल माहेश्वरी, अजमेर पूर्व व्याख्याता

जिस परिवार पर दुख का पहाड़ टूटा उसके दुख में सम्मिलित होना है। किसी परिवार में किसी के वियोग पर सब दुखी होते हैं ऐसे समय में समाज के लोगों का वहाँ जाकर खाना खाना अनुचित होता है। हमें जाकर सांत्वना अवश्य देनी चाहिए।

जिस परिवार का पालनहार चला जाता है, उस घर पर दुख का पहाड़ टूटता है। फिर भी परिवार दुख सहकर भी मृत्युभोज करता है क्योंंकि समाज की इच्छा पूरी करना चाहता है। परिवार चाहे भूखा रहे, उधार लेकर पैसों की व्यवस्था कर मृत्युभोज करता है।

हमें उस परिवार को समझाकर रोकना है ताकि परिवार ऋण के बोझ तले ना डूबे। मृत्युभोज में हमें नहीं जाना चाहिये और समाज में व्याप्त बुराई को दूर करना चाहिये। तभी समाज व परिवार का हित रहेगा।


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