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ब्याहता बेटियों की मायके में दखलंदाजी कितनी उचित अथवा अनुचित?

वैसे तो विवाह के बाद भी बेटियों का ससुराल के साथ मायके पर भी समान अधिकार है। इसके बावजूद जिस प्रकार एक वर्ग मानता है कि बेटियों के ससुराल में उसके माता-पिता की दखलंदाजी बेटियों के सुखी घर-संसार के लिए समस्या का कारण है, उसी प्रकार एक और वर्ग का मानना है कि ब्याहता बेटियों की अपने मायके में दखलंदाजी भी मायके वालों के लिए परेशानी का सबब है। ब्याह के बाद बेटी को अपने निजी घर-संसार को सजाने-संवारने में अपना मन लगाना चाहिए। ब्याहता बेटी का पीहर में एक निश्चित सीमा रेखा से अधिक पंचायती करना पीहर के सदस्यों में आपसी मनमुटाव का कारण बन जाता है। शुरुआत में ब्याहता बेटी को एक हद से अधिक पीहर में दखलंदाजी करने की मौन अनुमति देकर पीहर वाले स्वयं भी धीरे-धीरे बड़ी समस्या को न्यौता देते हैं।

अतः विचारणीय हो गया है कि ब्याह के बाद भी बेटी का माता-पिता/भाई-भाभी/चाचा-चाची अथवा अन्य पीहर सदस्यों पर अपनी पैठ बनाये रखने के लिए पीहर के हर छोटे-बड़े मुद्दों, निर्णयों व कार्यों में अपनी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष उपस्थित दर्ज करवाना कितना उचित है? इस ज्वलंत और समाज पर प्रभाव डालने वाले विषय पर आपसे आपके विचार आमंत्रित हैं। आपके विचार समाज को नई दिशा दिखाएंगे। आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


अनावश्यक अधिकार जताना अनुचित
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

sumita mundra

विवाहित बेटी का मायके में अनावश्यक तांक-झांक करना उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकता है। मायके में अगर माता-पिता की देखरेख करनेवाला कोई भी ना हो तो बेटी पर माता-पिता की पूरी जिम्मेदारी होती है और तब उसका अपने मायके में माता-पिता के हित में आवश्यक कदम उठाना दखलंदाजी की श्रेणी में नहीं आता।

पर अगर मायके में माता-पिता, भाई-भाभी अथवा अन्य पारिवारिक सदस्य साथ रहते हैं तो भी मायके की हर छोटी-बड़ी बात में बेटी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हो तो यह दखलंदाजी मानी जायेगी जो सर्वथा अनुचित है। अपनी घर-गृहस्थी को सजाने-संवारने का सम्पूर्ण अधिकार ससुराल में बहू का होता है, विवाहित बेटियों का नहीं। बेटियों को तो मायके में सिर्फ मान-सम्मान पाने का अधिकार है।

अगर विवाह के बाद भी बेटियां अपने मायके में अपना वर्चस्व दिखाना/जताना अपना अधिकार मानेंगी तो अपना मान-सम्मान खो देंगी। विवाह के बाद बेटी को अपने मायके में उतना ही हस्तक्षेप करना चाहिए जितना कि वह अपनी ननद से अपने घर में चाहती है। मायके वालों से रिश्तों में खटास अथवा मिठास बनाये रखना स्वयं बेटी के अपने व्यवहार पर निर्भर है।


मायके पर आधिपत्य जमाना ठीक नहीं
गजानन्द राठी, सूरत

बेटी से बहू तक का सफर कहने को तो एक दिन का होता है परंतु उस एक दिन के बाद वह जन्म जन्मांतर के लिए जुड़ जाती है। शादी के बाद बेटी अपने घरवालों के लिए पराई हो जाती है तथा ससुराल वालों के लिये पराये घर से आई हुई होती है। पराया शब्द पीहर व ससुराल दोनो जगह जुड़ जाने के बावजूद शादी के बाद प्राथमिकता ससुराल के परिवार की होती है।

इस बात को ध्यान में रखते हुये पीहर परिवार में एक सीमा से ज्यादा दखलअंदाजी पीहर के सदस्यों के लिये परेशानी का कारण बन सकती है व आपसी सम्बन्धों में वैमनस्य की स्थिति पैदा कर सकती है। पीहर में भी भाभी हो सकती है जिसके लिये वह परिवार प्राथमिक होता है एवं ज्यादा हस्तक्षेप उसके लिये अस्वीकार्य हो सकता है। पीहर के बारे में ज्यादा ध्यान रखने वाली महिला ससुराल में भी सुखी नहीं रह सकती है।

अतः पीहर व ससुराल दोनो जगह के सदस्यों के साथ-साथ स्वयं की खुशी के लिये यह नितान्त जरूरी है कि व्याहता बेटियां अपने पीहर परिवार के मामलों में एक सीमा से ज्यादा हस्तक्षेप न करे। अधिकांश मामलों में जब बेटी का ससुराल नजदीक या एक ही शहर में होता है तो पीहर वालों की बेटी के ससुराल परिवार में बार-बार दखलंदाजी बेटी का बसा बसाया घर उजाड़ सकती हैं। जब कोई ब्याहता बेटी मायके पर अपना आधिपत्य जताती है तो वहां भी ननद भाभी में विवाद के अंकुर फूटने लगते है।


बेटी कायम रखे मान-सम्मान
विनीता निर्झर, अजमेर

सच है कि बेटियाँ मायके की धरोहर होती हैं। माँ-बाप के प्राण बसते हैं बेटी में। बेटी की छोटी-सी परेशानी भी माता-पिता को दुखी कर देती है। आज कानूनन बेटी पिता की सम्पत्ति में उतना ही अधिकार रखती है जितना कि बेटा। मायके से मिला अतिरिक्त प्यार कई बार बेटियों को निरंकुश बना देता है। वे मायके के हर छोटे बड़े कामों में दखलअंदाजी शुरू कर देती हैं।

आरंभ में तो इस बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता किंतु बाद में बेटियों की माँ- बाप और भाई-भाभी के जीवन में यह घुसपैठ उन्हीं को अखरने लगती है। हमारे आसपास ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ बेटी ने मायके वालों की नाक में दम कर रखा है। बेटी विवाह के पश्चात मायके में एक मेहमान के तौर पर ही सम्मान पा सकती हैं। उसका ससुराल उसका अपना घर है।

अगर उसकी अपनी जिंदगी में उसकी ननद दखल दे तो क्या उसे अच्छा लगेगा? यही बात बेटी पर भी लागू होती है। बेटी को चाहिए कि पीहर के मामलों में तभी दखलंदाजी करे जब उससे राय माँगी जाए। बेवजह की टोका-टाकी रिश्तों में तनाव पैदा कर सकती है। बेटी गाहेबगाहे खोज खबर लेती रहे किंतु सलाह तभी दे जब आवश्यक हो। इससे परिवार में बेटी का मान सम्मान बढ़ेगा।


हर काम में दखलंदाजी अनुचित
विनोद गो.फाफट, नागपुर

आज के चलन एवं भारतीय कानून अनुसार ब्याहता बेटियों का मायके की संपत्ति पर समान अधिकार तो होता है। लेकिन मायके के जीवनचक्र या हर कार्य में उसकी दखलंदाजी मायके वालों के साथ-साथ उसका खुद का पारिवारिक जीवन भी बर्बाद कर सकती है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि आप अपने ही परिवार पर उचित ध्यान देवें।

माना कि बेटियां भी मायके के परिवार का अभिन्न अंग होती हैं, लेकिन ब्याह तक ही। जब आप ब्याह कर ससुराल आ जाती है तो ससुराल आपका परिवार हो जाता है। ऐसे समय में आपके लिए भी यह अत्यंत जरूरी है कि आप अपने इस नवीन परिवार पर पूरा ध्यान केंद्रित कर इसे संवारने में अपनी कला दिखाएं।

जैसे आप ससुराल आकर इस परिवार का हिस्सा बन गई है, वैसे ही आपकी भाभी आपके मायके में आकर वहां का हिस्सा बनती है। अब आपका मायका आपकी भाभी का घर परिवार बन चुका होता हैं। इसलिए उसे संवारने की जिम्मेदारी अब उनकी होगी। अगर उनके द्वारा किसी काम में आप से राय मांगी जाए तो निश्छल राय जरूर दें, लेकिन साथ ही यह भी याद रखें कि आपकी बेवजह दखलंदाजी उनके काम में बाधा बन सकती है।

और धीरे-धीरे यह बाधा आपके भाभी एवं आप जैसे ही अन्य पारिवारिक सदस्यों में आपसी मतभेद से होते हुए मनभेद तक जा कर, पारिवारिक जीवन कलह पूर्ण बना सकती है। साथ ही यह भी जरूर सोचें कि आप अगर शादी के पश्चात भी मायके पर ही ध्यान केंद्रित करेंगी तो ससुराल की तरफ उचित ध्यान दे पाएंगी क्या?

आपके ससुराल में अगर आपके ननंद की बेवजह दखलअंदाजी होती रही एवं उसकी वजह यह सब घटित हुआ तो आप पर क्या गुजरेगी? शायद यह सोच ही इस समस्या का सबसे बड़ा समाधान साबित हो सकता है।


मायके के घरेलु मामले में सहभागिता ठीक नहीं
भारती सुजीत बिहानी, सिलीगुड़ी

यह कटु सत्य है कि जिस घर में बेटी जन्म लेती हैं, वही घर विवाहोपरांत उसके लिए पराया घर माना जाता है। शादी से पहले बेटी अपने पिता के घर मे पूरे हक के साथ अपनी बात मनवाती है, पर शादी के बाद परिस्थितियां बदल जाती हैं।

हमारे समाज में माना जाता है कि शादी के बाद ससुराल ही अपना घर होता है। कई मामलों में देखा गया है जो बेटियां मायके में दखलअंदाजी करती हैं उनका सम्मान कम होने लगता है। शनै: शनै: संबंधों में खटास आने लगती है। आपसी संबंधों में आजीवन मधुरता कायम रखने के लिए पीहर वालों द्वारा मांगने पर ही उचित सलाह देनी चाहिए।

उनके दुख-दर्द में जरूर साथ निभाएं परंतु घरेलू मामलों में सहभागिता निभाने से बचे। क्योंकि ज्यादा दखलंदाजी से एक न एक दिन माता-पिता, भाई-भाभी, चाचा-चाची के साथ रिश्तो में कड़वाहट की शुरुआत हो ही जायेगी। सीधे लफ्जों में जो बेटी मायके में हस्तक्षेप करना भी अपना अधिकार समझती है, क्या वह अपने ससुराल में ननद द्वारा किया गया अधिपत्य सहन करती है? अगर नहीं तो मेरे विचार से उसके द्वारा पीहर के मामलों में दखलंदाजी करना अनुचित ही होगा।



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