जिनकी सेवाओं को मोदी ने भी सराहा- Uma Baldi

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उन्हें जहाँ भी पीड़ित मानवता कराहती हुई नजर आयीं। उनके कदम उसी ओर बढ़ गये। नि:शक्तों का जीवन संवारने सहित दुर्लभ बीमारी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के क्षेत्र में उनके योगदानों की प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी सराहना की। यहाँ हम बात कर रहे हैं, हिमाचल प्रदेश के रेरा चेयरमैन सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. श्रीकांत बाल्दी की धर्मपत्नी उमा बाल्दी (Uma Baldi)की।

उमा बाल्दी की जीवन यात्रा राजस्थान के शाहपुरा में शुरू हुई, जहाँ उनका पालन-पोषण करुणा और सेवा पर जोर देने वाले मूल्यों की एक मजबूत नींव के साथ हुआ था। आपका जन्म 6 फरवरी 1962 को श्री नंदलाल व श्रीमती गंगादेवी बहेड़िया के यहॉं हुआ था। भीलवाड़ा निवासी पूर्व सांसद सुभाष बहेड़िया आपके बड़े भाई है। अपने परिवार, विशेष रूप से अपने बड़े पापा से प्रेरित होकर कम उम्र से ही, उन्होंने दूसरों की मदद करने के लिए एक गहरी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की, जिसने बाद में समाज सेवा की दिशा में उनका मार्गदर्शन किया।

समाज के उत्थान के प्रति उनका गहरा समर्पण शुरू से ही था और उन्होंने इन मूल्यों को अपने पूरे जीवन में बनाए रखा। आईएएस अधिकारी डॉ. श्रीकांत बाल्दी (अजमेर) से शादी करने के बाद, उन्हें हिमाचल प्रदेश में गरीबों और विकलांगों की सेवा करने का एक बड़ा अवसर मिला, इसमें उनके कल्याण के लिए नि:स्वार्थ रूप से काम करना उनके जीवन का मिशन बन गया। अपने व्यापक सामाजिक कार्य के बावजूद, वे अपने परिवार के प्रति भी गहराई से समर्पित रहीं। हमेशा अटूट समर्पण के साथ समाज की सेवा करते हुए घर व बाहर की अपनी जिम्मेदारियों को संतुलित करती रहीं।


उन्होंने सोलन में वयस्क साक्षरता अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। व्यक्तिगत रूप से नगरपालिका कार्यकर्ताओं को पढ़ाया और ग्रामीणों को साक्षरता कक्षाओं में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और मिशन को एक जन आंदोलन में बदल दिया। वंचित बच्चों के लिए शिक्षा के अभियान में उन्होंने 700 बच्चों के लिए जन्म प्रमाण पत्र बनवाने में मदद की, जिससे उनके स्कूल में प्रवेश संभव हो सके।

उनके प्रयासों ने नीतिगत परिवर्तनों को जन्म दिया, जिससे हजारों बच्चों के लिए नामांकन व्यवस्थाऐं आसान हो गई। स्वच्छता अभियान के अंतर्गत उन्होंने सोलन को एक स्वच्छ शहर में बदलने के लिए छात्रों और निवासियों को शामिल करते हुए एक साल तक चलने वाले अभियान की शुरुआत करते हुए अभियान का सतत नेतृत्व किया।


नि:शक्तजनों को सशक्त बनाने के अपने प्रयास में उन्होंने कभी कोई कमी नहीं रख छोड़ी। उनके लिये निःशुल्क परिवहन, छात्रवृत्ति और आरक्षण का लाभ दिलाने हेतु विकलांगता प्रमाण पत्र की आसान सुविधा उपलब्ध करवाई। रेड क्रॉस और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से कृत्रिम अंगों के लिए शिविर आयोजित किए गए। शिमला के ढल्ली में बधिर और मूक विद्यालय में एक शिक्षक (स्वयंसेवी) के रूप में सेवा दी।

उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए आईटीआई और पॉलिटेक्निक में विकलांगों के लिए अग्रणी व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करवाया। सोलन, शिमला और कांगड़ा में सुधारात्मक शल्य चिकित्सा शिविरों की व्यवस्था की और उदयपुर और जालंधर में उपचार की सुविधा प्रदान करवाई। विकलांग बच्चों के लिए घर-आधारित शिक्षा और समावेशी स्कूली शिक्षा को प्रोत्साहित किया। एक विकलांग परिवार को एक गैस एजेंसी आरक्षित करने में मदद करने सहित रोजगार और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी सहायता की।


इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (IAMD) की अध्यक्ष के रूप में उमा बाल्डी 1993 से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रोगियों के लिए काम कर रही हैं। उनके नेतृत्व में, आईएएमडी ने 2018 में सोलन में इंटीग्रेटेड मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रिहैबिलिटेशन सेंटर (IMDRC) की स्थापना की। यह केंद्र अपनी तरह का अनूठा केंद्र फिजियोथेरेपी, हाइड्रोथेरेपी, योग, आनुवंशिक परीक्षण, मनोवैज्ञानिक परामर्श और आवासीय सहायता सहित समग्र देखभाल प्रदान करता है।

‘मन की बात’ कार्यक्रम में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उमा बाल्दी का जिक्र करते हुए उनके प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि बीते आठ वर्ष में केंद्र सरकार के प्रयासों से चिकित्सा कर्मियों की कड़ी मेहनत एवं चिकित्सकीय व्यवस्थाओं से जुड़े विभिन्न लोगों तथा समूहों के प्रयासों से देश में चिकित्सा सुविधा की संख्या व उनकी गुणवत्ता में काफी बढ़ोतरी हुई है। फिर भी कुछ आनुवांशिक रोग ऐसे हैं जो आज भी चुनौती बने हुए हैं। इन्ही में से एक रोग है मस्क्यूलर डिस्ट्रोफी।

यह एक ऐसी बीमारी है जो किसी भी आयु में हो सकती है जिसमें मांसपेशियां अपने आप कमजोर होने लगती हैं। रोगी का अपने अंगों पर नियंत्रण कम होने लगता है और दैनिक जीवन भी दूभर हो जाता है। हिमाचल प्रदेश के शिमला में रहने वाली उर्मिला बाल्दी के प्रयासों से इस रोग से पीड़ित रोगियों के उपचार के लिए ‘मानव मंदिर’ नामक चिकित्सा केंद्र सोलन में ही सक्रिय है जो आशा की एक नई किरण बनकर उभरा है।


उमा बाल्दी ने विकलांग व्यक्तियों के लिए हिमाचल प्रदेश की राज्य नीति का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे शारीरिक और आर्थिक पुनर्वास में सरकारी योगदान बढ़ा। उनकी वकालत ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के तहत छात्रवृत्ति, शिक्षा में आरक्षण और बीमा कवरेज में वृद्धि सुनिश्चित की। उन्होंने विकलांग व्यक्ति अधिनियम में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को शामिल करने का भी समर्थन किया।

श्रीमती बालदी ने नि:स्वार्थ सेवा, समर्पण और सामाजिक प्रभाव का पर्याय, बन अनगिनत व्यक्तियों के जीवन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शिक्षा, समाज कल्याण और विकलांगता में उनके प्रयासों ने समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी है, जिससे उन्हें अपार सम्मान और प्रशंसा मिली है।


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