दुर्योधन का अंतिम-संदेश!

Date:

यह समस्या आजकल अधिकांश घरों में देखी जा सकती है। नए युग में नई पीढ़ी के नए बच्चे प्रायः स्वयंभू-से बन रहे हैं। वे सही निर्णय करें तब तो शुभ है किंतु अधिक छूट और अनदेखी में कुसंगत में पड़कर गलत राह निकल पड़े तो घर के बड़ों को तत्काल समझाना चाहिए।

इसलिए कि जो माता-पिता सही समय पर समझाइश देने से चूक जाते हैं वे बाद में पछताते हैं। जो सन्तान समय रहते बुजुर्गों की अनुभव से भरी बातों की अनसुनी करती है वह आगे चलकर उन्हीं हितकारी उपदेशों का स्मरण कर हाथ मलती है। महाभारत में दुर्योधन और धृतराष्ट्र इसके साक्षात उदाहरण हैं।

महाभारत युद्ध के अंतिम दिन सूर्यास्त से पहले ही कौरवों की समूची ग्यारह अक्षोहिणी सेना का विनाश हो गया था। बचे तीन कौरव महारथी कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा पहले ही रणभूमि से भाग चुके थे। पाण्डवों के सेनापति धृष्टद्युम्न ने देखा रणभूमि में कौरव राज दुर्योधन अकेला हो गया था। ‘एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योेधनो नृप:!’

समरभूमि में अपने किसी सहायक को न देखकर दुर्योधन अपने मरे हुए घोड़ों को वहीं छोड़कर भय के मारे पूर्व दिशा की ओर भाग चला।

वेदव्यास लिखते हैं,

‘वह पैदल थोड़ी ही दूर चला होगा कि उसे’ सस्मार वचनं क्षत्तुर्धर्मशीलस्य धीमत:!’

धर्मशील बुद्धिमान विदुरजी की पूर्वकाल में कही हुई बातें याद आने लगी। दुर्योधन ने पहली बार मन में माना कि क्षत्रियों के इस महासंहार को महाज्ञानी विदुरजी ने पहले ही देख और समझ लिया था। जब एक कोस पैदल चल लेने पर दुर्योधन ने रणभूमि से हस्तिनापुर की दिशा में जाते सूत संजय को देखा तो फूट-फूटकर रो पड़ा।

उसने संजय का हाथ पकड़ा और बारम्बार लम्बी सांसें खींचते हुए अपने पिता धृतराष्ट्र के लिए अंतिम संदेश दिया। बोला कि हे संजय! मेरे प्रज्ञाचक्षु पिता से कहना ‘मेरा सब छीन गया है। मेरे सारे सम्बन्धियों का नाश हो गया। अतः अब मेरी जीने की इच्छा समाप्त हो गई है। मैं कल फिर युद्ध करूँगा। उसमें या तो अपने शत्रुओं को मार डालूँगा या फिर रणभूमि में अपने प्राणों का त्याग कर क्षत्रिय धर्म का निर्वहन करूँगा।’

इतना कह संजय से विदा ले दुर्योधन घायलावस्था के कारण विश्राम कर फिर युद्ध करने के इरादे से सरोवर में जा छुपा। युद्ध के अठाहरवें दिन देर शाम संजय हस्तिनापुर पहुँचा और दुर्योधन का ‘अंतिम-संदेश’ जस का तस धृतराष्ट्र को सुना दिया। तब अंधे राजन् दुःख से अत्यंत व्याकुल होकर बिलख पड़े।

कहने लगे ‘मेरा जो पुत्र सम्पूर्ण जगत का नाथ था, वहीं अनाथ की भाँति एकमात्र गदा लिए युद्धस्थल में पैदल खड़ा था। इसे भाग्य के सिवा और क्या कहा जा सकता हैं? ‘अहो दुःखं महत् प्राप्तं पुत्रेण मम संजय। हाय! मेरे पुत्र ने भारी दुःख उठाया।’

पूरी महाभारत में पहली बार इसी मोड़ पर आकर दुर्योधन को सही और गलत का अंतर समझ में आया और इसी कारण महात्मा विदुरजी की कही बातें भी सत्य प्रतीत हुई। अपने लोभी, दम्भी, उद्दंड, अनियंत्रित और स्वयंभू पुत्र को न समझा पाए, पिता धृतराष्ट्र भी आज आँसू बहा रहे थे।

साधो! महाभारत में बार-बार अलग-अलग ढंग से यह सूत्र सीखाने की कोशिश की गई है कि बच्चे भटके तो उन्हें सम्भाल लो और बड़े कहे तो बच्चे मान लें। अन्यथा एक दिन अभागे अभिभावकों को अभागे पुत्रों का अंतिम संदेश सुनना ही पड़ता हैं।

विवेक कुमार चौरसिया


Subscribe us on YouTube

Sri Maheshwari Times
Sri Maheshwari Times
Monthly Maheshwari community magazine connecting Maheshwaris round the globe.

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

Burberry is the First Brand to get an Apple Music Channel Line

Find people with high expectations and a low tolerance...

For Composer Drew Silva, Music is all About Embracing Life

Find people with high expectations and a low tolerance...

Pixar Brings it’s Animated Movies to Life with Studio Music

Find people with high expectations and a low tolerance...

Concert Shows Will Stream on Netflix, Amazon and Hulu this Year

Find people with high expectations and a low tolerance...