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तकनीकी विकास के साथ बढ़ता पीढ़ी का अंतराल

बढ़ता पीढ़ी का अंतराल पिछले करीब पांच दशकों में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी का बहुत विकास हुआ है जिसकी वजह से दुनिया एक-दूसरे के काफी नजदीक आ गई है। अनेकों सांस्कृतिक एंव सामाजिक विभिन्नताओं का मिलन हो गया है, जिसका प्रभाव अपने सामाजिक ढांचे पर भी पड़ा है, लेकिन इस परिवर्तन ने पीढ़ियों के बीच अंतराल उत्पन्न कर दिया है, सोच का। आखिर सोच भी तो तेजी से बदली है।

परिवर्तन की वजह से जहां नई सामाजिक रचना हुई है, वहीं पुराने विचार एवं मूल्यवान संस्कारों का अस्तित्व भी कम होता जा रहा है। नई पीढ़ी के युवा पुराने संस्कारों एवं सामाजिक ढांचे को आज के समय के लिए अनुपयुक्त समझते हैं, जिसकी वजह से पुरानी और नई पीढ़ी की सोच में काफी अंतर आ गया है। कॉलेजों से निकलने वाले पढ़े-लिखे तथा नई सभ्यताता से प्रभावित युवक-युवतियां पुरानी पीढ़ी के अपने अभिभावकों की बातों को तवज्जो नहीं देते, जिसकी वजह से दोनों पीढ़ियों में आपसी तकरार एवं पारिवारिक असंतोष की स्थिति बन रही है।

जहां पुरानी पीढ़ी के लोग अपनी संतान से अपेक्षा करते हैं कि वे परंपराओं का अनुगमन करें तथा बड़ों की बातों का सम्मान करें, वहीं आज के परिवर्तनशील समाज में पले बढ़े बच्चे इसे अनावश्यक रोकटोक व विचारों की स्वतंत्रता में दखल समझते हैं। एक ही परिवार की मां और बेटी की सोच में भी काफी अंतर आ गया है। जहां पिछली पीढ़ी की मां ने घर की चाहरदीवारी में रहकर दिन-रात गृहस्थी की सुख सुविधाओं का ध्यान रखते हुए एक सुंदर घर या आशियाने का सृजन किया, वहीं युवा पीढ़ी की उसकी बेटी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपना अलग करियर बनाना पसंद करती है।

आज भी माता-पिता अंतिम मार्गदर्शक:

इसी तरह पिता और पुत्र के विचारों में भी काफी असमानता आई गई है। पुरानी पीढ़ी का पिता अपने अथक प्रयास व कड़ी मेहनत से धन उपार्जित कर अपने परिवार को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलवाता है तथा अपनी संतान को यथासंभव सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध करवा कर उसकी रुचि के अनुसार अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाता है। उसे इस लायक बनाता है कि कड़ी मेहनत व लगन से स्थापित उसके कारोबार को संभाल सके अथवा उसे सम्मानजक नौकरी मिल सके ताकि वह सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ के साथ सुखद व आनंददायी जीवन व्यतीत कर सके।

वहीं युवा पीढ़ी के पुत्र को वर्तमान के उच्च तकनीकी साधनों से लैस समाज में पिता की बातें अप्रासंगिक व अनुपयोगी लगने लगती है। वो उनके अनुभव को ज्यादा अहमियत नहीं देता है। दूसरे शब्दों में नजरअंदाज करता है। अभिभावकों की बातें उनको अपनी स्वतंत्रत सोच का हनन लगती है।

वह यह भूल जाता है कि यहां तक पहुंचाने के लिए पिता ने अपने सांस्कृतिक मूल्यों का निर्वाह करते हुए एक कठिन व लंबा रास्ता तय किया है, फिर भी यह हकीकत है कि जीवन के किसी मोड़ पर जब भी कभी-भी युवा पीढ़ी किसी बड़ी परेशानी में पड़ती है, तो निवारण का रास्ता भी अभिभावकों के समय की कसौटी पर परखे हुए अनुभवों से ही सहज निकल जाता है।

आर्थिक परिवर्तन बड़ा कारण:

वर्तमान समय में पीढ़ी के अंतराल का एक प्रमुख कारण आर्थिक ढांचे में बड़ा बदलाव भी है। जहां पुरानी पीढ़ी के लोगों ने आर्थिक कमी व सीमित साधनों के बावजूद अपनी कड़ी मेहनत, लगन व मितव्ययीता से बड़े मुकाम हासिल किए। वहीं आज की पीढ़ी के ज्यादातर युवाओं को सभी आवश्यक संसाधन तथा मजबूत आर्थिक ढांचा विरासत में मिला है। नई पीढ़ी इस बात से अनभिज्ञ है कि यहां तक पहुंचने के लिए बुजुर्गों से कितना कठिन सफर तय किया है।

इस वजह से दोनों पीढ़ियों की सोच के बीच कार्य करने के तरीकों पर मतान्तर है, नतीजतन परस्पर दूरियां बढ़ गई हैं। सुखी जीवन जीने के सभी आवश्यक साधन व नियमित आमदनी होते हुए भी इस अर्थतंत्र से प्रभावित समाज में और अधिक धन अर्जित व संचय करने की होड़ सी लगी हुई है। आज की पीढ़ी दिखावे व विलासिताओं को आवश्यकताओं का जामा पहनाने में लगी है तथा इन अनावश्यक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पति-पत्नी दोनों धन अर्जित करने की अंधी होड़ में कोल्हू के बैल की तरह जुटे हुए हैं।

इसके कारण बच्चों की परवरिश व उनको अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पाते हैं तथा बच्चे उनके संस्कारों व उस प्यार से वंचित रह जाते हैं, जो उन्हें अपने माता-पिता से मिलने चाहिए थे। समयांतर में वे निरंकुश व अत्यधिक स्वतंत्रता के आदी हो जाते हैं। बाद में बड़ों की नसीहत उन्हें अपनी स्वतंत्रता में दखल लगने लगती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया का दुरुपयोग बढ़ा:

आज के इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया के युग में सूचनाओं व जानकारी का आदान-प्रदान आसान व त्वरित गति से हो गया है। मगर इसका प्रभाव हमारी सोसाइटी को बनाने व बिगाड़ने में अहम भूमिका अदा कर रहा है। समयाभाव के कारण माता-पिता इनके उपयोग की खुली छूट बच्चों को देते हैं व बहुत छोटी उम्र में बच्चों को इस्तेमाल के लिए महंगे व गैर जरूरी उपकरण उपलब्ध करवा देते हैं।

कच्ची उम्र की वजह से बच्चे अच्छे व बुरे में अंतर नहीं कर पाते, जिसका प्रभाव उनके अपरिपक्व मस्तिष्क तथा विचारों पर पड़ता है। इसलिए अभिभावकों को भी चाहिए कि जब तक बच्चे इतने समझदार नहीं हो जाएं कि अच्छे और बुरे में अंतर सकें, तब तक उन्हें स्वतंत्र रूप से टीवी व मोबाइल का प्रयोग जरूरत के अनुसार ही करने दें।

अगर हम अपने देश के विभिन्न हिस्सों में इस बदलाव पर एक नजर डालते हैं तो पाएंगे कि जहां दक्षिणी एवं पूर्वी भारत के लोग आज भी अपनी संस्कृति, खान-पान, वेशभूषा एवं रहन-सहन से काफी जुड़े हुए हैं तथा यथासंभव लोग अपनी मातृभाषा में बात करने को प्राथमिकता देते हैं, वहीं उत्तरी व पश्चिमी भारत के लोगों पर पाश्चात्य सभ्यता का ज्यादा प्रभाव हुआ है। परिणामस्वरूप हमारी मूल्यवान संस्कृति व भाषा पुरानी पीढ़ी के साथ ही विलुप्त होती जा रही है।

परस्पर सामंजस्य जरूरी:

इस दौर में नई व पुरानी पीढ़ी साथ-साथ नहीं बल्कि समानान्तर चल रही है। अतः दोनों में सामंजस्य, स्नेह एवं सहयोग के साथ एक-दूसरे के विचारों का सम्मान भी जरूरी है। यहां पुरानी पीढ़ी को समय के अनुसार अपने आपको ढालना होगा और नई पीढ़ी को परिस्थितियों के अनुसार एक सीमा तक अपनी इच्छानुसार रहन-सहन अपनाने की मर्यादित स्वतंत्रता देनी होगी। साथ ही पुरानी पीढ़ी को नई तकनीक सीखते हुए आधुनिक तरीके अपनाते रहना चाहिए।

वहीं नई पीढ़ी को भी बुजुर्गों के प्रति आदरभाव एवं अनुशासन का परिचय देना आवश्यक है। उनकी कही बातों को सुनें तथा सलाह पर विचार करें ताकि बड़ों को सम्मान मिले। पुरातन का सहयोग लेकर, उसके तजुर्बे की कसौटी पर नवीन को कसकर, उसे और उपयोगी बनाने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है। थोड़ा-थोड़ा दोनों झुकें तो मिलन का एक बिंदु सहज ही मिल जाता है।

नई पीढ़ी को भारतीय परंपराओं का मूल्य और महत्व समझना चाहिए, जिससे शिष्टता, सभ्यता और सामाजिक सुरक्षा की बहुमूल्य मर्यादाओं में रहते हुए उसे प्रगति का समुचित अवसर प्राप्त होता रहे।

-त्रिभुवनदास काबरा


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