क्या समय की मांग है डेस्टिनेशन वेडिंग

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गन्तव्य विवाह यानी डेस्टिनेशन वेडिंग का अर्थ है अपने स्थायी निवास स्थान से दूर किसी पर्यटन स्थल या रोमांचक स्थल पर जाकर विवाह संपन्न करना। पिछले एक दशक से डेस्टिनेशन वेडिंगका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। ऐसे विवाह आयोजन में अतिथियों की संख्या भी सीमित हो जाती है। समाज में रहकर भी समाज को विवाह में शामिल नहीं कर पाते हैं। केवल कुछ ख़ास रिश्तेदारों-दोस्तों के बीच ही विवाह कार्यक्रम संपन्न होते हैं। अस्थायी स्थलों में विवाह बजट घट-बढ़ भी जाता है यदि ऐसी अनेकों बातों पर गौर करें, तो हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि आज के दौर में गन्तव्य-विवाह का फैशन, समय की मांग, दिखावा या मजबूरी? समाजहित के इस ज्वलंत विषय पर आपसे आपके विचार व सुझाव आमंत्रित हैं। आपके विचार समाज व समाज के संगठनों को कई राह दिखाएंगे। आईये जानें, इस स्तम्भ की प्रभारी मालेगांव निवासी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।

लाभ और हानि दोनों ही पक्ष
-सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

अपने स्थायी निवास स्थान से दूर किसी पर्यटन स्थल या रोमांचक स्थल पर जाकर विवाह-सम्पन्न करने का प्रचलन दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। सिक्के के दो पहलूओं की तरह ही गंतव्य विवाह आयोजन के भी दो पहलू नजर आते हैं। गंतव्य विवाह में अतिथियों की संख्या सीमित हो जाती है , हर जान-पहचान वाले को इसमें आमंत्रित नहीं किया जा सकता जैसा कि स्थानीय विवाह आयोजनों में होता है। सिर्फ खास दोस्त और निकटतम रिश्तेदार ही विवाह में आमंत्रित होते हैं। अनजान और नए स्थान पर जाकर विवाह करने से विवाह के दोनों पक्ष वैवाहिक जरूरतों को पूरा करने में परेशान हो जाते हैं इसलिए इवेंट मैनेजर की जरूरत होती ही है। इससे इवेंट मैनेजमेंट व्यवसाय फलीभूत होता है और आयोजनकर्ता की जेबें प्रभावित होती हैं। चूंकि स्थायी निवास पर विवाह होने पर आयोजनकर्ता की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, वह आगंतुकों को अपना समय नहीं दे पाता और ना ही स्वयं विवाह का लुफ्त उठा पाता है। पर अगर गंतव्य स्थल पर विवाह हो तो सब काम इवेंट मैनेजर को सौंपकर वह निश्चिंतता के साथ वैवाहिक कार्यक्रमों का हिस्सा बन सकता है। नए स्थान पर अतिथिगण आने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं , गंतव्य स्थल पर रिश्तेदारों के साथ दो-तीन दिन तक साथ रहकर अपना पूरा समय विवाह कार्यक्रमों में ही देते हैं। एक-दूजे के साथ अच्छा समय बिताते हैं, जो आज की व्यस्त दिनचर्या में संभव नहीं होता है। साथ ही शादी समारोह के बीच वहां के दर्शनीय स्थल और सैर-सपाटे का भी आंनद उठा लेते हैं ।

देखा जाये तो वर्षों से हम जहां रहते हैं, वहां के समाज और पहचान वाले स्थानीय लोगों को विवाह में शामिल ना करना भी तो उचित नहीं है ना। इस बहाने ही तो हमें समाज को अपनी खुशियों में शामिल करने और खिलाने-पिलाने का अवसर मिलता है। उच्च स्तर के परिवार तो गंतव्य स्थल पर विवाह कर एक रिसेप्शन अपने स्थायी शहर में भी दे देते हैं, पर हर स्तर के लोगों के लिए यह संभव नहीं होता है। गंतव्य विवाह के बढ़ते चलन से मध्यम स्तर के परिवारों में आर्थिक परेशानी आ जाती है क्यूंकि ना चाहते हुए भी वो फैशन की होड़ का हिस्सा बन जाते हैं।
अभी कुछ समय पहले ही एक बात सामने आई कि जिस शहर/गांव ने अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा द्वारा लागू आचार-संहिताओं का पालन करने का निर्णय लिया है, वहाँ के सम्पन्न परिवार अपनी मनमर्जी से विवाह कार्यक्रमों को करने के लिए गंतव्य स्थल पर विवाह करना चाहते हैं। विचार करें यह आचार-संहिता का उल्लंघन करना माना जायेगा या नहीं ?

डेस्टिवेशन वेडिंग उचित नहीं
-विनीता गग्गड, नेंववा रोड, बूूंदी

मेरे विचार से गंतव्य शादी समारोह सामाजिक हित में सही नहीं है। कारण है गंतव्य शादी में नजदीकी रिश्तेदारों को अवॉइड किया जाता है क्योंकि इसमें सदस्यों की संख्या सीमित रखनी होती है एवं उसके स्थान पर आप व्यावसायिक रूप से जुड़े लोगों को महत्त्व देते है। गंतव्य शादी में आप जिन रिश्तेदारों एवं दोस्तों को शादी में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते हैं वे लोग भी अधिकांशत: गंतव्य शादी में सम्मिलित होने को अवाइड करते हैं। कारण उन्हें काफी रुपए खर्च करके उस स्थान पर पहुंचने का इंतजाम करना होता है। तीसरा कारण है गंतव्य शादियों में पारंपरिक रीति रिवाजों को नहीं निभा कर इसे एक मनोरंजन का साधन बनाते हुए पूल पार्टी, गेम्स, डांस आदि चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। मेरे नजर में गंतव्य शादी सिर्फ सेलफिशनेस का एक उदाहरण है जो कि सामाजिक हित में सही कदम नहीं है। गंतव्य शादियों के बाद रिसेप्शन देने का भी प्रचलन है। अगर आपको खर्चा ही करना है तो सारे समाज के सामने क्यों ना पारंपरिक शादियां की जाए।

समय के साथ समाज का साथ भी जरूरी
-दीपिका लढ्ढा

वर्तमान में डेस्टिनेशन वेडिंग के बारे में आप हम और सभी लोग जानते हैं। एक ऐसा विवाह समारोह जो कि स्वयं के स्थायी निवास स्थान से परे या किसी अन्य स्थान जैसे पर्यटन स्थल या रोमांचक स्थल पर जाकर संपन्न किया जाता है। इसके दो ही कारण हो सकते हैं, पहला जिसके अंतर्गत वर पक्ष और वधु पक्ष के सम्बंध दूर देश से होने से भी दोनों पक्षों के मध्य का कोई विशेष स्थान प्रबंध करना और सही बजट के हिसाब से एक ही स्थान पर दोनों पक्षों के विचारों से ही विवाह संपन्न कराना होता है। यह एक मजबूरी भी है और जरूरत भी। दूसरे नजरिये से देखा जाये तो वर्तमान में डेस्टिनेशन वेडिंग समय की मांग के साथ-साथ फैशन भी बन गई है। आज की युवा पीढ़ी द्वारा विवाह में कुछ नया करने व खासकर यादों को यादगार बनाने को महत्व दिया जाता है। जैसे कि वर-वधु चाहें उसी अंदाज में विवाह थीम रखी जाती है। परंतु इस प्रकार का विवाह कुछ खास रिश्तेदारों और दोस्तों के मध्य ही समाज से दूर संपन्न कराया जाता है। बहुत से अतिथि तो अन्य स्थान या दूरी और समय कम होने के कारण ऐसे विवाह में शामिल ही नहीं हो पाते हैं। याद रखें समय के साथ परिवर्तन आवश्यक है परंतु साथ-साथ समाज को भी लेकर चलना आवश्यक है।

खुशियो के रंग अपनो के संग
-राजश्री सुरेश राठी,अकोला

डेस्टिनेशन वेडिंग व्यस्ततम जीवनशैली की मांग है। आाज मांगलिक अवसर ही एक ऐसा खुशनुमा आयोजन होता है, जहां सभी नजदीकी रिश्तेदारों को एक साथ सम्मिलित होने का अवसर मिलता है। शगुन की इन घड़ियों का अधिक उत्साह करीबी रिश्तेदारों और पारिवारिक सदस्यों के अंर्तमन में ही अधिक होता है। दूर-दराज के रिश्तेदार और समाजवासियों को विशेष दिलचस्पी नहीं होती वह तो मात्र औपचारिकता निभाते हैं। वैसे स्थानीय परिचितों और समाजवासियों के लिए विवाह की किसी एक रस्म का आयोजन स्थानिक जगह होता ही है इसलिए उन्हें अनदेखा नहीं किया जाता। वर्तमान दौर में कार्यभार का दायित्व निर्वहन करने हेतु कोई आगे नहीं आता, ऐसे में रिश्तेदार, समाजसेवी, वर-वधु पक्ष, पूजा-पाठ में लगने वाला समय और अलग-अलग रस्में इन्हें सुचारू रूप से संभालना आसान नहीं होता। डेस्टिनेशन वेडिंग में रिश्मेदारों की संख्या सीमित होती है। दूर-दूर से आये हमारे रिश्तेदारों को समय दें उनकी आवभगत में कहीं कमी न रहे यह आयोजकों की चाहत रहती है। हम अपनी आर्थिक क्षमता देखते हुए जगह का चुनाव कर सकते हैं।


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