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कल, आज और कल

कल, आज और कल अर्थात पुरानी, वर्तमान व नई पीढ़ी इनके बीच वैचारिक मतभेद हमेशा से चलता आया है। जब इस वैचारिक मतभेद का समाधान नहीं निकलता और यह चरम बिंदु पर पहुंच जाता है, तब होता है, ‘मनभेद’ जो परिवार को बिखेर कर रख देता है। लेकिन परिवार में सामंजस्य स्थापित कर मतभेद को दूर करना भी हमारे हाथ में है। आइये जाने क्या करें हम…

सब लोगों का मानना है कि जीवन में उम्र के अंतिम पड़ाव में वृद्धावस्था आती है परन्तु मेरा यह मानना है वृद्धावस्था एक ऐसा पड़ाव है जो इंसान की इच्छा से ही उनके जीवन में आता है। जन्म के साथ बाल्यावस्था आती है।

फिर बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक एवं मानसिक परिपक़्वता के साथ युवावस्था का पड़ाव आता है परन्तु वृद्धावस्था जैसा तो कोई पड़ाव ही नहीं होता बल्कि इंसान अच्छी सकारात्मक सोच के साथ पारिवारिक एवं सामाजिक जवाबदारियों को निभाते-निभाते मन से तो और भी ज्यादा युवा होता है।

हाँ यदि बात सिर्फ शारीरिक क्षमता से ही उम्र के पड़ाव का आंकलन करने की हो तो निश्चित ही वृद्धावस्था जीवनचक्र का एक हिस्सा है तथा सभी को इससे रूबरू होना ही है, जो अटल सत्य है।

वृद्धावस्था को न बनने दें कमी:

समय के साथ हर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष , जीव या निर्जीव वस्तुओ के ढांचे में परिवर्तन होता ही है। जरुरत है हमें अपने को समय के अनुरूप ढाल कर उसमें से सार्थक की खोज करते रहने की। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से हम साधारणत: अधिक शांत होते जाते है।

व्यक्ति आई हुई समस्याओ का समाधान कर चूका होता ह। हर व्यक्ति जीवन में कभी न कभी कठिन समय से गुजरा हुआ होता है अतः जीवन की जिम्मेदारियों को ईमानदारी के साथ निभाने के बाद एक समय ऐसा भी आता है, जब प्रत्येक व्यक्ति आराम की ज़िंदगी बिताना चाहता है।

मेरा यह मानना है कि सकारात्मक सोच से व्यक्ति को वृद्धावस्था में भी मन से युवा रहकर उसका आनंद लेना चाहिए। इस अवस्था में ही हम अपने पौत्र, पौत्रियों, नाते, नातियों को प्यार करने, कहानी सुनने, पार्क में घूमने तथा इसी तरह कि ढेरों कार्यकलापों का आनंद लेते हुये एक बार फिर अपने बचपन का रसास्वादन चख सकते है।

यह करें दिनचर्या में परिवर्तन:

अनावश्यक तनाव से बचें:

आपको जो करना था वो आप इस उम्र तक कर चुके है इसलिए समस्याओं को सुलझाने का काम दूसरों पर छोड़ दें। हाँ जहाँ ज़रूरत हो वहां सलाह भी दें तथा मार्गदर्शन भी करें। सलाह को मानने या नहीं मानने का निर्णय सामने वाले पर ही छोड़ दें जिससे आनंद मिले वो करे, अपनी रूचि के कार्यकलापों से जुड़ें तथा साथ ही अपने मनोरंजन की गतिविधियों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं जैसे कोई खेलना, संगीत सुनना, किताबें पढ़ें इत्यादि।

अपनी दिनचर्या में अनुशासित रहें:

जीवन में अनुशासन का बहुत बड़ा महत्त्व है। इसलिए सही समय पर दैनिक कार्यों को करने का नियम बनाएं। सुबह भोर में तथा संध्याकाळ में ईश्वर का स्मरण ज़रूर करेँ। ईश्वर का स्मरण वो शक्ति है, जो हमें निरंतर ऊर्जावान बनाए रखती है। नियमित प्रार्थना से हमें विश्वास होता है कि ईश्वर हमारे साथ है तथा हम ईश्वर के साथ है।

स्वास्थ्य का ध्यान रखें:

जीवन की सबसे बड़ी पूँजी उसका स्वास्थ्य होता है परन्तु उसे इस बात का मूल्य तब पता लगता है जब वो इसे खो देता है। इसलिए स्वास्थ्य के अनुरूप हमें आहार लेना चाहिए। हमें भूलना नहीं चाहिए कि संतुलित आहार से ही हमारे शरीर को ताकत मिलेगी। पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं तथा नियमित मेडिटेशन करेँ।

सकारात्मक सोच रखें:

कोरोना काल के इस कठिन दौर में हमें लोगों की नकारात्मक सोच को सकारात्मक सोच में बदलने का प्रयास करना होगा। आज भी हम एक-दुसरे से उतने ही जुड़े हुए हैं जितने पहले थे, परिवर्तन सिर्फ यह हुआ है कि जहाँ हम व्यक्तिगत रूबरू मुलाक़ात करते थे वहीँ आज वर्चुअल करते हैं बल्कि मैं तो कहूंगा कि वर्तमान परिस्थितियों में हमारे दिलों की नज़दीकियां और भी ज़्यादा बढ़ गई हैं।

कल भी मैं जवान था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा,
संक्षिप्त शब्दों में सिर्फ इतना कहूंगा,
हौसले बुलंद तो बुढ़ापा कहाँ?

त्रिभुवन काबरा, उपसभापति
अ.भा. माहेश्वरी महासभा

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