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सुख-समृद्धि का कारण है शंख

माता महालक्ष्मी की पूजन में शंख विशेष रूप से शामिल होता है। इसका कारण यही है कि इस सुख-समृद्धि का कारण माना गया है। यह धन वैभव देता है, तो स्वास्थ्य भी। आईये तथ्यों के आधार पर देखें ऐसा क्यों और कैसे ?

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं।

कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है। कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कुछ गुह्य साधनाओं में इसकी अनिवार्यता होती है।

शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। “शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है।” वैदिक अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग किया जाता है।


पौराणिक कथा में शंख

पौराणिक कथानुसार समुद्र मंथन के समय देव- दानव युद्ध के पूर्व समुद्र मंथन से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। इनमें सर्वप्रथम पूजित देव गणेश के आकर के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता है।

इसे प्रकृति का चमत्कार कहें या गणेश जी की कृपा कि इसकी आकृति और शक्ति हू-ब-हू गणेश जी जैसी ही है। गणेश शंख प्रकृति का मनुष्य के लिए अनूठा उपहार है। निश्चित रूप से वे व्यक्ति परम सौभाग्यशाली होते हैं जिनके पास या घर में गणेश शंख का पूजन दर्शन होता है।

भगवान गणेश सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। गणेश जी की कृपा से सभी प्रकार की विघ्न- बाधा और दरिद्रता दूर होती है।


लक्ष्मी पूजन में दक्षिणावृत्ति शंख महत्वपूर्ण

शंख तीन प्रकार के होते हैं – दक्षिणावर्ति शंख, मध्यवर्ति शंख तथा वामावर्ति शंख। जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है, वह दक्षिणावर्ति शंख कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है, वह मध्यवृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से पकड़ा जाता है, वह वामावर्ति शंख कहलाता है।

समृद्धि का कारण शंख
दक्षिणावृत्ति शंख

मध्यवर्ति एवं दक्षिणावर्ति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। दक्षिणावर्ती शंख का उपयोग लक्ष्मी प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसके साथ श्री गणेश शंख का पूजन जीवन के सभी क्षेत्रों की उन्नति और विध्न बाधा की शांति हेतु किया जाता है।

इसकी पूजा से सकल मनोरथ सिद्ध होते है। गणेश शंख आसानी से नहीं मिलने के कारण दुर्लभ होता है। सौभाग्य उदय होने पर ही इसकी प्राप्ति होती है। शंख के पूजन से आर्थिक, व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है। वैसे श्री यंत्र क़ी भांति आकृति के महालक्ष्मी शंख का भी उल्लेख होता है। इसे प्राकृतिक श्री यंत्र भी माना जाता है।


पूजा स्थल शंख के बिना अधूरे

हिन्दू धर्म में पूजा स्थल पर शंख रखने की परंपरा है क्योंकि शंख को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

समृद्धि का कारण शंख
शंख

हिन्दू धर्म में शंख का महत्त्व अनादि काल से चला आ रहा है। शंख का हमारी पूजा से निकट का सम्बन्ध है। कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता है। मन्दिर में शंख में जल भरकर भगवान की आरती की जाती है।

आरती के बाद शंख का जल भक्तों पर छिड़का जाता है जिससे वे प्रसन्न होते हैं। जो भगवान कृष्ण को शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर उन्हें अर्ध्य देता है, उसको अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है।



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