“आपदा में अवसर की तलाश’’- उचित अथवा अनुचित ?

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कोरोना महामारी मृत्यु रूप में हाथ धोकर हमारी जान के पीछे पड़ गई है। इससे बचने के हर सम्भव स्वास्थ्य उपाय किये जा रहे हैं, परंतु शत-प्रतिशत सफलता नहीं मिल पाई है। कोरोना योद्धाओं का रोगियों को बचाने का यथासंभव प्रयास जारी है, समाज बंधु-बांधव भी तन-मन-धन से सहायतार्थ आगे आ रहे हैं। ऐसे में कुछेक स्वार्थीजन मानवता को परे रखकर आवश्यक खान-पान की वस्तुओं की ही नहीं बल्कि कोरोना रक्षक दवाओं, रेमडेसिविर इंजेक्शन और ऑक्सिजन सिलेंडर तक की कालाबाजारी करके आपदा में अवसर की तलाश कर रहे हैं।

अपने और अपने परिवार के लिए घर पर दवाओं और इंजेक्शन्स का अनावश्यक संचय करने से भी बाज नही आ रहे जिससे बाजार में आपूर्ति का अभाव हो रहा है और रोगी बेमौत मर रहे हैं। क्या यह उचित समय है अपनी तिजोरी भरने का अथवा घर पर अनावश्यक संचय करने का? क्या कोरोना महामारी के कारण हमने स्वयं के साथ-साथ अपनी दिली इंसानियत को भी लॉकडाउन कर दिया है?

इन आपातकालीन परिस्थितियों में हमें अवसरवादी होना चाहिए अथवा भावुक और जज्बाती? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


कोरोनाकाल में इंसानियत भी हुई लॉकडाउन
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

आपदा में मानव सेवा करने का सुअवसर हाथ से ना जाने दें। अगर हम और हमारा परिवेश स्वस्थ रहा तो धन कमाने के लिए इतने अवसर मिलेंगे कि यह जीवन कम पड़ जायेगा। इस समय तो हमें निःस्वार्थ भाव से तन-मन-धन से मानव सेवा करके पुण्य लाभ अर्जित करना चाहिए। माना कि हम लॉकडाउन में हैं पर सहायता करने के लिए अनेकों दरवाजे खुले हैं।

सुमिता मूंधड़ा

स्वार्थवश अगर हमने अपने मन-मस्तिष्क में जज्बात और इंसानियत की भावना को भी लॉकडाउन कर दिया है तो स्वयं को मनुष्य की श्रेणी में ना मानें। मृत्यु के बाद धन ना तो किसी के साथ गया है ना ही जाएगा, पर हमारे कर्म और धर्म जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ रहेंगे, यह भ्रम नहीं हमारी हिन्दू धर्म की आस्था और मान्यता है। कम से कम उन कोरोना योद्धाओं को देखकर ही कुछ प्रेरणा लें जो अपने और अपने परिवार के जीवन की परवाह किये बिना कोरोना संक्रमितों की सहायता कर रहे हैं।

अगर आप सहायता नहीं करना चाहते तो ना सही, कम से कम कोरोना जीवनरक्षक दवाईयों और ऑक्सीजन सिलेंडर आदि की कालाबाजारी करके अपनी तिजोरी तो ना भरें। हमारे आस-पास लोग आवश्यक दवाओं और ऑक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहें हैं और हमने उन आवश्यक दवाओं को अपने और अपने परिवार के आपातकाल के लिए संचय कर रखा है तो क्या वह संचय हमें सुकून से जीने देगा?

सरकारी और गैर सरकारी अस्पताल भी सिर्फ और सिर्फ पैसा बटोरने में लगे हैं, इंसान की जान इतनी सस्ती है इस बात को एक महामारी ने आसानी से समझा दिया। जरा सी भी इंसानियत बची हो तो इस आपदा में इंसानियत की सेवा के अवसर तलाशें ना कि मेवा पाने के।


अवसर शब्द के सही मायने समझें
सतीश लाखोटिया, नागपुर

भारतीय संस्कृति के इतिहास पर नजर डाले तो अवसर इस शब्द के मायने खुद ब खुद समझ में आ ही जायेगें। ईश्वर से लेकर दानव तक और अति खास से लेकर आम इंसान तक हर किसी ने समयनुसार अवसर का फायदा उठाया, यह सर्वविदित।

चुनाव उचित या अनुचित
सतीश लाखोटिया

आपदा मे अवसर के भी कई पहलु हैं, जैसे मौका मिलने पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना, समयोचित निर्णय लेकर अपनी महत्ता सिध्द करना इत्यादि। इसके साथ ही साथ आम जनता को लगनेवाली वस्तुएँ भी सही समय पर, सही दिशा में मिलना यही आपदा प्रबंधन की सही पहचान, व्यापार की प्रगति याने देश की प्रगति इसमें दो राय नहीं।

व्यापार का मूल मंत्र कमाई यानी दूसरे शब्दों में प्रॉफिट है। सामान्यतः किसी भी काम में प्रॉफिट की एक सीमा रहती है पर आपदा में उसके मायने को बदलते अभी हाल में ही हम देख रहे हैं। जो अत्यंत दुखदायक कष्टदायक है। सुनने में आ रहा है हॉस्पिटल में बेड मिलने से लेकर इंजेक्शन हासिल करने के लिए भी चहुँओर हाहाकार मचा है।

सरकार प्रशासन की बात ही करना फिजूल है, मनमाने दाम वसूले जा रहे है। पेशंट के घरवाले मरते क्या न करते, अपनो को बचाने के खातिर अपने जमीर को ताक पर रखकर मजबूरी में वह सब कर रहे हैं। यह कटु सत्य।

ऐसे समय मानवता को भुलाकर बेहिसाब धन कमाना बेहद शर्मनाक बात है। सबसे विशेष बात सरकार सख्ती लाये या न लाये, आपदा के समय हम इंसान को भी मानवता का धर्म निभाते हुये कार्य करना चाहिये।


आपदा में अवसर की तलाश अनुचित
पूजा काकाणी, इंदौर

वर्तमान आपदा की स्थिति में अवसर की तलाश सर्वथा अनुचित ही है। आज के समय में अस्पतालों में तिगुने भाव में दवाएं, इंजेक्शन और ऑक्सीजन सिलेंडर बेचे जा रहे हैं। अस्पतालों की चौगुना फीस लेकर चुकानी पड़ती है और उसके बाद भी डॉक्टर्स द्वारा उचित ट्रीटमेंट नहीं दिया जा रहा है।

पूजा काकाणी

परिवार जनों को तो पीड़ित व्यक्ति से मिलना तो दूर देखने की भी अनुमति नहीं है। आज मानव ‘ईश्वर’ से भी नहीं डरता। भूल गया है मानवता और पापी बन गया है। दया, धर्म, अच्छे कर्म सब विलुप्त से हो गए हैं।

मानव झूठी अकड़ और शान में इतना खो गया है कि वह भूल गया है, कि सब धरा रह जाएगा जब वह मृत्यु को पा जाएगा। आज ‘ईश्वर’ भी परीक्षा ले रहे हैं, दे रहे है चेतावनी। यदि मानव उसे समझ लेगा, तो उसका कल्याण हो जाएगा।

शीशे के घर में बैठकर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। मानवता एक सागर ही है, सागर की कुछ बूंदे खराब हो तो पूरा सागर गंदा नहीं हो जाता। ‘मानवता’ परमोधर्म है।


वास्तव में यह सहयोग का अवसर
पूजा नबीरा, काटोल

कितना बड़ा अवसर है यह कि इस आपदा में उजड़े को सवांरने में अपना हाथ-साथ देकर सहयोग करें। आँसू पोंछने के अवसर देखें। किन्तु अफ़सोस है, लोग आँसू में कमाई के अवसर तलाश रहे हैं। कितने दुःख की बात है, कालाबाज़ारी आसमान पर है। किन्तु आह की बुनियाद पर कमाया पैसा कितना सुखद होगा?

पूजा नबीरा

यह समय तो दुआ कमाने का है, जितना जैसा हो पाये अपनों और गैरो का हाथ थामने का है। किसी की मुस्कान को वापस लाने का अवसर है। भयानक दौर है। कल क्या हो किसने जाना? किसी को मुट्ठी भर उम्मीद देकर मनोबल बढ़ा कर उसका साहस बन जाने का अवसर हाथ से ना जाने दें।

अवसाद में अपनों की लाठी बने और आपदा में जीवन का मकसद, सबको खुशियाँ बाँटना यही अवसर है। इंसान होने का फर्ज अदा करें। चंद रुपये अगर लोगों की मज़बूरी से कमा भी लिये तो क्या सुख मिल जायेगा?

जाने कब किसकी आह से कमाया पैसा हमको दुःख दर्द दे जायेगा। हाँ, अवसर है आपदा में.. जो भी संभव हो करें छोटा से छोटा प्रयास भी किसी का सम्बल बन सकता है। इसलिये इंसानियत को जिंदा रखने का फर्ज निभायें।


ऐसे लोग मानवता के दुश्मन
भारती काल्या, कोटा

आज पूरा देश कोरोना महामारी से ग्रसित है। शासन-प्रशासन, समाज और चिकित्सा कर्मी हर संभव सहायता करने को तत्पर हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं भी तन मन धन से कोरोना पीड़ितों की हर संभव मदद करने को आगे आ रही हैं।

भारती काल्या

इस महामारी की आपदा में हम भी पीड़ित परिवारों की तन-मन-धन से मदद करें, अपना स्वार्थ छोड़ कर सेवाभावी बनें। जो स्वार्थी जन या संस्थाएं मानवता को शर्मसार करते हुए आपदा में अवसर तलाश कर अपनी तिजोरिया भर रही हैं और दवाइयों का घर में अनावश्यक संचय कर रही है, वह सरासर अनुचित है।

ऐसे स्वार्थी लोग और संस्थाएं ही इंसानियत के दुश्मन हैं। ऐसे लोगों के कारण ही कई बार समाज को भी शर्मसार होना पड़ता है। मुश्किल समय में दवाइयां न मिलने के कारण मरीजों की जान पर बन आती है।

सेवा करने का मिला अवसर, उसे स्वयं के लिए ना बनाए अवसर। देने में जो मजा है, वह संचय में कहां। त्याग में जो मजा है, वह भोग में कहा। अब तो जागो, हो जाओ सचेत भ्रष्टाचारियों व कालाबाजारियों, ठहरो ईश्वर से डरो। ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं।



Sri Maheshwari Times
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