पर्यावरण संरक्षण में मात्र कानून ही पर्याप्त?

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हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर कानून बने हुए हैं। ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिये ‘‘ग्रीन ट्रिब्यूनल’’ तक हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ हो ही नहीं सकता। लेकिन हकीकत यह है कि दिनोंदिन पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। हरियाली बढ़ने की जगह लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में विचारणीय हो गया है कि पर्यावरण संरक्षण में मात्र कानून पर्याप्त हैं या अपर्याप्त?

क्या इसमें आम व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिये? क्या सभी जिम्मेदारी सिर्फ न्यायालय पर छोड़ देना ही उचित है? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


कानून व जिम्मेदारी दोनों जरूरी
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

प्राकृतिक असंतुलन का अर्थ प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता देना है। अत: पर्यावरण संरक्षण के लिये सरकारी कानून का सख्ती से पालन जरूरत है और हमारी जिम्मेदारी भी है। भारत सरकार की कोशिश रहती है कि हमारा देश हरा-भरा रहे। इसके लिए भिन्न-भिन्न योजनायें और कानून भी बनाये गए हैं लेकिन उनको सरकारी अफसरों द्वारा निष्पादित करना और जनता से कड़ाई के साथ अमल करवाने वाली बात दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।

पर्यावरण संरक्षण
सुमिता मूंधड़ा

यही वजह है कि सभी सरकारी नियम-कानून कागजातों तक ही सीमित रह जाते हैं। दिनोंदिन बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगल काटे जा रहे हैं। जानवरों के घर-घोसलों को उजाड़कर इंसान अपना घर बसाने में लगे हैं। जनसंख्या के अनुपात में खाद्यान्न की उपज भी नहीं हो रही है, जिसकी भरपाई जीवों-जंतुओं को इंसानों का भोजन बनकर करनी पड़ रही है।

प्रकृति का संतुलन पूरी तरह से बिगड़ गया है और हम निरंतर किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार बनते जा रहे हैं। सरकारी कानून व्यवस्था हमारी जिजीविषा के लिए ही बनी है। सरकार को इसे युद्धस्तरीय जन-जागृति अभियान चलाकर जन-जन तक पहुंचाना होगा। हम नागरिकों को भी कानूनन अमल करना आवश्यक है।

मात्र वृक्षारोपण करके हम प्रकृति को हरा-भरा रखने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते हैं। वृक्ष के फलने-फूलने और विकसित होने तक अपनी जिम्मेदारी को निभाना होगा। हम लोग दिखावे के लिए आये दिन अपनी सुविधानुसार किसी भी जगह पर पौधारोपण करके तस्वीरों के जरिये वाह-वाही लूटते हैं।

इससे आत्मिक संतुष्टि नहीं होती है। एक जिम्मेदार नागरिक की भांति जीवनभर एक या दो पौधों का संरक्षण और पोषण करना उचित होगा ना कि वर्षभर अनगिनत पौधारोपण करना।


क़ानून काफी नहीं पर्यावरण संरक्षण के लिये
पूजा नबीरा, नागपुर

पर्यावरण संरक्षण में क़ानून ही पर्याप्त होता तो विश्व विनाश क़ी चौखट पर ना होता। पर्यावरण के विनाश क़ी कहानी मानव के घृणित स्वार्थ ने ही तो लिखी कि साँस को मोहताज हो गये हम सभी। किन्तु जुमलों से प्रकृति नहीं संवार सकते, कोई क़ानून जागृति नहीं ला सकता, जब तक हम अपनी जिम्मेदारी ना समझ लें।

पूजा नबीरा
पूजा नबीरा

पेड़ लगा कर फोटो डालने का मतलब कभी प्रकृति का लगाव प्रकट नहीं करता। भावी पीढ़ी को हम नर्क में धकेल रहे हैं, ना हवा, ना पानी रहेगा, साफ गर्म धरती पर कैसे पैदा होगा अनाज, सब कुछ ख़त्म हो जायेगा। दुनिया में मच जायेगी त्राहि त्राहि। प्रकृति कराह रही है, इंसान क़ी गद्दार फितरत से कि, इतना अहसान फरामोश है, जिसे पालती है प्रकृति, उसे ही नोंच लेता है।

क़ानून ही नहीं जमीर जागना चाहिये। मानव को हृदय से प्रकृति का सम्मान करना चाहिये। पंचतत्व से बनी काया मिट्टी में मिल जायेगी। पवन, धरा, अग्नि, आसमान, जल यही तो काया है। इसी को हमने प्रदूषित कर जिंदगी को जहन्नुम बना डाला। अब हम खुद विवश हो गये हैं, बर्बादी खुद ही अपने हाथों से लिख ली। क़ानून क्या करेगा?

अगर अंतरमन ना बदला तो फिर शायद बोतल में हवा और कैप्सूल में पानी लेकर जिंदगी के लिये लड़ना पड़ेगा। अतः मन से प्रकृति क़ी सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध होना होगा।


यह हर मानव की जिम्मेदारी
आनंदीलाल गांधी, उज्जैन

पर्यावरण संरक्षण को लेकर कानून तो बने हुए हैं किंतु इनका सख्ती से पालन करवाना, वन-जंगल को बचाना, प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखना, यह मात्र सरकार की ही नहीं हर मानव की भी जिम्मेदारी है। इसे केवल न्यायालय पर छोड़ देना ही पर्याप्त नहीं है।

आनंदीलाल गांधी
आनंदीलाल गांधी

आज मानव अपने निहित स्वार्थ के लिये जंगलों की कटाई कर रहा है। अपने लाभ के लिये बिल्डिंग कन्स्ट्रक्शन करके कांक्रीट जंगल की स्थिति निर्मित कर रहा है। बढ़ते नये-नये औद्योगिकरण के कारण अनगिनत पेड़ों की कटाई हो रही है। यही नहीं शहरीकरण करने में व नई-नई कॉलोनियां बनाने में तथा रोड चौड़ा करने आदि में पुराने लगे हुए हरे-भरे पेड़ कटते जा रहे हैं।

इसके कारण पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जब कि पेड़ों से होने वाले लाभ अनगिनत हैं। पेड़ स्वयं धूप में रहकर दूसरों को छाया देता है, फल देता है, ऑक्सीजन देता है और तो और कई वृक्षों की जड़ें, टहनियां व उनके पत्ते रोगों की रामबाण औषधि के रूप में मनुष्य को निरोग बनाने में सहायता करते हैं तो फिर मानव क्यों पर्यावरण के साथ खिलवाड़ कर रहा है?


सामाजिक संस्थाऐं भी दें प्राथमिकता
महेश कुमार मारू, मालेगांव

विधान (कानून) को बनाने का उद्देश्य अपराध की रोकथाम के अतिरिक्त प्रजा जनों को दिशा निर्देश देकर उस विशेष विषय को मूर्तरूप देने के लिए प्रेरित करना भी होता है। परन्तु आज निजी स्वार्थों के कारण न तो वन विभाग के छोटे बड़े कर्मचारी और अफसर ही इस ओर ध्यान दे रहे हैं, न ही सर्वसामान्य को जागरुक करने का कोई अभियान ही चलाया जा रहा है।

महेश कुमार मारू
महेश कुमार मारू

साथ ही साथ बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण अधिक कृषि भूमि एवं नये-नये विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों को पूर्ण करने के लिए पेड़ों को काटा जा रहा है। पर्यावरण का बहुत अधिक असंतुलित होना, बाढ़ आना, भूस्खलन होना आदि आपदाओं को हम स्वतः ही निमंत्रण दे रहे हैं।

इसके लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा देने वाले सार्वजनिक उपक्रम तो चलाने चाहिए, सामाजिक संस्थाओं को भी इस महत्वपूर्ण विषय को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि यह एक अभियान का रूप लेकर जन जन तक पहुंच सके। लोगों को इसके महत्व का गंभीरता से आभास हो सके और यह वसुधा पुन: हरे वस्त्रों में लिपट कर सुहावनी लग सके।


बच्चे को पालने जैसी है पौधों की देखरेख
पिंकी नवल डागा, जयपुर

हम जो भी पौधा उगाते हैं वह एक नए बच्चे को जन्म देने जैसा होता है। जैसे हर बच्चे को बढ़ने और मजबूत बनने के लिए पोषण की जरूरत होती है उसी तरह पौधों को भी होती है। आप सिर्फ ‘इसे रोपें और छोड़ दें’ ऐसा नहीं कर सकते। कितने पेड़ बचे हैं, यह कितने पेड़ लगाए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने इसे अपने माता-पिता माँ शारदा डागा और पिताजी नवल डागा से सीखा है जो पिछले 40 वर्षों से पर्यावरणविद् के रूप में सेवा दे रहे हैं।

पिंकी नवल डागा
पिंकी नवल डागा

इन्होंने अपना जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया है। एक नन्हा पेड़ बिल्कुल एक बच्चे जैसा होता है। जलवायु परिवर्तन को रोकने में मदद करने की इसमें अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसमें दशकों लग जाते हैं। लेकिन इस बीच, इसके खिलाफ बहुत काम हो रहा है। इनके बड़े होने में अत्यधिक चुनौती है। यह छोटा है, इसका अर्थ है यह कमजोर है, इसके तूफान, कीट, या अन्य आपदा से मरने का अधिक जोखिम अधिक है।

यदि ऐसा होता है, तो इसके भविष्य के जलवायु लाभ अचानक समाप्त हो जाएंगे। यह बहुत अच्छा है कि संगठन पेड़ लगाना आसान बना रहे हैं। लेकिन जैसा कि हम देखेंगे, नए पेड़ लगाने से हम उन अरबों पेड़ों की भरपाई नहीं कर सकते जिन्हें हम खो रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम मौजूदा पेड़ों और उनके पोषण के पोषण पर ध्यान दें।

जिस प्रकार हम बच्चे को पर्याप्त और अधिक पोषण देकर और भविष्य में उसे आत्मविश्वासी और मजबूत बनाने के लिए आवश्यक जोखिम देकर उसकी देखभाल करते हैं- उसी तरह हमें आवश्यक खाद डालकर और ट्री गार्ड लगाकर और नियमित रूप से उसे गमले में डालकर अच्छा पोषण देना होगा। स्पर्श और अनुभव द्वारा भी उस प्रेम और देखभाल को प्रदर्शित करना जरूरी है।

मैंने इसे हाल ही में देखा है जब मैं अपने पौधों से मिलती हूं- वे उसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं जैसे बच्चे। जब आप उन्हें कसकर गले लगाते हैं तो प्रतिक्रिया देते हैं। यह हमारे पौधों को गले लगाने और प्यार दिखाने का समय है और उन चमत्कारी ऊर्जाओं का आनंद लें जो वे आपको वापस विकीर्ण करती हैं और आपकी आभा को हरा-भरा और उज्जवल बनाती हैं। अत: अपने आस-पास अपने पौधों को खुश व पोषण से भरपूर रहने दें।



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