माता सरस्वती का उत्पत्ति पर्व- बसंत पंचमी

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ऋतुराज बसंत के आगमन का पर्व बसंत पंचमी वास्तव में ज्ञान-विद्या की देवी माता सरस्वती का उत्पत्ति पर्व है। यह ऐसा पर्व है जिसे सम्पूर्ण प्रकृति भी श्रृंगारित होकर मनाती है।

Goverdhandas Binnani

पतझड़ के बाद ऋतुराज वसंत का आगमन होता है जिसे हम ऋतुराज, कामसखा, पिकानन्द, पुष्पमास, पुष्प समय, मधुमाधव आदि नामों से भी पुकारते हैं। इस ऋतु में वन-उपवन, बाग-बागीचों में लताएं, नए-नए लाल-हरे कोमल पत्तों से ही नहीं बल्कि नाना प्रकार के पुष्पों से भी भर जाती हैं।

इस प्रकार मौसम और प्रकृति में जो मनोहारी बदलाव होते हैं उससे प्रकृति का कण-कण खिल उठता है यानि हम मानवों के साथ-साथ पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। पतझड़ पश्चात आने वाली माघ शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी या श्रीपंचमी या ज्ञान पंचमी के नाम से जाना जाता है।

इस दिन को ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। इसलिये इस दिन विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा बड़े ही उल्लास व उमंग के साथ की जाती है। यह त्यौहार पूरे भारत में इसमें भी खासकर पूर्वी भारत के साथ पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बहुत ही बड़े रूप में बड़े उल्लास से मनाया जाता है।


विद्यार्जन की शुरुआत का विशिष्ट पर्व

बसंत पंचमी के दिन को स्वयं सिद्ध मुहूर्त वाला दिन माना जाता है जिसका मतलब होता है उस दिन प्रारंभ होने वाला हर कार्य सफलता को प्राप्त करेगा ही। इसीलिए इस दिन दूरगामी योजनाओं की शुरुआत या शिशुओं को विद्यार्जन के लिए पहली बार स्लेट, पाटी या पोथी की पूजा अर्चना करवा कर सबसे पहले अक्षर ज्ञान के साथ-साथ लिखना सिखाया जाता है और पाठशाला में दाखिला भी कराया जाता है।

बसन्त पंचमी वाले दिन स्कूलों में शिक्षक हों या विद्यार्थी सभी पूरे उमंग व उल्लास के साथ विद्या की देवी माता सरस्वती की प्रतिमा को मंच पर स्थापित कर विधि-विधान के साथ सामूहिक पूजा अर्चना करते है।

इसके उपरांत आधुनिक युग के सर्वाधिक क्रान्तिकारी, प्रगतिवादी, चेतना के ओजस्वी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के चित्र पर माल्यार्पण वाले कार्यक्रम पश्चात सभी उपस्थित उनके लिखित सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘वर दे, वीणावादिनि वर दे। प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे।’ से समवेत स्वरों में प्रार्थना करते हैं। इस दिन प्रायः सभी विद्यालयों में या तो वार्षिकोत्सव का आयोजन किया जाता है या माँ शारदा के भक्ति गीतों का आयोजन होता है।


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