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भोजन की अति मनुहार करना-उचित अथवा अनुचित?

हमारे समाज में पारिवारिक और सामाजिक कार्यक्रमों में मेजबानों द्वारा मेहमानों का स्वागत और आतिथ्य बहुत मान-सम्मान से किया जाता है। यही हमारा धर्म है – अतिथि देवो भव:। मेजबान द्वारा मेहमानों की खातिरदारी भोजन के समय भी दिल खोलकर की जाती है। मेहमान के बार-बार मना करने के उपरांत भी उसकी थाली में चीजें परोस दी जाती है अथवा मुँह में जबरदस्ती खिलाई जाती है। इसमें मेजबान का स्नेह व सम्मान छुपा होता है। अत: यह परम्परा विगत कई वर्षों से चली आ रही है। दूसरी ओर देखा जाए तो अगर मेहमान जबरदस्ती खा ले तो उसका स्वास्थ्य खराब हो जाता है और अगर न खाए तो वह खाना थाली में व्यर्थ जाता है। यही कारण है कि आजकल लोग पंगत में बैठकर खाना खाने से कतराते हैं। सोच है कि दशकों पुरानी हमारी मनुहार की परंपरा-पद्धति वर्तमान समय में मेहमानों का स्वास्थ्य बिगड़ने और भोजन को व्यर्थ करने का कारण बनती जा रही है। एक वर्ग अब सोचने लगा है कि इस परम्परा को पीछे छोड़कर हमें मेहमानों को उनकी पसंद से इच्छानुसार खाना खाने देना चाहिए।

ऐसे में यह विचारणीय हो गया है कि भोजन की अति मनुहार करना उचित है या अनुचित? उक्त विषय पर आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंधड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


अनुचित व्यवहार-अति मनुहार
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

हमारी परंपरा ‘अतिथि देवो भव’ कहावत का अर्थ अतिथियों का यथोचित आदर-सत्कार करना है उन्हें परेशान करना नहीं । मेहमान की मनुहार करनी चाहिए पर उसकी इच्छा का भी मान रखना चाहिए। मेहमान की थाली को मेजबान के मुताबिक परोसना गलत है। थाली में जबरदस्ती परोसा गया खाना न तो मेहमान खाना चाहता है और न ही जूठा डालना चाहता है; ऐसे में खाने की अतिमनुहार मेहमान को असहज बना देती है।

मेहमान को ठूंस-ठूंसकर खिलाया गया खाना अपाच्य हो जाता है तथा मेहमान के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है। अगर मेहमान अपनी रुचिनुसार भोजन गृहण करे तो थाली में आवश्यकता से अधिक परोसा गया भोजन व्यर्थ जाता है। हमारे दादा-दादी के जमाने में हवा-पानी ही नहीं खाद्य पदार्थ भी शुद्ध और सात्विक होते थे, जिससे लोगों की खुराक और सेहत भी अच्छी रहती थी पर आज के दौर में प्रदूषित हवा-पानी और मिलावटी खाद्यों के कारण हर उम्र में शारीरिक व्याधियां पनपती रहती है जिससे खाने-पीने का ध्यान रखना अति आवश्यक है।

एक बार मेजबान स्वयं को मेहमान के स्थान पर रखकर विचार करें कि अगर उसके साथ भी अति मनुहार हो तो स्वास्थ्य पर कैसा असर पड़ेगा और खाना भी व्यर्थ होगा। आवश्यक है प्यार और सहजता के साथ मेहमान को रुचिकर और इच्छित भोजन करने दें कि मेहमान आपकी मेहमाननवाजी को अच्छी यादों में संजोकर रखे।


समयानुसार मनुहार सही नहीं
रामजस सोनी, बागोर-भीलवाडा

भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का अर्वाचीन इतिहास रहा है कि आगन्तुक मेहमान को भोजन के समय मान-मनुहार के साथ भोजन करवाया जाता रहा है, जिससे मेहमान के मन में सम्मान महसूस होता था। मेजबान भी अपणायत से भोजन की परोसगारी करता था। यह वह दौर था जब जिमने (खाने) वाला खाने को बिना हाजमे की गोली के हजम कर जाता था। कई शख्स तो ऐसे होते थे, जो कहते थे कि रखो मत खवाई जाओ और वो खा भी लेते थे, क्योंकि मेहनत करते थे जिनसे वो लोग जितना खाते उसको पचा लेते वो कभी बीमार नही पड़ते थे। पर आज के समय में शुद्ध के लिए युद्ध है।

आज के मेहमान की भूल से भी भोजन के समय और मनवार कर ली जाए तो वह भोजन झूठा ही पड़ेगा, यह निश्चित है। आज के समय में हर व्यक्ति, समाज, समूह भोजन को बिठाकर नही जिमाते है जिधर भी देखा जाए बफर भोजन की व्यवस्था है। आगन्तुक को एक समय में बहुत सी जगह भी जाना होता है शायद वो कितनी भी जगह जाए ढंग से भोजन भी नही कर पाता है। लिफाफा दिया और खाया तो खाया नही तो आगे के लिए रवाना। अपणायत के लिए चाय काफी तो है ही मूड को तरोताजा रखने के लिए आइस्क्रीम का कहना क्या? जो चाहे जो खावे वो अपनी मर्जी से खाऐं।

जमाने का भाव यह है यह दौर मान मनुहार का नही है। यदि मनुहार करके और भोजन परसोगे तो खाना भी झूठा पड़ेगा। यदि शरम के कारण खा लिया तो बीमार होने का, अजीर्ण, बदहजमी होने का अन्देशा रहता है। आज हर एक ईन्सान बीपी, शगुर, हार्ट, गठिया आदि बीमारियों से पीड़ित है। अपथ्य है जो अलग उसे चाहकर भी और खाने की मनुहार नही कर सकते। आप मेहमान को बेमन से अधिक खिलाऐंगे तो झूठा ही जाएगा। अत: मान-मनुहार करके भोजन नही कराना चाहिए।


अति मनुहार के परिणाम अच्छे नहीं होते
ललित लखोटिया, सरदारशहर

आज महंगाई के दौर में आर्थिक नुकसान के साथ आज का राशन सेहत के लिए हानिकारक है। साथ ही व्यंजन बनाने में समय बर्बाद होता है, ना चाहते हुए भी विशुद्ध सामग्री से बनाना, जबरदस्ती मेहमान को ठूंसना, नतीजा जूठन, शारीरिक नुकसान और मिडिल क्लास पर आर्थिक बोझ के साथ महिलाओं द्वारा घर के काम, बच्चों की पढ़ाई छोड़कर जो मेहमान न खाए, उसे भी बनाकर रख देना।

बजट न होते हुए झूठा दिखावा करना, मेहमान ज्यादा तो जाने के बाद काम निपटाना, बचे खुचे को गलियों में गिराना आदि समझ से परे है। इससे अच्छा है कि मेहमाननवाजी करें लेकिन मेहमान की पसन्द व संख्या देखकर, ताकि मेहमान खुश हो और नई पीढ़ी को प्रेरणा मिले कि हमें भी किसी के घर मेहमान नहीं अपना मानकर जाना होगा।


मना का मान रखें
मनीषा राठी, उज्जैन

भारतीय संस्कृति ‘अतिथि देवो भव’ की पृष्ठभूमि पर विश्वास रखती है। मनुहार करके अतिथि को भोजन कराना हमारी परंपरा और संस्कृति का विशेष अंग है। अतिथि मनुहार का मान रखते हुए भर पेट भोजन के बाद भी कुछ अतिरिक्त भोजन कर लेते हैं और उनका स्वास्थ्य गवारा करता है तो कोई बात नहीं। किन्तु वर्तमान में प्रदूषित वातावरण में व्यक्ति अनेक रोगों से ग्रसित हैं तो ऐसी स्थिति में यदि उन्हें ज़बरदस्ती अति मनुहार करके भोजन कराया जाए तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।

वर्तमान समय में अब उतने औपचारिक व्यवहार भी नहीं रह गए हैं, हम भी मुख्ययत: उन घरों में भोजन करते हैं जहाँ अधिकार होता है तो निश्चित रूप से अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार भोजन करते है। वहाँ अति मनुहार की आवश्यकता ही नहीं होती; तो मेरे हिसाब से ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’।

व्यक्ति अपनी इच्छानुसार भोजन कर रहा है। थोड़ी बहुत मनुहार शिष्टाचार के अंतर्गत आती है किंतु अति मनुहार व्यक्ति के लिए परेशानी का कारण न बने। अच्छा ये होगा कि एक दो बार की मनुहार के बाद भी अतिथि खाने से मना कर रहे हैं तो उनकी ‘मना का मान’ रखें और अन्न की बर्बादी से बचने के साथ ही उनके स्वास्थ्य की रक्षा के दायित्व का भी निर्वहन करें।


भोजन की अति मनुहार अनुचित
विमला जाजू, पाली

आज से 20-30 वर्ष पूर्व लोग शारीरिक श्रम बहुत ज्यादा करते थे, तो भोजन भी सहज रूप से पच जाता था और नींद भी भरपूर आती थी। ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां तो सुनने में भी बहुत कम आती थी। जीवन सहज, सरल और तनाव मुक्त था। आज अर्थ क्रांति के इस युग में शारीरिक मेहनत की जगह मानसिक मेहनत हम लोग ज्यादा कर रहे हैं।

घर का खाना भी नौकर-नौकरानियों से ही बन रहा है और हम लोग मातृ अर्थ के चिंतन में ही फंसे हैं। सारे दिन कुर्सी टेबल पर बैठकर काम करने से शारीरिक क्षमता शनैः शनैः क्षीण होती जा रही है। जहां चार फुल्के आराम से पच जाते थे आज दो फुल्के भी मुश्किल से पच पाते हैं। ऐसे में भोजन की अति मनुहार करना मैं तो अनुचित ही कहूंगी।


भोजन की अति मनुहार अनुचित
पूजा अनमोल काकानी, इंदौर

भोजन की अति मनुहार करना अनुचित है। परिवार में और समाज में रहकर मनुहार करना, मान सम्मान देना, आव भगत करना उचित है परंतु उसकी अति होना बहुत ही भारी पड़ जाती है। मेहमान की मेजबानी और खातेदारी दिल खोलकर की जानी चाहिए, उन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए, परंतु भोजन की जब बात आती है, तो बहुत ही प्रैक्टिकल होना चाहिए, क्योंकि उनके मना करने पर भी जबरदस्ती परोसा, थाली में रखना गलत है। वह उसे ऐसे ही झूठा छोड़ देते हैं और पूरा खाना वेस्ट होता है। यदि वही खाना किसी भी जीव जो भूखा है, उसके अंग पर लगता तो उसका सही उपयोग होता, बजाए वेस्ट होने के।

आजकल कोई ज्यादा मीठा नहीं खाना पसंद करता है ना ही मसालेदार एवं गरिष्ठ भोजन करना पसंद करता है, क्योंकि सभी को सब तरह की चीजे सूट नहीं करती है। वैसे भी सबको मालूम है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यकता से थोड़ा कम भोजन करना चाहिए। जरूरत से ज्यादा खाने से बीमारियां और आलस बढ़ता है। व्यर्थ ना परोसे सभी से रिक्वेस्ट है। आजकल सब पढ़े लिखे हैं, सब समझदार है।

सबको पता है कि – श्रम लगता है अनाज उगाने में, श्रम लगता है भोजन पकाने में। अन्न के हर दाने को सोना चांदी समझें, जितना खा सको उतना ही परोसें थाली में। व्यर्थ का दिखावा नहीं करें। परोसगारी करते समय व्यर्थ का दिखावा न करें।


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