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दीपावली पर कैसे करें विधिविधान से पूजन

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि सही विधिविधान से किया गया देव पूजन ही सम्पूर्ण मनोकामना की पूर्ति करता है। फिर जब बरत दीपावली पर्व पर पूजन की हो तो इस पर तो सभी सुख-समृद्धि ही निर्भर रहेगी। तो आईये जानें कैसे करें शास्त्रोक्त विधिविधान से पूजन, जिससे हो माता महालक्ष्मी की अनन्य कृपा।

प्रथम पर्व- धनतेरस :

पूजन विधि-

सर्वप्रथम नहाकर साफ वस्त्र धारण करें। भगवान धन्वन्तरि की मूर्ति या चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें तथा पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाएं। उसके बाद भगवान धनवन्तरि कर आह्वान निम्न मंत्र से करें-

सत्यं च येन निरत रोग विधूतं
अन्वेषित च सविधिं आरोग्यमस्य ।

गूढ़निगूढ़ औषध्यरूपम्, धन्वंतरि च सततं प्रणमामि नित्यं।

इसके पश्चात पूजन स्थल पर आसन देने की भावना से चावल चढ़ाएं। इसके बाद आचमन के लिए जल छोड़ें। भगवान धन्वंतरि के चित्र पर गंध, अबीर, गुलाल, पुष्प आदि चढ़ाएं। चांदी के पात्र में खीर का नैवेद्य लगाएं। (अगर चांदी का पात्र उपलब्ध न हो तो अन्य पात्र में भी नैवेद्य लगा सकते हैं।) तत्पश्चात पुनः आचमन के लिए जल छोड़ें। मुख शुद्धि के लिए पान, लौंग, सुपारी चढ़ाएं। भगवान धन्वंतरि को अर्पित रोगनाश की कामना के लिए इस मंत्र का जाप करें-

‘‘ॐ रं रुद्र रोगनाशाय धन्वंतर्य फट्।।’’


इसी दिन इसके बाद भगवान धन्वंतरि को श्रीफल व दक्षिणा चढ़ाएं। पूजन के अंत में कर्पूर आरती करें। घर के मुख्य द्वार पर यमराज के निमित्त दीपदान करना चाहिए। रात्रि को एक दीपक में तेल, एक कौड़ी, काजल, रौली, चावल, गुड़, फल, फूल व मीठे सहित दीपक जलाकर यमराज का पूजन करना चाहिए। दीप प्रज्जवलित करते समय निम्न मंत्र से प्रार्थना करनी चाहिए-

‘‘मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्याय सह।
त्योदश्यां दीपदानात्सूर्यजः प्रीयतामित।।’’

इस मंत्र के साथ पूजन करने से अच्छे फल प्राप्त होते हैं।

द्वितीय पर्व- नरक चतुर्थी:

पूजन विधि-

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहते हैं। इस दिन यमराज की पूजा व व्रत का विधान है। इस दिन शरीर पर तिल के तेल से मालिश करके सूर्योदय के पूर्व स्नान के दौरान अपामार्ग (एक प्रकार का पौधा) को शरीर पर स्पर्श करना चाहिए। अपामार्ग को निम्न मंत्र पढ़कर मस्तक पर घुमाना चाहिए-

सितालोष्ठसमायुक्त सकण्टकदलान्वितम्।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः ।।

स्नान करने के बाद शुद्ध वस्त्र पहनकर तिलक लगाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यम से परिवार के सुख की कामना करें। इसके साथ ही प्रदोषकाल में चार बत्तियों वाला दीपक जलाकर दक्षिण दिशा में रखें और उसका निम्न मंत्र से पूजन करें-

‘‘दीपश्चतुर्दश्यां नरक प्रीतये मया।
चतुर्वर्ति समायुक्तर्वपानतये। (लिंग पुराण)

अर्थात- आज चतुर्दशी के दिन नरक के अभिमानी देवता की प्रसन्नता तथा सर्व पापों के नाशों के लिये मैं 4 बत्तियों वाला चौमुखा दीप अर्पित करता/करती हूं।

तृतीय- दीपावली महापर्व:

पूजन विधि-

कार्तिक कृष्ण अमावस्या (दीपावली) को भगवती श्री महालक्ष्मी एवं भगवान गणेश की नूतन (नयी) प्रतिमाओं का प्रतिष्ठापूर्वक विशेष पूजन किया जाता है। पूजन के लिये किसी चौकी अथवा कपड़े के पवित्र आसन पर गणेशजी के दाहिने भाग में माता महालक्ष्मी की मूर्ति को स्थापित करें। पूजन के दिन घर को स्वच्छ कर पूजा स्थान को भी पवित्र कर लें एवं स्वयं भी पवित्र होकर श्रद्धा भक्ति पूर्वक सायंकाल महालक्ष्मी व भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। श्री महालक्ष्मीजी की मूर्ति के पास ही पवित्र पात्र में केसर युक्त चंदन से अष्टदल कमल बनाकर उस पर द्रव्य लक्ष्मी (रुपयों) को भी स्थापित करें तथा एक साथ ही दोनों की पूजा करें। सर्वप्रथम पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख हो आचमन, पवित्री धारण, मार्जन, प्राणायाम कर अपने ऊपर तथा पूजा-सामग्री पर निम्न मंत्र पढ़कर जल छिड़कें।

‘‘ॐ अपवित्रः पवित्रों वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्मभ्यन्तरः शुचिः ।।’’

उसके बाद जल अक्षत लेकर पूजन का निम्न मंत्र से संकल्प करें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य मासोत्तमे मासे कार्तिक मासे कृष्णपक्षे पुण्याममावस्यायां तिथौवार का उच्चारण वासरे… (वार का नाम) गोत्रोत्पन्नः (गोत्र का उच्चारण करें) /गुप्तोहंश्रुतिस्मृतिपुराणोक्त-फलावाप्तिकामनया ज्ञाताज्ञातकायिकवाचिकमानसिक सकल-पापानिवृत्तिपूर्वकं स्थिरलक्ष्मीप्राप्तये श्री महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं महालक्ष्मीपूजनं कुबेरादीनां च पूजनं करिष्ये। तदड्त्वेन गौश्रीगणपत्यादिपूजनं च करिष्ये।

ऐसा कहकर संकल्प का जल छोड़ दें।

प्रतिष्ठा-पूजन से पूर्व नूतन प्रतिमा की निम्न रीति से प्राण प्रतिष्ठा करें। बाएं हाथ मे चावल लेकर निम्नलिखित मंत्रों को पढ़ते हुए दाहिने हाथ से उन चावलों को प्रतिमा पर छोड़ते जाए-

ॐ मना जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पितिर्यज्ञमिमं
तनात्वरिष्टं समिमं दधातु।
विश्वे देवास इह मादयन्तामोम्पतिष्ठ।
ॐ अस्ये प्राणाः प्रतिष्ठन्तु
अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।
अस्ये देवत्वपमर्चायै मामहेति च कश्चन।।

पूजन-

सर्वप्रथम भगवान गणेश का पूजन करें इसके बाद कलश तथा षोडशमातिृका का (सोलह देवियों का) पूजन करें। तत्पश्चात प्रधान पूजा में मंत्रों द्वारा भगवती महालक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करें।

‘ॐ महालक्ष्म्यै नमः’ इस नाम मंत्र से भी उपचारों द्वारा पूजा की जा सकती है।

प्रार्थना-

विधिपूर्वक श्री महालक्ष्मी का पूजन करने के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-

सुरासुरेंद्रादिकिरीटमौक्तिकै-
युक्तं सदा यक्तव पादवपंकजम् ।
परावरं पातु वरं सुमंगल
नमामि भक्तयाखिलकामसिद्धये ।।
भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनी ।।
सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोस्तु ते।
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये।
या गतिस्त्वत्प्रपन्ननां सा में भूयात् त्वदर्चनात् ।।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः
प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान् समर्पयामि।

प्रार्थना करते हुए नमस्कार करें।

समर्पण- पूजन के अंत में-

‘कृतोनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम् न मम।’

यह वाक्य उच्चारण कर समस्त पूजन कर्म भगवती महालक्ष्मी को समर्पित करें तथा जल गिराएं।

मंत्र पुष्पांजलि:

आरती पश्चात दोनों हाथों में कमल आदि के पुष्प लेकर हाथ जोड़े और निम्न मंत्र का पाठ करें-

‘‘ॐ या श्री स्वयः सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी‘
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालन देवि विश्वम्।।
‘‘ॐ श्री महालक्ष्मै नमः मंत्र पुष्पांजलि समर्पयामि।।

विसर्जन:

पूजन के अंत में अक्षत लेकर श्रीगणेश एवं महालक्ष्मी की नूतन प्रतिमा को छोड़कर अन्य सभी आवाहित प्रतिष्ठित एवं पूजित देवताओं को अक्षत छोड़ते हुए निम्न मंत्र से विसर्जित करें-

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादय मामकीम।

दीपावली पर अन्य महत्वपूर्ण पूजन:

देहली विनायक पूजन-व्यापारिक प्रतिष्ठानादि में दीवारों पर ‘‘ॐ श्रीगणेशाय नमः’’ स्वस्तिक चिह्न, शुभ-लाभ आदि मांगलिक एवं कल्याण शब्द सिंदूर से लिखे जाते हैं। इन्हीं शब्दों पर ‘‘ॐ देहलीविनायकाय नमः’’ इस नाममंत्र द्वारा गंध-पुष्पादि से पूजन करें।
श्रीमहाकाली (दवात) पूजन- स्याहीयुक्त दवात को भगवती महालक्ष्मी के सामने पुष्प तथा चावल के ऊपर रखकर उस पर सिंदूर से स्वस्तिक बना दें तथा मौली लपेट दें।
‘‘ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः’’ मंत्र से गंध-पुष्पादि पंचोपचारों या षोडशोपचारों से दवात तथा भगवती महाकाली का पूजन करें और अंत में इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक उन्हें प्रणाम करें-

‘‘कालिके त्वं जगन्मातर्मसिरूपेण वर्तस।
उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये।।
या कालिका रोगहरा सुवन्द्या
भक्तैः समस्तैव्यवहारदक्षैः।
जगजनानां भयहारिणी च सा लोकमाता मम सौख्यादास्तु।।’’
लेखनी पूजन- लेखनी (कलम) पर मौली बांधकर सामने रख लें और-
‘‘लेखनी निर्मित पूर्व ब्रम्हाणा परमेष्ठिना।
लोकांना च हितर्थय तस्मात्तां पूज्याम्यहम्।।
ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः।’’

इस नाममंत्र द्वारा गंध, पुष्प, चावल आदि से पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करें-

‘‘शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्युयाद्यातः।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव।।’’

बहीखाता पूजन:

बही, बसना तथा थैली में रोली या केसरयुक्त चंदन से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं एवं थैली में पांच हल्दी की गांठ, धनिया, कलमगट्टा, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य रखकर सरस्वती का पूजन करें। सर्वप्रथम सरस्वती का ध्यान इस प्रकार करें-

‘‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युशंकरप्रभृतिभिदेवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः ’’

इस नाममंत्र से गंधाकादि उपचारों द्वारा पूजन करें

कुबेर पूजन:

तिजोरी अथवा रूपए रखे जाने वाले संदूक आदि को स्वस्तिकादि से अलंकृत कर उसमें निधिपति कुबेर का आह्वान करें-

‘‘आवाहयामि देव त्वामिहायाहि कृपां कुरू।
कोशं वद्राय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर ।।’’

आह्वान के बाद ॐ कुबेराय नमः नाममंत्र से गंध, पुष्प आदि से पूजन कर अंत में इस प्रकार प्रार्थना करें।

‘‘धनदाय नमस्तुभ्य निधिपद्माधिपाय च।
भगवान् त्वप्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः।।’’

इस प्रकार प्रार्थनाकर पूर्व पूजित हल्दी, धनिया, कमलगट्टा, द्रव्य, दूर्वादि से युक्त थैली तिजोरी में रखें।

तुला (तराजू) पूजन:

सिंदूर से तराजू पर स्वस्तिक बना लें। मौली लपेटकर तुला देवता का इस प्रकार ध्यान करें-

‘‘नमस्ते सर्वदेवानां शक्तित्वे सत्यमाश्रिता।।
साक्षीभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना।।’’
ध्यान के बाद ‘‘ॐ तुलाधिष्ठातृदेवतायै नमः’’

इस मंत्र से गधाक्षतादि उपचारों द्वारा पूजन करें।

दीपमालिका (दीपक) पूजन:

किसी पात्र में ग्यारह, इक्कीस या उससे अधिक दीपकों को प्रज्वलित कर महालक्ष्मी के समीप रखकर उस दीपज्योति का ‘‘ॐ दीपावल्यै नमः’’ इस नाममंत्र से गंधादि उपचारों द्वारा पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करें-

‘‘त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चनद्रो विद्यर्दिनश्व तारकाः।
सर्वेषा ज्योतिषां ज्योतिर्दीपाल्यै नमो नमः।।’’

दीपमालाओं का पूजन कर संतरा, ईख, धान, इत्यादि पदार्थ चढ़ाएं। धान का लावा (खील) गणेश, महालक्ष्मी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं को भी अर्पित करें। अंत में अन्य सभी दीपकों को प्रज्वलित करें।

दीपावली महापर्व पर आखिर ऐसा क्यों?

दीपपर्व दीपावली के सतत पर्वों में विभिन्न पूजा होती है और कई परम्पराओं का निर्वहन होता है। आमतौर पर हम इन सभी का पालन परम्परा मानकर ही करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने किया इसलिये हम कर रहे हैं। आइये जानें शास्त्र सम्मत कारण इन विशिष्ट पूजा तथा परम्पराओं का कि आखिर ऐसा किया जाता है, तो क्यों?

धनतेरस पर दीपदान:

धनतेरस पर भगवान यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो धनतेरस के दिन दीपदान करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता। इस मान्यता के पीछे पुराणों में एक कथा वर्णित है। एक समय यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या कभी तुम्हें प्राणियोें के प्राण का हरण करते समय किसी पर दयाभाव भी आया है। तो वे संकोच में पड़कर बोले-नहीं महाराज! यमराज ने उनसे दोबारा पूछा तो उन्होंने संकोच छोड़कर बताया कि एक बार एक ऐसी घटना घटी थी, जिससे हमारा हृदय कांप उठा था। हेम नामक राजा की पत्नी ने जब एक पुत्र को जन्म दिया तो ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक जब भी विवाह करेगा, उसके चार दिन बाद ही मर जाएगा। यह जानकर उस राजा ने बालक को यमुना तट की गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में रखकर बड़ा किया। एक दिन जब महाराजा हंस की युवा बेटी यमुना तट पर घूूम रही थी, तो उस ब्रह्मचारी युवक ने मोहित होकर उससे गंधर्व विवाह कर लिया। चौथा दिन पूरा होते ही वह राजकुमार मर गया। अपने पति की मृत्यु देखकर उसकी पत्नी बिलख-बिलखकर रोने लगी। उस नवविवाहिता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय कांप उठा। उस राजकुमार के प्राण हरण करते समय हमारे आंसू नहीं रूक रहे थे। तभी एक यमदूत ने पूछा-क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है? यमराज बोले -हां उपाय तो है। अकाल मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को धनतेरस के दिन पूजन और दीपदान विधिपूर्वक करना चाहिए। जहां यह पूजन होता है, वहां अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता। कहते हैं कि तभी से धनतेरस के दिन यमराज के पूजन के पश्चात् दीपदान करने की परंपरा प्रचलित हुई।

धनतेरस पर धनवन्तरी पूजन?

धनतेरस का त्योहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है। इस दिन भगवान धनवन्तरी क्षीरसागर से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए वैद्य समाज हर्षोल्लास के साथ धन्वंतरि जयंती मनाता है। उल्लेखनीय है कि अमृतपान करने वाला प्राणी अमर हो जाता है, इसीलिए धनवन्तरि भगवान ने देवताओं को अमृतपान करवाकर अमर कर दिया था। भगवान विष्णु के अंश से अवतरित भगवान धनवन्तरि आयुर्वेद के प्रवर्तक तथा आरोग्य के देवत के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। यही कारण है कि धनतेरस के दिन दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए भगवान धनवन्तरि के पूजन का विशेष माहात्म्य है। धनतेरस की प्राचीनता का प्रमाण वैदिक साहित्य में भी पाया जाता है। चूंकि यमराज वैदिक देवता माने जाते हैं, इसलिए इस दिन यमराज की भी पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन लक्ष्मी का आवास घर में माना जाता है। इस तिथि को पुराने बरतनों के बदले नये बरतन खरीदना शुभ माना गया है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि चांदी के बरतन खरीदने से अधिक पुण्य लाभ मिलता है। 

नरक चतुदर्शी पर यम पूजन?

दीपावली के एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। नरक चतुर्दशी का पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं में से एक कथा नरकासुर वध की भी है। प्रागज्योतिषिपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से इंद्र,वरूण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया। वह संतों को भी त्रास देने लगा। महिलाओं पर अत्याचार करने लगा। उसने संतों आदि की १६ हजार स्त्रियों को भी बंदी बना लिया। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषिमुनि, भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नरकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया। लेकिन नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध कर दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आंतक से मुक्ति दिलाई। तभी से नरक चतुर्दशी तथा अगले दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।

लक्ष्मी के साथ अन्य देवों की पूजन:

इस त्यौहार की व्रत कथा का उल्लेख धर्मग्रंथों में इस प्रकार हुआ है- ‘एक बार सनतकुमार ने शौनकादि ऋषि-मुनियों से पूछा-दीपावली के त्यौहार पर लक्ष्मीजी के अलावा अन्य देवी-देवताओं का पूजन क्यों किया जाता है? वे बोले-एक बार दैत्यराज बलि ने अपने बाहुबल से अनेक देवी-देवताओं सहित लक्ष्मीजी को बंदी बनाकर कारागर में डाल दिया। जब कार्तिक की अमावस्या को श्रीहरि विष्णु भगवान ने वामन का रूप धारण कर बलि को बांध लिया, तब कहीं जाकर उन सभी को कारागार से मुक्ति मिली। फिर श्रीहरि लक्ष्मी के साथ शयन हेतु क्षीरसागर में चले गये। इसीलिए अन्य देवी-देवताओं के साथ लक्ष्मी के शयन व पूजन का विधान बनाया गया है। जो भी व्यक्ति उनका स्वागत उत्साहपूर्वक करके स्वच्छ कोमल शय्या प्रदान करता है, पूजन करता है, उनको लक्ष्मी छोड़कर नहीं जाती। जबकि प्रमाद व निद्रा मे पड़े लोगों के घर लक्ष्मी नहीं जाती।

क्यों मनता है दीपपर्व?

ब्रह्मा, विष्णु और शिव से वरदान पाकर दैत्यराज महिषासुर तीनों लोकों में आंतक मचाने लगा। इससे दुःखी देवता और मानव त्रिदेवों के पास पहुँचे तो शिव के सुझाव से देवी पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती से शक्तियां प्राप्त कर शक्ति स्वरूपा काली का जन्म हुआ। महादेवी और महिषासुर में नौ रातों तक भयंकर संग्राम चला। इसमें महिषासुर का अंत हुआ। इसके बाद भी देवी का क्रोध शांत नहीं हुआ और रौद्र रूप में नृत्य करने लगी। तब भगवान शिव ने कहा कि दीप जलाकर, मंगल गीतों से देवी की आराधना करो। तब से दीप पर्व मनाया जाने लगा।

इसी प्रकार वामन अवतार में दानवीर राजा बली की त्रिलोक विजय से भयभीत इंद्र ने भगवान विष्णु से उसे रोेकने का अनुरोध किया। भगवान बौने का रूप धारण कर बली के पास पहुंचे और कहा, मुझे अपने तीन कदम के बराबर भूमि दान चाहिए। फिर उन्होंने विराट रूप धारणकर एक कदम में पूरी धरती, दूसरे कदम में पूरा आकाश नाप लिया। बली को यह समझते देर नहीं लगी कि वे स्वयं नारायण हरि हैं। उसने हाथ जोड़कर कहा कि तीसरे पग के लिए मेरा मस्तक प्रस्तुत है। भगवान ने उसके सिर पर पैर रखकर उसे पाताल में भेज दिया। उन्होंने बली की दानशीलता से प्रसन्न होकर यह वरदान दिया कि उसकी याद में धरती पर प्रतिवर्ष दीपोत्सव मनाया जाएगा।


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