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माहेश्वरी समाज जयपुर द्वारा प्रथम सामूहिक विवाह

वर्तमान में समाज के लिये सामूहिक विवाह के आयोजन कोई नयी बात नहीं है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 45 वर्ष पूर्व उत्तर भारत में प्रथम सामूहिक विवाह का आयोजन हुआ था और वह किया था माहेश्वरी समाज जयपुर ने। इसमें मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश के कई गणमान्यजन तक शामिल हुए थे।

लगभग 45 साल पहले की जब याद आती है तो बड़ा अजीब लगता है। सामूहिक विवाह की तारीख के सिर्फ सात दिन बाकी थे और एक भी जोड़ा तैयार नहीं हुआ। समाज में नाक कटने के सिवाय कोई चारा नहीं था। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों, अफसरों तक को निमंत्रण पहुंच चुके थे।

अंत में जोड़े नहीं मिलने पर केवल छह सदस्यों को परिणय सूत्र में बंधना पड़ा और इस तरह जयपुर में पहली बार शुरुआत हुई सामूहिक विवाह परम्परा की 19 जून, 1975 को। एक उत्साही समाजसेवी आर.डी बाहेती ने इस पुनीत कार्य को सफल करने का प्रयत्न किया था।

इस दिन महोश्वरियों के 12 युवक-युवतियों का पाणिग्रहण संस्कार सामूहिक रूप से कराया गया। लड़के व लड़कियाँ सभी उच्च वर्ग के थे। परंतु इस अवसर पर उनकी शादियाँ बिना किसी दिखावें आडम्बर व दहेज के आयोजित की गई। सभी युवक युवतियों का शैक्षणिक स्तर भी अच्छा था।

माहेश्वरी विद्यालय था आयोजन स्थल:

इस सामूहिक विवाह के लिये तिलक नगर स्थित माहेश्वरी उ.मा. विद्यालय भवन को चुना गया था। सभी वर वधु अपने-अपने परिजनों सहित निर्धारित समय पर विद्यालय भवन में पहुंच गये। ठीक 6 बजे छः वर एक साथ विद्यालय भवन के द्वार पर आये और तौरण मारा, सजी-धजी महिलाओं ने नेकचार संपन्न किए।

यहां पर बहुत ही सामान्य सजावट थी। एक-दूसरे को वर मालाएं पहनाने के बाद खुले आसमान के नीचे बनाये गये मंच पर वर-वधुओं को सोफे पर बैठा दिया गया। यहां पर हजारों दर्शकगण भी उपस्थित थे। इस अवसर पर धार्मिक व सामाजिक नेताओं ने इन्हें आशीर्वाद दिये।

एक अनजानी भावना से प्रेरित सभी दर्शकों व वर-वधु-पक्ष के लोगों में एकात्मकता सी दिख पड़ती थी। सम्पूर्ण वातावरण और कार्यक्रम की सादगी उपस्थित व्यक्तियों को सम्मोहित करने के लिये पर्याप्त थी।

नवयुवक मंडल ने निभाई जिम्मेदारी:

राजेंद्र कुमार राठी (अध्यक्ष) एवं संतोष कुमार अजमेरा (मंत्री) के कार्यकाल में माहेश्वरी नवयुवक मंडल का उत्साहजनक कार्य बड़ा ही प्रशंसनीय था। सब अपनी-अपनी व्यवस्थागत जिम्मेदारियों में तनमय से प्रतीत होते थे। 6-9 बजे तक यह स्वागत समारोह चला। वर-वधु पक्ष के सभी रिश्तेदारों के लिए 4 रुपया प्रति व्यक्ति भोजन की व्यवस्था की गई थी।

सभी पक्षों ने कूपन लेकर अपने-अपने रिश्तेदारों को भोजन करवाया। मध्य रात्रि को स्कूल भवन के खुले चौक में 6 मण्डप बना कर वैदिक मंत्रोच्चारों के साथ विद्वान पण्डितों ने फेरे (पाणिग्रहण संस्कार) संपन्न कराए। तत्पश्चात रात्रि के अंतिम प्रहर में वहीं से बहुओं को बिदाई दी गई।

इस आयोजन में सबसे बड़ा योगदान बाहेती परिवार का रहा, जिसने अपने परिवार के लड़कों व लड़कियों की शादी इस अवसर पर संपन्न कराई। पुष्कर में समाज के सम्मेलन में की गई प्रतिज्ञा को सार्थक करने हेतु बाहेती जी ने अपने परिवार के 5 सदस्यों को सामूहिक विवाह-यज्ञ के लिए समर्पित किया।

ये बंधे थे परिणय सूत्र में:

नंदकिशोर बाहेती-वीणा
कमलकिशोर बाहेती-भगवती
चंद्रमोहन शारदा-हेमलता
बालकिशन पेडीवाल-गायत्री
विजयकुमार तोतला- सावित्री
टीकमचंद चेचाणी – अंजुलता

यादों के झरोखों से:

इतना आसान नहीं था

मैं महाराष्ट्र के अमरावती कस्बे में गया था। वहां सामूहिक विवाह होते देखे। इससे शादियों में होने वाले अनाप-शनाप खर्चे बचते हैं। एक ही मण्डप के नीचे बहुत सी शादियाँ हो जाती हैं। दहेज पर भी रोक लगती है। यह सब जानकर मैने जयपुर में सामूहिक विवाह कराने की सोची। मैंने अबूझ सावे (आखातीज) पर सामूहिक विवाह करवाने की घोषणा कर दी। कार्ड बंटवा दिए, लेकिन हमारे पास (समाज में) सामूहिक विवाह के लिए एक भी आवेदन नहीं आया। मैं परेशान हो गया। उस वक्त सामूहिक विवाह के बारे में लोगों को समझाना मुश्किल था। मैंने घर के कुंवारे लड़के-लड़कियों का सामूहिक विवाह कर उदाहरण पेश किया। मुझे अपार खुशी है कि आज सभी दम्पत्तियों पर भगवान महेश की कृपा है। आज सभी दादा-दादी, नाना-नानी बन गए। सभी जोड़े शादी की वर्षगांठ प्रतिवर्ष सामूहिक रूप से मनाते हैं।

आर.डी.बाहेती
(तत्कालीन संगठन मंत्री एवं संयोजक)


समाज की साख बची

वर्ष 1975 में समाज ने सामूहिक विवाह की घोषणा तो कर दी लेकिन मात्र 7 दिन शेष रहने पर भी कोई जोड़ा तैयार नहीं हुआ और समाज की साख पर आंच आने की नौबत आ गई। इस समाज सेवा के लिए धन तो कई भामाशाहों से एकत्र कर सकते हैं, किंतु समाज की साख बचाने में चंद लोग ही आगे रहते हैं। समाज द्वारा आयोजित पहले सामूहिक विवाह के सूत्रधार आर.डी.बाहेती (संयोजक) ने एक भी जोड़ा नहीं मिलने पर अपने ही परिवार के पांच सदस्यों को परिणय सूत्र के लिए तैयार किया, जो सराहनीय था। बाहेती जी को बहुत-बहुत साधुवाद। वे जीवनपर्यन्त समाजसेवा में सक्रिय रहें, मैं उनके सुखद और दीघ जीवन की कामना करता हूँ।

बंशीधर शारदा
(वरिष्ठ समाजसेवी)

-रमेशचंद्र जाखोटिया


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