जीवन के यथार्थ के कथाकार हरिप्रकाश राठी (श्री राठी)

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वास्तव में लेखन लेखक के व्यक्तित्व का आयना ही है। बसइस मामले में आम व्यक्ति से उसका भेदमात्र भावातिरेक का होना है। जोधपुर निवासी हरिप्रकाश राठी ने वास्तव में आम व्यक्ति की परेशानियों को इस तरह निकट से देखा कि उनकी लिखी कहानियां यथार्थ का आयना बन गईं और श्री राठी यथार्थ के एक अद्भुत कथाकार श्री राठी के इन्हीं साहित्यिक योगदानों को श्री माहेश्वरी टाईम्स ‘माहेश्वरी ऑफ द ईयर अवॉर्ड’ समर्पित कर नमन करती है।

जोधपुर निवासी हरिप्रकाश राठी की पहचान वर्तमान में एक प्रतिष्ठित कलमकार के रूप में है। जीवन के अर्धशतक तक एक बैंकर के रूप में लक्ष्मी की सेवा में सफलतापूर्वकरत रहने के बाद वे सरस्वती की सेवा उससे भी अधिक समर्पित भाव से करेंगे, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। न तो यह कल्पना परिवारजनों को थी, न ही सहकर्मियों की।

लेकिन उनकी लेखनी चली तो चलती ही चली गई। अभी तक श्री राठी 150 से अधिक कहानियों, सैकड़ों आलेख तथा स्तंभों का लेखन कर चुके हैं। मात्र 17-18वर्ष की इस अल्प अवधि में साहित्य सृजन में इतना अधिक ही नहीं बल्कि इतना उत्कृष्ट योगदान देना कि पाठकों की जुबान पर उनका नाम प्रथम क्रम के साहित्यकारों में शामिल हो जाए, यह कोई सामान्य नहीं बल्कि अद्भुत योगदान ही है। उनके इन योगदानों के लगभग देश की हर शीर्ष पत्र-पत्रिका तथा आकाशवाणी केंद्र आदि साक्षी बने हैं।

अभावों से हुई जीवन की शुरुआत:

श्री राठी का जन्म पश्चिमी राजस्थान के सिंहद्वारा जोधपुर शहर में 05 नवंबर 1955 को श्री गोपीकृष्ण राठी व श्रीमती सोहिनीदेवी राठी की पांचवीं संतान के रूप में हुआ। उनसे छाटे एक भाई एवं बड़े दो भाई एवं दो बहनें थीं। श्री राठी का ननिहाल कोटा जिले के देवली गांव में था। हालांकि उन्होंने अपना ननिहाल कभी नहीं देखा क्योंकि उनकी माता उनके नाना-नानी की एकमात्र संतान थी एवं दोनों श्री राठी के जन्म के पहले ही स्वर्गस्थ हो चले थे।

श्री राठी कहानियों में इसीलिए मामा-मामी, मौसा-मौसी अथवा फिर नाना-नानी के किरदार कम मिलते हैं। श्री राठी का बचपन अत्यंत अभावों में बीता एवं निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की यह त्रासदी उनकी अनेक कहानियों में परिलक्षित भी होती है। उनकी शिक्षा जोधपुर शहर के ही विद्यालय ‘श्री हनवंत हायर सेकेंडरी स्कूल में हुई। जहां वे 1960 से 1971 तक विद्यार्थी रहे।

इस विद्यालय में सभी धर्म-जातियों के बच्चे थे। वे जिस मोहल्ले आड़ा बाजार में पले-बढ़े, वहां भी आधी जनसंख्या मुसलमानों की थी। श्री राठी की उन सभी कहानियों, जिनमें किरायेदारों के बचपन का चित्रण है, एकाध मुस्लिम सहपाठी अवश्य है। इस संगत से ही संभवतः उन्होंने सिखाया कि इंसान का असल मजहब इंसानियत है।

श्री राठी का
हरिप्रकाश राठी

पिताजी की दुकान बनी प्रथम पाठशाला:

उनके पिता घर से कुछ दूरी पर पुस्तकें बेचने का व्यवसाय करते थे। दोपहर उनके पिता भोजन करने घर जाते थे। तब श्री राठी को दुकान पर बैठना होता था। इसी क्रम में श्री राठी को पुस्तकें पढ़ने का चस्का लग गया। उनकी दुकान पर अधिकांशतः धार्मिक पुस्तकें, प्रतिष्ठित लेखकों विशेषतः प्रेमचंद के कथा-उपान्यास भी बिकते थे।

श्री राठी का ध्यान इन पुस्तकों के विक्रय की बजाय इनको पढ़ने पर अधिक होता था। इन्हीं पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते साहित्य के अंकुर उनके जेहन में भी पैठ गए। श्री राठी की कॉलेज शिक्षा जोधपुर विवि में हुई जहां 1971 से 1976 के मध्य उन्होंने बीकॉम ऑनर्स, एमकॉम किया। उनके कॉलेज शिक्षा के समय उनके पिता की आर्थिक स्थिति विपन्न थी।

अतः उन्होंने पार्ट टाईम कार्य कर कॉलेज फीस, किताबें आदि का खर्च भी वहन किया। श्री राठी की अनेक कहानियों में इसीलिए किरदारों के संघर्ष का चित्रण भी है। उनके किरदार न थकते हैं, न हारते हैं, वरन् संघर्ष कर अपने मुकाम पर पहुंचते हैं।

25 वर्ष तक की बैंक में नौकरी:

श्री राठी का विवाह 17 जून 1971 को डॉ. सुशीला के साथ हुआ जो अत्यंत विदुषी ही नहीं वरन् श्री राठी से कहीं अधिक शिक्षित थीं। उन्होंने सरकारी कॉलेज में वर्षों अध्यापन कार्य किया। यही कारण है कि कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले सुख-दुःख, नोंक झोंक भी श्री राठी की कहानियों में मिल जाते हैं।

श्री राठी ने वर्ष 1975 में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में लिपिक के रूप में कार्य ग्रहण किया एवं मात्र दो वर्ष में प्रोबेशनरी अधिकारी बन गए। उन्होंने इस बैंक में 25 वर्ष तक कार्य किया। 2001 में बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर मुक्त हुए तब उनका लेखन शून्य था लेकिन जैसा कि ऊपर लिखा है उनमें साहित्य के सुप्त अंकुर तो उपस्थित थे ही।

ऐसे चली साहित्य यात्रा:

श्री राठी की साहित्यक यात्रा वस्तुतः वर्ष 2002 से प्रारंभ हुई। वीआरएस के पश्चात एक बार यूं ही खाली बैठे उन्होंने कहानी ‘अमरूद का पेड़’ लिखी। यह कहानी कालांतर में बहुत लोकप्रिय भी हुई। जब यह कहानी अखबार में प्रकाशित हुई तो उनकी कल्पना को पंख लग गए। उसके पश्चात उन्होंने दो-तीन और कहानियां लिखी एवं जब वे भी प्रकाशित हो गई तो उन्हें सुस्पष्ट हो गया कि उनके भीतर एक कथाकार जन्म ले चुका है।

यह कहानियां अखबारों एवं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होती रहीं। श्री राठी की यह साहित्यिक यात्रा दिलचस्प है। प्रतिष्ठित साहित्यकार जबरनाथ पुरोहित ने अपनी पुस्तक ‘गद्गद् गिरानयन बह नीरा’ में अर्थनगर से भावना गर तक’ शीर्षक से उन पर एक लेख भी प्रकाशित किया है। इतना ही नहीं उन्होंने लिखा भी कि श्री राठी उन चंद समकालीन साहित्यकारों में हैं जिनसे वे प्रभावित हुए हैं।

यही बात बिज्जी, प्रो. हरिराजसिंह एवं अन्य अनेक पाठकों/समीक्षकों ने दोहराई है। इसी दरम्यान श्री राठी अनेक समसामयिक विषयों पर भी लेख लिखते रहे हैं एवं अनेक विषयों पर उनके पांच सौं से अधिक लेख समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठों एवं अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं।

श्री राठी का
हरिप्रकाश राठी

सैकड़ों कहानियां प्रकाशित प्रसारित:

श्री राठी के अभी तक अगोचर, सांप-सीढ़ी, आधार, पहली बरसात, माटी के दीये, नेति-नेति, कायनात, प्रतिनिधि कहानियां, हरिप्रकाश राठी की कहानियां (भाग-1 व 2) व ऑन द विंग्स ऑफ कुरजां (कतिपय कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद) आदि कहानी संग्रह तथा निंबध संग्रह समय, सत्य और संवदेना, अब तो यह सच कहो, किसके रोके रुका है सवेरा प्रकाशित हो चुके हैं।

अभी तक 150 से अधिक कहानियां देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा कई आकाशवाणी केंद्र द्वारा प्रसारित भी हो चुकी हैं। कुछ लघुकथाएं भी लिखी हैं। पत्रकारिता से भी जुड़े हैं। अनेक लोकप्रिय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सामयिक, राजनीतिक एवं अन्य विषयों पर दो सौ से ऊपर लेख प्रकाशित हो चुके हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा राजस्थान के कथाकारों पर प्रकाशित कथा-संग्रह ‘कहानी दर कहानी’ में आपकी कहानी कच्ची धूप प्रकाशित है। उनकी कहानियां के अंग्रेजी, संस्कृत, राजस्थानी, पंजाबी व सिंधी अनुवाद भी हो चुके हैं।

कलम से भी समाजसेवा:

श्री राठी कम्युनिटी वेलफेयर एंड क्रिएटीविटी ट्रस्ट के मुख्य ट्र्रस्टी हैं। इस ट्रस्ट के तहत पारिवारिक परिवेदनाओं के निराकरण पर अनेक कार्यक्रम एवं सेमिनार आयोजित हुए हैं। वसीयतनामा लिखने की महत्ता, प्राकृतिक चिकित्सा, समाज में फैली अनेक रूढ़ियां, एवं विसंगतियां हटाने हेतु भी अलख जगाई गई है।

रोटरी क्लब, पोलियो अभियान से भी जुड़े हैं। श्री राठी के लिए ज्योतिष अभिरुचि का प्रमुख विषय रहा है। वे अनेक जगह विशेषज्ञ वक्ता के के रूप में आमंत्रित किए गए। आकाशवाणी पर कथा वाचन के अतिरिक्त अन्य अनेक विषयों पर चर्चा के लिए भी आमंत्रित किए गए हैं।

कलम साधना ने दिलाया सम्मान:

श्री राठी अपनी साहित्य सेवा के लिए अभी तक कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं। इसके अंतर्गत ‘कथाबिंब’ पत्रिका द्वारा कमलेश्वर स्मृति श्रेष्ठ कथा सृजन पुरस्कार 2018, पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, विक्रमशीला विद्यापीठ द्वारा विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर जैमिनी अकादमी, हरियाणा द्वारा उत्कृष्ट कथा सृजन हेतु राजस्थान रत्न, राष्ट्रकिंकर नईदिल्ली द्वारा संस्कृति सम्मान, मौनतीर्थ फाउंडेशन उज्जैन द्वारा मानसश्री सम्मान, वीर दुर्गादास राठौड़ सम्मान, जोधुपर मेहरानगढ़ से निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान बस्ती (यूपी) द्वारा राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान, पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी एवं यूनेस्को द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।


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