विभिन्न रोगों के कारक – नवग्रह

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ज्योतिष में कहा गया है कि समस्त सुख दुःख प्रारब्धवश होते हैं और इस प्रारब्ध का फल नवग्रह देते हैं। सुख-दुःख के इसी सूत्र में रोग भी शामिल हैं। कौन सा रोग किसको प्रभावित कर सकता है, यह उस गृह पर निर्भर है, जो रोग का कारक है। तो आइये जानें ये नवग्रह कौन-कौन से रोग के हैं, कारक?

रवि ग्रह

संपूर्ण सूर्य मंडल का निर्माता तथा स्वयं की आकर्षण शक्ति से सभी ग्रहों पर नियंत्रण रखने वाला अर्थात सभी ग्रहों का राजा रवि है। राजा के सभी गुण रवि के लिए बताएं हैं। यह जीवन देने वाला ग्रह होने से जीवन की आवश्यक सभी बातें रवि के अधीन होती हैं।

नवग्रह

रवि उष्ण ग्रह है, परंतु इस ग्रह की उष्णता मंगल के समान दाहक नहीं होती, वह जीवन जीने के लिये आवश्यक एवं सहने योग्य होती है। रवि उत्साहवर्धक होता है, सभी प्रकार की प्रतिकार शक्ति इसके पास है। रवि के प्रभाव में आने वाले शरीर के भाग जैसे हृदय, आंखें, मुख, गला, मस्तिष्क आदि होते हैं।

साथ ही रवि के अधिपत्य में आने वाले रोग जैसे हृदयविकार, दृष्टिदोष, नेत्रविकार, रक्तदाब, मस्तिष्क में रक्तदाब, गर्मी के विकार, पेट के रोग, पित्तविकार, सिर के विकार, तीव्र ज्वर आदि।


चंद्र ग्रह

नवग्रह

चंद्र जैसे मन का कारक होता है, उसी तरह शरीर में छाती, रक्त, मूत्र, पाचक रस, पाचन क्रिया आदि पर भी चंद्र का प्रभुत्व रहता है।

चंद्र का प्रभाव पाचन शक्ति पर होने से अपचन, पेट दर्द, कृमि, अतिसार एवं आंत्रपुच्छ से संबंधित विकार दिखते हैं। द्रव पदार्थ पर अधिपत्य होने से सर्द, ब्रोंकाइटिस, हायड्रोसिल, कफविकार संबंधित गले व छाती के विकार एवं दृष्टि दोष दिखते हैं।


मंगल ग्रह

मंगल शक्ति के कारण सभी स्नायु एवं बाहों के साथ ही मंगल की मेष राशि निसर्ग कुंडली में प्रथम भाव पर होने से इस भाव से देखे जाने वालें अंग चेहरे, सिर एवं मस्तिष्क इसमें समाविष्ट होते हैं, देखे जाते हैं।

साथ ही मंगल की वृश्चिक राशि अष्टम भाव पर आने से इस भाव से देखे जाने वाले मूत्राशय, गर्भाशय, गुदाद्वार और बाह्यलिंग पर मंगल का प्रभुत्व होता है, साथ ही जिह्वा के जिस भाग पर तीखे पदार्थों का स्वाद समझ आता है, उस भाग की ग्रंथी पर मंगल का प्रभाव होता है। इसके अधिपत्य अंतर्गत जलन, दाह होना, तीव्र उष्णता के विकार, सभी प्रकार के बुखार आदि विकार आते हैं।

नवग्रह

मंगल का प्रभुत्व चेहरे पर होने के कारण मुंहासे, तारुण्यपिटिका एवं मस्तिष्क के विकार, प्रमुख से पागलपन अथवा मस्तिष्क में रक्तस्पृता होना आदि दिखते हैं। मंगल का प्रभाव बाह्यलिंग पर होने से गुप्त रोग एवं लैंगिक बीमारियां एवं विकृतियां होती है। बवासिर, नासूर (फिस्टुला) आदि विकार तथा स्त्रियों में रक्तप्रदर जैसे विकार होते हैं।

मंगल का प्रभुत्व स्नायु पर है। इसलिंए स्नायु के विकार धनुर्वात, लकवा, मिर्गी का दौरा आदि इसके कारण में शमिल हैं। मंगल तीव्र दुःखदायक होने से तीव्र वेदना, बीमारियां जैसे एसिडिटी, अल्सर, पेट दर्द आदि का यह कारण है।

मंगल की वृश्चिक राशि का चिन्ह बिच्छू है, इसािलए विष प्रयोग एवं विषयुक्त वायु और पदार्थ इसमे शामिल हैं, के सेवन से होने वाली बीमारियां मंगल ग्रह की ओर आश्रित होती हैं।


बुध ग्रह

इस ग्रह के प्रभुत्व में श्रवण शक्ति होने से श्रवणेंद्रिय, कर्ण संवेदना इसलिऐ मज्जातंतु, श्वसनसंस्था, फुफ्फुस आदि उसके अधिपत्य में है। इसकी दूसरी राशि कन्या निसर्ग कुंडली में षष्ठ भाव के आरंभ में आती है।

नवग्रह

इस भाव के अनुसार पाचन संस्था से पेट निर्देशित होता हैै, इसलिए शरीर के उस भाग पर प्रभाव दिखाई देता है। वाणी के संबंध में होने से तोतला बोलना, गुंगापन आदि तथा श्वसन संस्था का अधिपति होने से श्वसनसंस्था के दमा (अस्थमा), टी.बी. आदि विकार होते हैं।

श्रवण इंद्रिय के संबंधी कान के विकार जैसे बहरापन तथा संवेदनशील होने से मज्जातंतू विकार होते हैं। बुध के प्रभाव में पाचन संस्थान होने से अपचन के विकार भी होते हैं।


गुरु ग्रह

गुरु यह स्निग्ध ग्रह है, इसलिए शरीर का स्निग्धांश, रक्त वृद्धि करने वाला लीवर, रक्तप्रवाह आदि पर इसका प्रभाव होता है। गुरु की धनु राशि निसर्ग कुंडली में नवम स्थान के भाव से देखी जाती है।

नवग्रह

मीन राशि व्यय स्थान में आने से पादतल पर प्रभाव दिखाई देता है। जंघा तथा पाद तल गुरु के अंतर्गत आते हैं।

गुरु के अधिपत्य में लीवर होने से उससे संबंधित विकार जैसे पीलिया, रक्तदोष वृद्धिकारक है, इसलिए शरीर के किसी भी भाग के स्नायु तथा शरीर के अंतर्गत किसी भी रस की अतिरिक्त वृद्धि होने से कैंसर (कर्क रोग), मेदवृद्धि, सूजन, फोड़े, गंसुआ, हत्तीरोग, मस्से, गांठ आदि विकार गुरु के अंतर्गत आते हैं।


शुक्र ग्रह

शुक्र सौंदर्यकारक होने से इसके अंतर्गत आंख, नाखून आदि का समावेश होता है। शुक्र की वृषभ राशि दूसरे भाव के आरंभ में आने के कारण इस भाव के अनुसार गला, कंठ, स्वर यंत्र आदि भाग देखे जाते हैं। शुक्र लैंगिक सुख के कारक होने से लिंग, शुक्रजंतु वीर्य आदि इसमें समाविष्ट हैं।

शुक्र यह तुला राशि के निसर्ग कुंडली में सप्तम भाव में आने से इस भाव के अनुसार देखे जाने वाले मूत्रपिंड, मूत्राशय, गर्भाशय आदि शरीर के भाग शुक्र के अधिपत्य में आते हैं।

शारीरिक बीमारियां अथवा इंद्रिय सुख के अतिरेक होने के कारण उत्पन्न रोग जैसे मद्य का अतिसेवन, मिष्ठान्न अथवा लैंगिक सुख के अतिसेवन आदि के कारण गला, कंठ के विकार, नेत्र रोग, दृष्टिदोष, लैंगिक विकृति, लैंगिक बीमारियां होती है।

शुक्र यह सौंदर्य का कारक होने से सौंदर्य उत्पन्न करने वाली त्वचा के विकार, बाल झड़ना आदि विकार दिखते हैं। मूत्राशय और गर्भाशय शुक्र के आधिपत्य में आने से उससे सम्बंधित विकार जैसे, मधुमेह, गुप्त रोग, स्त्रियों में मासिक धर्म की शिकायत आदि सभी विकार शुक्र ग्रह के अधिपत्य में आते हैं।


शनि ग्रह

शनि कठोर है, इसलिए शरीर के कठिन पदार्थ जैसे हड्डियों पर इसका प्रभाव होता है। शनि की मकर राशि निसर्ग कुंडली के दशम भाव के आरंभ में आती है। इस भाव के अनुसार घुटनों का भाग यहां निर्देशित होता है। शनि की कुंभ राशि निसर्ग कुंडली के एकादश भाव के आरंभ में आती है।

यह वायु तत्व से ध्वनि को प्रक्षेपित करने वाली राशि होने के कारण इसके अधिपत्य में कान का समावेश होता है। शनि धीमी गति का ग्रह होने के कारण दीर्घकालीन, तुरंत ठीक न होने वाली बीमारियां, लकवा (पक्षाघात), अस्थमा, बुढ़ापा, बार–बार होने वाले गजकर्ण जैसे त्वचाविकार होते हैं।

शनि ग्रह निस्तेज, काले रंग का होने से त्वचा की शुष्कता दिखाई देना। शनि हड्डियों से संबंधित होने से हड्डियों की टी.बी., हड्डियाँ टूटना, भंगुर होना, कैल्शियम की कमतरता, बाल झड़ना आदि विकार होते हैं।

शनि का कानों पर प्रभाव होने से कान बहना अथवा बहरापन होता है। जोड़ों से संबंधित संधिवेदना दिखती है। शनि जैसे मंद गति का होता है, उसी तरह अति शीत प्रवृत्ति का होने से सर्द सायनस आदि विकार भी दिखाई देते हैं।


राहु ग्रह

इसका अधिपत्य शरीर के स्प्लीन एवं सहत्तार चक्र पर है।

राहु के अधिपत्य में होने वाले रोगों में पागलपन, महा रोग संबंधित पिशाचय बाधा/शाप तथा जारण–मारण आदि प्रयोग के साथ ही राहु जिस दृष्टि युती, नक्षत्र एवं राशि में होगा, उनके स्वामी के अनुसार ही अपेक्षित बीमारियां होती हैं।


केतु ग्रह

कुंडलिनी शक्ति का क्षेत्र अर्थात आखिरी होने से सबसे नीचे का भाग, गुदाद्वार और बाह्यलिंग का भाग इसमें आता है।

केतु जिस ग्रह के दृष्टि युती अथवा नक्षत्र में होगा, उस ग्रह से निर्देशित भाग केतु के अधिपत्य में आता है। साथ ही इसके अधिपत्य में आने वाले रोगों में त्वचाविकार, कोड़ (सफेद दाग), बवासिर आदि तीव्र वेदनायुक्त विकार होते हैं।


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