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जब कुत्ते ने नेता को काटा तो टीवी पर कुछ यों बहस हुई

व्यंग्य। शाम हो चुकी है, टीवी चैनल का दरबार सज चुका है। दिनभर की सनसनीखेज खबरों का विश्लेषण करने के बाद भी एंकर और एंकरी को ऐसी कोई खबर नहीं मिल रही थी जिस पर दो चार भौंकू नेताओँ और समाज के ठेकेदारों को बुलाकर बहस कराई जाए। मंदिर, चुनाव, जाति, आरक्षण से लेकर तमाम मुद्दों पर बहस करने पर लोग ट्टीटर पर तो गालियाँ देने ही लगते थे, कई लोग तो एंकर और एंकरी के घर जाकर भी लानत-मलानत करने लगे थे।


कई एंकर एंकरियों के बच्चों का स्कूल में जीना हराम हो गया क्योंकि स्कूल में उनके साथ पढ़ने वाले बच्चों से लेकर मास्टर और मास्टरनियाँ इनके बच्चों से पूछते हैं कि तुम्हारे एंकर एंकरनी माँ-बाप ऐसी मूर्खता के लिए घर पर क्या तैयारी करते हैं कि टीवी पर रोज एक नई मूर्खता की छाप छोड़कर जाते हैं।

खैर, एंकर-एंकरनी को गालियों, तोहमतों से ज्यादा टीआरपी भाती है इसलिए उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। लेकिन आज तो न तो कोई ब्रेकिंग न्यूज मिल रही थी न कोई फड़फड़ाता बयान।

अचानक उनकी नज़र एक रिपोर्टर द्वारा भेजी गई एक खबर पर गई, चुनाव प्रचार पर गया एक नेता जब अपने विरोधी नेता के मोहल्ले में प्रचार करने गया तो वहाँ के कुत्ते उसके पीछे पड़ गए। वह नेता प्रचार छोड़कर जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर वहाँ से भागा।

ये खबर देखते ही एंकर और एंकरनी की सुस्ती दूर हो गई। उनको लगा ये खबर तो बहस के लायक है, इसमें आदमी भी है, नेता भी है, चुनाव का एंगल भी है, राजनीति भी है, आरोप प्रत्यारोप भी है और सबसे बड़ी बात एक नया किरदार कुत्ता भी है।

एंकर और एंकरनी बहस शुरु करते हैं, जैसा कि आप लोगों ने अभी अभी देखा कि एक नेताजी जब दूसरे नेताजी के घर के सामने से निकल रहे थे तो वहाँ के कुत्ते उनके पीछे पड़ गए। उन्होंने जैसे तैसे भागकर कुत्तों से अपनी जान बचाई। इस खबर से जुड़े और सीसी टीवी फुटेज हमारे पास आने वाले हैं, इसके बाद हम इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

एंकर के आसपास टीवी के परदे पर चारों तरफ खिड़कियों से झाँकते से कुछ आदमी नुमा लोग कब्जा जमा चुके हैं। टीवी पर खिड़की से झाँकते ये लोग ऐसे लगते हैं जैसे चिड़ियाघर जाने वाले लोगों को बंदर, भालू आदि जानवर देखते हैं।

एंकर बहस शुरु करता है, तो आप बताईये क्या ये साजिश थी कि नेताजी जब अपने विरोधी के मोहल्ले में, विरोधी के घर के सामने से निकले तो सब कुत्ते अचानक उस पर टूट पड़े। एक खिड़की से एक बंदरनुमा आदमी झाँक कर कहता है, बिल्कुल साजिश है, उस रास्ते से दिनभर इतने लोग निकले कुत्तों ने किसी की तरफ देखा तक नहीं, और हमारे नेताजी को देखते ही उन पर टूट पड़े।

इतने में दूसरा बंदरनुमा आदमी अपनी अंगुली दिखाकर अपनी बारी आने का इंतजार किए बिना ही एंकर और एंकरनी से बोलने की इजाजत चाहता है, लेकिन इसी बीच दूसरा बंदरनुमा आदमी लपकता है और कहता है कुत्तों का काम है भौंकना और राह चलते लोगों पर झपटना।

अब ये उनकी इच्छा पर है कि वो किस पर झपटें, किसे काटें और किसे यूँ ही जाने दें। इस पर पहला सवाल दाग देता है, आप हमारे मोहल्ले में इतनी बार आए हमारे कुत्तों ने तो कभी आप पर हमला नहीं किया, फिर आपके कुत्ते हमारे नेताजी पर क्यों झपटे। इसी बीच तीसरा बगैर रुके बोलना शुरु कर देता है।

राजनीति का स्तर कितना गिर गया है, कुत्तों को लेकर बहस हो रही है। क्या हम किसी और विषय पर बात नहीं कर सकते।

इसी बीच एंकर और एंकरनी दर्शकों से आए ट्वीट की जानकारी देते हैं। एंकरी बोलती है अभी अभी हमारे एक दर्शक ने ट्वीट किया है-खबर अधूरी है कुत्तों के झपटने के बाद नेताजी कहाँ हैं, अस्पताल में हैं, कि चुनाव प्रचार कर रहे हैं।

और टीवी पर उन कुत्तों को भी दिखाया जाए जो नेताजी पर झपटे थे, मैं अपने मोहल्ले के कुत्तों को भी ट्रैंड करना चाहता हूँ कि हमारे मोहल्ले में जैसे ही कोई नेता आए उसकी ऐसी ही दुर्गति करदे। एंकरनी इस पर अफसोस जताती है कि हमारे दर्शक ऐसी घटिया प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वह कहती है, हमें अपनी बहस को गंभीर बनाना है।

इसी बीच टीवी की खिड़की से एक और बंदरनुमा आदमी झाँकता है, वह बहुत गुस्से में है। आप ऐसे ट्वीट की बात ही क्यों कर रही है, इस देश में नेताओँ की इज्जत ऐसी हो गई है कि कल से कोई ये भी लिख सकता है कि जिस मोहल्ले से कोई नेता निकले उसे पकड़कर जूते मारो।

एंकरनी फिर याद दिलाती है, हम कुत्ते के काटने पर बहस कर रहे थे और अफसोस है कि कोई भी पैनलिस्ट इस मुद्दे की गंभीरता को नहीं समझ रहा है। कुत्ता काटने वाला नेता का समर्थक अफसोस जाहिर करता है कि राजनीति का स्तर इतना घटिया हो गया है कि अब लोग अपने विरोधी को कुत्तों से कटाने लगे हैं।

इसी बीच एंकर और एँकरनी को कोई सूचना मिलती है, उनका रिपोर्टर उस जगह पहुँच गया है जहाँ कुत्तों ने नेताजी पर हमला किया था, उस घटना के कुछ चश्मदीदों से चर्चा करते हैं। एंकर रिपोर्टर से हमें इस घटना के चश्मदीदों से बात कराईये। रिपोर्टर कहता है यहाँ लोग पूछ रहे हैं कि आप किसको कुत्ता काटने की बात कह रहे हैं क्योंकि ये कुत्ते तो दिन भर किसी न किसी पर झपटते रहते हैं।

अगर इनका मूड होता है तो काटते हैं नहीं तो थोड़ी दूर पीछा करके वापस आ जाते हैं। कुछ चश्मदीद जो टीवी पर आने को उतावले हैं बताते हैं, हमारे मोहल्ले के कुत्ते बड़े समझदार हैं, ये ऐरे गैरे लोगों को मोहल्ले में देखते ही उस पर भौंकने लगते हैं और यहाँ से भगा देते हैं। खासकर नेतानुमा आदमी पर जो कलफदार सफेद खादी पहनकर आता है उसे तो ये छोड़ते ही नहीं, क्योंकि हमने इनको ट्रैंड ही ऐसा कर रखा है।

एंकर और एंकरनी को इस बात से हैरानी होती है कि कुत्ते नेता को देखकर ही भड़कते हैं। इसी बीच कुछ और ट्वीट आ जाते हैं। एंकरनी बताती है कि हमें कई शहरों से धड़ाधड़ ट्वीट मिल रहे हैं कि हमारे मोहल्ले में भी ऐसे ही कुत्तों की ज़रुरत है। जिस शहर में जिस मोहल्ले में इन कुत्तों ने नेता को काटा है और नेताओं को ही काटने के आदी हैं, क्या ऐसे कुत्ते हमें भी मिल सकते हैं।

एंकर बोलता है हमारी बहस लगता है दूसरी दिशा में चली गई है। हम इस बहस को यहीं खत्म करते हैं।

इधर गली के कुत्ते और उनके संगी साथी इसी बात का इंतज़ार करते रहे कि चैनल से कोई रिपोर्टर आकर उनसे भी पूछेगा कि उन्होंने नेता को क्यों काटा, लेकिन जैसा कि होता है चैनल वाले मुद्दे की गहराई तक नहीं जाते इसलिए ये कुत्ते बेचारे यूँ ही निराश खड़े रहे।

चन्द्रकांत जोशी, मुंबई

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