Tuesday, February 24, 2026
14.1 C
London

पितृ आशीर्वाद का महापर्व- श्राद्ध पक्ष

शास्त्रों की मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष वह पितृ पर्व है, जब पितृ अर्थात् हमारे दिवंगत परिजन पृथ्वी पर आकर श्राद्ध के निमित्त अर्पित सामग्री ग्रहण करते हैं। इससे वे जब तृप्त होते हैं, तो श्राद्ध कर्ता को आशीर्वाद देते हुए पुन: अपने स्थान को गमन कर जाते हैं।

श्राद्ध शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। श्रद्धा±अर्ध्य अर्थात् श्रद्धा के साथ पितरोें को जो अर्पण किया जाता है, वही श्राद्ध है। पितृ इससे प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं और इससे परिवार में सभी सुखों की वृद्धि होती है, ऐसा पुराणों में उल्लेख किया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक का 16 दिवसीय पक्ष श्राद्ध कहा जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पक्ष में एक प्रकार से पितरों का मेला लगता है। ये पृथ्वी लोक में निवास कर रहे अपने सगे संबंधियों के यहाँ जाते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए गए कव्य से तृप्त होकर वर्षभर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अतृप्ति की स्थिति में रुष्ट होकर ये शाप देते हैं जिससे परिवार कई प्रकार के दुःखों का भाजन बनता है।


किनका श्राद्ध आवश्यक?

वैसे तो हर व्यक्ति अपने पिता पक्ष की 7 पीढ़ी और माता पक्ष की चार पीढ़ी का ऋणी होता है अतः इनका श्राद्ध आवश्यक है। फिर भी यथाशक्ति अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है। इसके साथ ही अपनी पत्नी, मित्र, जमाता, शिष्य, पुत्र व अन्य प्रियजनों का श्राद्ध करने का भी विधान है। संक्षेप में कहा जाए तो ऐसे सभी अपने दिवंगतजनों का श्राद्ध अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए जिनसे हमें स्नेह व प्रेम की प्राप्ति हुई हो, क्योंकि उनकी आत्मा इसकी अपेक्षा करती है।


कहाँ करें श्राद्ध

शास्त्रों में किसी भी तीर्थ स्थान पर किसी भी पवित्र नदी के तट पर पिंडदान आदि विधानों के पश्चात गाय के गोबर से बने कंडे को प्रज्वलित कर उस पर धूप देने का नियम है। समयाभाव की स्थिति में अपने निवास पर भी श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। प्रथम श्राद्ध मृत्यु तिथि के पश्चात तीसरे वर्ष में पिंडदान के साथ सिर्फ पूर्णिमा को ही किया जाना अनिवार्य है चाहे दिवंगत की मृत्यु तिथि कुछ भी क्यों न रही हो। इसके पश्चात प्रतिवर्ष सामान्य मृत्यु की स्थिति में मृत्यु तिथि को ही श्राद्ध किया जाता है।


इनका रखें ध्यान

श्राद्ध के पूर्ण लाभ के लिए सही विधि भी अपनाना आवश्यक है। सर्वप्रथम अपने पूर्वज को आमंत्रित करें। इसके पश्चात श्राद्ध स्थल पर काले तिल बिखेर कर दक्षिण दिशा में उन पूर्वज का स्मरण करते हुए धूप दें। तत्पश्चात् ब्राह्मण भोजन करवाएँ। पितृ श्राद्ध के लिए आमंत्रित किए जाने वाले ब्राह्मणों की संख्या विषम होनी चाहिए। ब्राह्मण यथा संभव शुद्ध सात्विक प्रकृति के व वेदपाठी हों यह प्रयास करें।

दिवंगत पितृ से दुर्भावना रखने वाले ब्राह्मणों को आमंत्रित न किया जाए। भोजन करवाते समय आमंत्रित ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में उत्तराभिमुख बैठाकर भोजन करवाएँ। इसके पश्चात यथा शक्ति वस्त्र, अलंकरण आदि दक्षिणा प्रदान करें। यह सभी पितृ के निमित्त ही होगा। धूप देने के तत्काल बाद गौ, कुत्ते व कौवे को ग्रास देना आवश्यक है।


Hot this week

Varshika Gaggar को अमेरिका मे गोल्ड मेडल

नागौर। स्व. श्री महादेवजी एवं स्व. श्रीमती गीता देवी...

Sri Maheshwari Times- February 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times February 2026 Edition on...

Ashva Ratna Mudra for Concentration

अश्व रत्न मुद्रा (Ashva Ratna Mudra) का अभ्यास एकाग्रता...

साझा संस्कृति के आधार- National Festivals

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हमारा...

Kale Til Ke Kachuriya

यह गुजराती डिश है पारंपरिक और ठंड में, उत्तरायण...

Topics

Varshika Gaggar को अमेरिका मे गोल्ड मेडल

नागौर। स्व. श्री महादेवजी एवं स्व. श्रीमती गीता देवी...

Sri Maheshwari Times- February 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times February 2026 Edition on...

Ashva Ratna Mudra for Concentration

अश्व रत्न मुद्रा (Ashva Ratna Mudra) का अभ्यास एकाग्रता...

साझा संस्कृति के आधार- National Festivals

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हमारा...

Kale Til Ke Kachuriya

यह गुजराती डिश है पारंपरिक और ठंड में, उत्तरायण...

Aarav Daga बने चैंपियन ऑफ चैंपियंस

बठिंडा। आरव डागा (Aarav Daga) सपुत्र राजेश डागा ने...

Pallavi Laddha को शक्ति वंदनम पुरस्कार

भीलवाड़ा। अखिल भारतीय माहेश्वरी महिला अधिवेशन अयोध्या में आयोजित...

Babulal Jaju को राष्ट्रीय स्तरीय पर्यावरण पुरस्कार

भीलवाड़ा। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एवं कल्चरल हेरिटेज...
spot_img

Related Articles

Popular Categories

spot_imgspot_img