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क्यों बिखर रहें हैं दाम्पत्य के रिश्ते ?

मकान की नींव ही कमजोर हो गयीं तो मकान गिरने का डर ज्यादा रहता हैं। आज तलाक की समस्या हर समाज में है और इसके लिये हम सब कहीं ना कहीं जबाबदार हैं क्योंकि सारी परिस्थितियों, गलतियों मे हम सब भी जाने अनजाने में भागीदार हैं। अधिकतर हम सब भी मूलभूत कारणों को समझने की बजाय अपने फायदे-नुकसान अनुसार परिस्थितियों का आकलन करते हैं और आदमी देखकर तिलक करते हैं। आज कुछ समस्याएं कैंसर की तरह समाज को खोखला कर रही हैं इसलिये जरूरत है कि हम समस्याओं के कारणों पर खुले निष्पक्ष मन से चिंतन करें और जाने आखिर क्यों बिखर रहें हैं दाम्पत्य के रिश्ते ?

संयुक्त परिवार का टूटना

संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार होने से सदस्यों, बच्चों में केयरिंग, शेयरिंग, संवेदना, सहनशीलता, अपनेपन की बेहद कमी होती जा रही हैं। घर परिवार में साथ रहने से बच्चों को दादा-दादी, काका-काकी, बुआ, नाना-नानी से संस्कार व हमारी संस्कृति की जानकारी मिलती थीै।

बच्चों को बचपन से त्याग, अपनापन, रिश्तों के महत्व की समझ आती हैं जिससे विपरीत परिस्थितियों में भी वह रिश्तों को जोड़े रखने का महत्व समझता है। संयुक्त परिवार में हर सदस्य पर एक दूसरे का मानसिक दबाव-अंकुश रहता है।


बच्चे जो देखते वहीं सीखते हैं

हर पेरेंट्स को यह समझना बेहद जरूरी है कि बच्चे वह नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं बल्कि बच्चे वहीं सीखते है जो वो देखते हैं। इसलिए हर पेरेंट्स को बच्चों के सामने अत्यंत मर्यादित व्यवहार करने की जरुरत है।

आज हर घर में बड़ों में भी बहुत ‘अहं-ईगो’ रहता है और हम हर रिश्ते में सिर्फ़ दूसरो को झुकाकर जीतना चाहते हैं। हम पेरेंट्स बच्चों के सामने अनजाने में रिश्तों के साथ गलत व्यवहार की शिक्षा देते हैं। बच्चे बड़े होकर वहीं सब करते हैं।


बच्चों में अहं का बढ़ता प्रमाण

अर्थशास्त्र का ‘डिमांड एंड सप्लाई’ नियम परिवार पर भी लागू होता है। आजकल परिवार में अधिकांशत: एक ही संतान होती है जिसको पेरेंट्स बहुत ही लाड़ प्यार से पालते हैं व अधिकतर उसकी हर जिद, फरमाइश पूरी की जाती हैं, इस कारण बच्चों को ‘नहीं’ शब्द सुनने की आदत नहीं। इस पर भी उनकी पढ़ाई कॉन्वेंट स्कूलों में होती है जिससे संस्कारों की कमी हो जाती हैं।

बच्चों में ‘ईगो’, ‘अहं’ व ‘जिद’ की मात्रा बहुत ज्यादा हो गयीं इसलिये बच्चे लड़का हो या लड़की झुकना पसंद नहीं करते बल्कि सामने वाले को झुकाने में उनके अहं, ईगो की संतुष्टि होती हैं। शादी के बाद पति-पत्नी दोनों के अहं-ईगो टकराते है और चिनगारी ‘शोलों-ज्वाला’ में कब बदल जाती है, पता ही नहीं चलता।


जवाबदारियों से हो रहे दूर

शायद मेरी इस बात से कई लोग सहमत नहीं हों लेकिन अधिकांश मामलों में यह भी एक कड़वा सच है कि शहरों में बेटे-बेटियों की पढ़ाई-लिखाई घर परिवार से दूर होस्टल में होती हैं, जहाँ उन्हें स्वछंद, स्वतंत्र वातावरण में बिना किसी रोकटोक रहने की आदत पड़ जाती है। शहर में रहते हुये बच्चोें का सुबह से रात तक स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन, दोस्तों-सहपाठियों के साथ समय गुजरता है।

पेरेंट्स भी बच्चों को पारिवारिक जिम्मेदारियों, तनाव से दूर रखते हैं। पढाई करते करते उम्र बढ़कर परिपक्व हो जाती है और अधिकांश मामलों में बच्चों के मन मे यह भावना भर दी जाती हैं कि झुकना मत। बेटियों को शादी के बाद उनको सास, ससुर व ससुराल के रिश्ते बोझ लगने लगते है।


बचपन से ही अति महत्वाकांक्षी

हम बच्चों को बचपन से ही बड़े-बड़े सपने दिखाकर मनी माइंडेड बनाते हैं। आज हम सब चाहते हैं कि हमारा बच्चा बड़ा होकर बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करें। अधिकतर शहरी मामलों में आजकल बच्चों की सैलरी-कमाई पेरेंट्स से ज्यादा होती हैं जिससे वो माता-पिता को तुच्छ समझने लगते है और स्वच्छंद, स्वतंत्र जीवन पसंद करते हैं इसलिए माता-पिता की शिक्षा, सीख, रोकटोक पसंद नहीं करते।

सारांश में हम कह सकते है कुछ समस्या के लिये परिस्थितियां जिम्मेदार हैं लेकिन कुछ समस्याओं के लिए हम सब जिम्मेदार हैं इसलिये हमें सारी बातों पर गौर करते हुए समाधान करना जरूरी है।

शरद गोपीदासजी बागड़ी, नागपुर


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