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साहित्य के सच्चे सेवक- बंशीलाल लड्ढा

वैसे व्यावसायिक रूप से तो एडवोकेट रहे लेकिन जब लेखनी उठाई तो साहित्य को इस तरह समृद्ध किया कि जैसे कोई कमी ही नहीं छोड़ेंगे। उम्र के 74वें पड़ाव पर भी उनकी यह साहित्य सेवा की यात्रा सतत रूप से जारी है। आईये जानें साहित्यसेवी कपासन निवासी बंशीलाल लड्ढा की कहानी।

आजीवन वरिष्ठ एडवोकेट के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले कपासन निवासी 74 वर्षीय वरिष्ठ बंशीलाल लड्ढा उम्र के इस पड़ाव पर साहित्य की सेवा को समर्पित हो चुके हैं। आपने इसे ही साधना बना धर्म, संस्कृति तथा स्वास्थ्य आदि से सम्बंधित कई पुस्तकों का सृजन कर डाला।

अभी तक आपकी पुस्तकें स्वस्थ, सुंदर एवं निरोगी रहने के अचूक उपाय, बालक देश की धरोहर है, बंशी का बिगुल, स्वास्थ्य गीतमाला, जीना इसी का नाम है, सौ तालों की इक चाबी, सुखदायक अन्त्याक्षरी व बुढ़ापे की टॉनिक आदि प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके साथ उनके द्वारा लगभग 20 पुस्तकें लिखकर तैयार हैं, जो शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली हैं। इनमें कई कविता, दोहा, गजल, भजन आदि के रूप में धर्म, संस्कृति, स्वास्थ्य तथा दर्शन आदि की विशद व्याख्या कर रही है।


शिक्षक परिवार में लिया जन्म

श्री बंशीलाल लड्ढा का जन्म 3 अक्टूबर 1947 में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक स्व. श्री मथुरालाल लड्ढा तथा स्व. श्रीमती नानीबाई लड्ढा के यहाँ हुआ था। उन्हें उच्च संस्कार परिवार से सहज ही प्राप्त हो गये। पिताजी श्री लड्ढा एक ऐसे शिक्षक थे, जिन्हें वर्ष 1960 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा सम्मानित भी किया गया था। बी.ए. तथा एलएलबी तक शिक्षा प्राप्त कर श्री लड्ढा वर्ष 1972 से वकालात के व्यवसाय से सम्बद्ध हो गये। इस व्यवसाय में भी अपनी ईमानदारी से आपने विशिष्ट पहचान बनाई।


साहित्य सेवा के वृहद आयाम

श्री लड्ढा ने कई कवि सम्मेलनों में कविता पाठ किया है। बच्चों के लिये निबंध एवं वाद विवाद तैयार करना और उनको दक्षता हासिल कराना भी उनकी विशेषता रही। साहित्य सेवा के लिये साहित्यांचल संस्थान व सामयिकी पत्रिका सहित कपासन सब डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। समय-समय पर हिन्दी जागरण गोष्ठियों में भाग लेना, हिन्दी दिवस पर साहित्य मण्डल, नाथद्वारा के माध्यम से समय-समय पर आयोजित सभाओं में भाग लेना और हिन्दी के लिये अपनी कविताओं की मंचों पर प्रस्तुति तथा प्रसारण करवाना आपकी साहित्य सेवा का अंग रहा है।

नाथद्वारा साहित्य मण्डल द्वारा बृज भाषा के सम्मान से आयोजित सभाओं में लगातार भाग लेते रहे हैं। साहित्य मण्डल नाथद्वारा द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘‘हर श्रृंगार’’ के सदस्य हैं तथा भावाभूषण हिन्दी पदवी से विभूषित तथा साहित्य मण्डल नाथद्वारा से भी हिन्दी भाषा भूषण की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। जिला स्तर पर श्रेष्ठ साहित्य सेवा के लिये वर्ष 2013 में सम्मानित हो चुके हैं।


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