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देहदान करना कितना उचित अथवा अनुचित?

गर्व की बात है कि पिछले एक दशक से मृत्यु के पश्चात अपनी देह का दान करने में लोगों की रुचि बढ़ रही है। मृत्यु के बाद हमारा नश्वर शरीर किसी ना किसी रुप में काम आएगा, ऐसी नि:स्वार्थ सोच ने देहदान करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी की है। साथ ही यह विचार भी आता है कि क्या हमारे इस मृत शरीर का उपयोग अच्छे कार्य के लिए किया जाएगा? अगर मृत्युपरांत इस नश्वर शरीर को अग्नि के सुपुर्द नहीं किया गया तो हम मोक्ष के भागी होंगे भी या नहीं? क्या हमारे हिन्दू-धर्म में देहदान करना मान्य है? अंतिम-क्रिया किये बिना मृतक के मृत्युपरांत कर्मकांड किस प्रकार संपन्न होंगे? कहीं हम देखा-देखी तो देहदान का संकल्प नहीं ले रहे हैं? ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जिनके उत्तर हमारे मन में उमड़ते रहते हैं।

ऐसे में यह विचारणीय हो गया है कि हम चिन्तन करें, समाज ही नहीं बल्कि मानवता के कल्याण से जुड़े इस विशिष्ट विषय पर आपसे आपके तथ्यपूर्ण विचार आमंत्रित हैं। आपके विचार इस दिशा में आमजन को मार्गदर्शित करेंगे। मृत्युपरांत देहदान करना उचित है अथवा अनुचित?आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


जरूरत पर अंगदान उचित
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

स्वेच्छा से मृत्युपरांत अपनी देह का दान करना कानूनन मान्य है और एक नेक कार्य भी है पर हमारी मृतदेह का उचित उपयोग होगा भी या नहीं; इस बात पर मन आशंकित रहता है। सत्तर प्रतिशत लोगों का धर्म और ईमान सिर्फ और सिर्फ पैसा ही है। बेहतर होगा कि मृतक की मृत्युपरांत उसके सगे-संबंधी तुरंत ही निकटतम अंग-प्रत्यारोपण अस्पताल से संपर्क करे और वहां की आवश्यकतानुसार मृतक के अंग अथवा सम्पूर्ण देह का दान कर दे क्यूंकि एक निश्चित समय के बाद मृतदेह के अंग उपयोग में लेने के योग्य नहीं रहते हैं।

बिना जरूरत के देहदान कर इतिश्री ना करें, देखा गया है कि ऐसे में उस मृतदेह की बड़ी दुर्गति होती है। मेडिकल कॉलेज में छात्रों को प्रेक्टिकल के लिए मृतदेह की आवश्यकता नहीं होती है। उनको अनगिनत लावारिस शव प्राप्त हो जाते हैं, वहां भी जब आवश्यकता से अधिक शव पहुंच जाते है तो आप समझ सकते हैं कि उनका क्या होता होगा? किसी नामचीन और कानूनन मान्यता प्राप्त संस्था के सहयोग से ही इस कार्य को पूरा करें वरना बिचौलिये अपनी झोली फैलाये मृत अंगों की तस्करी करने से भी नहीं चूकते।

हिंदू तो देहदान को महादान मानते हैं पर बिना जरूरत के अंगदान या देहदान करना पुण्य का भागी नहीं बनाता। साथ ही इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सनातन धर्म में अंत्येष्टि का विशेष महत्व है; अन्यथा मोक्ष प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए अगर किसी को आवश्यकता हो तो अंगदान अवश्य करें पर देहदान करके मानव जीवन की अंतिम विधि ‘अंत्येष्टि’ को अधूरा ना छोड़ें।


दान किसी भी रूप में हो सर्वोत्तम
नीरा मल्ल, पुरुलिया

देहदान करने से जरूरतमंद को अंग मिल सकता है, विद्यार्थी को सीखने के लिए देह मिल जाएगी। छात्र जितना अभ्यास करेंगे, उतने अच्छे डॉक्टर हमे मिलेंगे। शास्त्रों की मानें तो कहते हैं मृत्यु के पश्चात क्रियाकर्म होना जरूरी है, वरना मोक्ष नहीं मिलता है।

लेकिन मृत्यु के बाद सिर्फ शरीर ही रहता है, आत्मा तो प्रभु में विलीन हो जाती है और उस शरीर की जल्द से जल्द क्रिया करना चाहते है। वहीं दूसरी ओर देह को दान कर दें तो कितनों का भला होगा। किसी अंगविहीन को अंग मिल जाएगा। चिकित्सकों के लिए नश्वर शरीर भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

हमारी संस्त्कृत हमें देना सिखाती है। मृत्यु से पहले भी और मृत्यु के बाद भी। मृत्यु के पश्चात का दान यानी देहदान ही अंतिम दान होगा। जिसके लिए हमें कानूनी रूप से पहले से ही सारी फार्मेलिटी पूरी कर देनी चाहिए। ताकि किसी गलत हाथों में मृत शरीर ना पड़े। सर्वथा ही उचित है देहदान की प्रकिया।


पूरा परिवार भी माने इसे उचित
सतीश लाखोटिया, नागपुर

सनातन धर्म अनूठा है। वेदों पूराणों से लेकर महान संतो, विद्वानों की मुखवाणी से हमने जन्म से लेकर मृत्यु तक हर बात का संस्कृति संस्कारो के साथ क्या महत्व है, इस बात को बखूबी समझा है। हमारे पूर्वजों को इन सब बातों का अनुसरण करते हुए देखकर, हम भी उन संस्कारों को जीवित रखकर. उसे निभाने का शिद्दत से जतन कर रहे हैं।

शरीर के हर अंग का महत्व सायन्स टेक्नोलॉजी के साथ आम इंसान भी को बखूबी समझता हैं। इसमें दो राय नहीं, बदलते दौर में देहदान का प्रचार प्रसार न ही हुआ बल्कि उसे कई लोग असली जामा भी पहना रहे हैं, जो स्वागत योग्य है। पर यह बात भी उतनी ही सच है कि हमारे जीवन में पितरों का स्थान ईश्वर तुल्य ही है। मरने के पश्चात विधि विधान से हर प्रकिया को करने से ही हमें असीम शांति का अनुभव होता है यह सर्वविदित है।

साथ ही साथ हिंदू धर्म की रीति रिवाजों पर हमें अभिमान हैं। यदि घर परिवार में कुछ अनिष्ट हो जाए तो हमारे मन में कई शंकाए, घर कर लेती हैं, और हम लोग विद्वान पंडित की शरण में जाकर इसका समाधान ढूंढते हैं। मेरा मानना है देहदान करनेवाले के साथ उसके परिवार वाले भी इस बात पर दृढ़ निश्चय कर लें कि देहदान के बाद घर परिवार में गलती से कुछ अनिष्ट हो तो वे अपने दिवगंत परिजन को दोष नहीं देंगे। यह कभी ख्याल में नहीं लाएंगे कहीं ये देहदान के वजह से तो नहीं हो रहा?


देहदान नहीं होगा तो ईलाज कैसे होगा
जुगलकिशोर सोमाणी, जयपुर

देहदान तो सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। एक बार तो देव-दानव युद्ध में महर्षि दधीचि ने सत्य की विजय सुनिश्चित करने हेतु अपनी काया को समर्पित कर दिया था क्योंकि अत्यधिक तपश्चर्या से उनकी हड्डियाँ वङ्का समान हो गई थी। यह देहदान तो जीवित अवस्था में किया गया था। विज्ञान अभी तक इतना विकसित नहीं हुआ है कि वह प्राणी के समस्त अंगों को कृत्रिम बना सके।

आज भी रक्तदान से ही मृतप्राय रोगी को जीवन मिलता है। इसी तरह जागरूक नागरिक जानता है कि मेडिकल छात्र बिना चीर-फाड़ के विभिन्न अंगों की प्रक्रिया नहीं समझ सकता। अतः यदि मैं मृत्यु उपरांत देहदान की घोषणा कर परिवार को समझा दूंगा तो कम से कम 100 विद्यार्थी शल्य क्रिया की पद्धति सीख पाएंगे और ये 100 डॉक्टर बनकर हजारों का जीवन बचा पाएंगे। भला इससे बड़ा पुण्य और क्या होगा? दाह-संस्कार या दफनाना – ये अंतिम विधियाँ हैं।

बहुत से पंथ देहदान का विरोध करते दिखते हैं, परन्तु ये भूल जाते हैं कि हमारे बीमार बंधु का ईलाज कैसे सम्भव हो पाता है? अत: देहदान सर्वोत्तम दान है। झिझक मिटाइए।


सर्वथा उचित नहीं है देहदान
राजकुमार मूंधड़ा, मालेगांव

हमारे सनातन धर्म में देहदान को कहीं भी उचित नहीं बताया गया है। महर्षि दधीचि का अपवाद अगर छोड़ दिया जाए (जो कि एक विशेष परिस्थिति में किया गया था) तो कहीं भी देहदान उचित होने का उल्लेख नहीं है। आज के युग में देखा-देखी या यूँ कहे कि मरणोपरांत पुण्य मिलेगा; एक सोच बन गई है। जरूरी नहीं है कि आपका अंग किसी भद्रजन को ही मिलेगा, हो सकता है किसी भ्रष्टजन को मिले।

अगर ऐसा कुछ हुआ तो आपके दान का दुरुपयोग ही होगा और उन पापों का घड़ा आपके सिर फूटेगा। यानि जो पाप आपने नहीं किया उसके जिम्मेदार भी आप होंगे। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि किसी के अंग की क्षति होती है तो विधाता की मर्जी के कारण होती है; यानी अंग की क्षति उस व्यक्ति को ईश्वर से प्राप्त एक सजा होती है। ऐसे में आप किसी को अंगों की मदद करके निसर्ग के विरुद्ध जाने का कार्य तो नही कर रहे?

हम अगर धर्म के बात करे तो क्यों 16 संस्कारों में अंत्येष्ठि को जोड़ा गया है? इसमें देहदान को भी तो जोड़ा जा सकता था। एक बात व्यवहारिक अंदाज में कहना चाहूंगा कि आप दान की मानसिकता से यह संकल्प कर रहे हो परंतु क्या गारंटी है कि उसका व्यापार नही होगा? आजकल जिस अंदाज में मेडिकल की दुनिया चल रही है। ये कैसे मुमकिन नहीं है कि आपके द्वारा दिए गए अवयव का कही कोई आर्थिक लेनदेन नहीं होगा?



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