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सकारात्मक समाजसेवी “हास्य सम्राट”- आर डी बाहेती

एक पुरानी फिल्म का बहुत ही प्रसिद्ध गीत है, ‘जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम, कि रस्ता कट जाएगा मितरा, कि बादल छंट जाएगा मितरा….।’ यह ऊर्जावान गीत जयपुर निवासी ख्यात समाजसेवी, हास्य सम्राट आर डी बाहेती पर बिल्कुल खरा उतरता है। जिंदगी के प्रति उनकी सोच हमेशा सकारात्मक रही है। श्री आर डी बाहेती ना सुख में इतराते हैं, ना दुख में घबराते हैं। उनका कहना है कि सुख-दु:ख तो धूप-छांव की तरह होते हैं, आते हैं, चले जाते हैं, उनसे विचलित होना कैसा?

जयपुर निवासी श्री बाहेती का यह जीवन दर्शन आज का नहीं है। स्कूल के दिनों से ही उन्होंने यह सोच बना रखी है। स्कूल के बाद कॉलेज, फिर यूनिवर्सिटी, फिर नौकरी और व्यवसाय, सभी में उन्होंने अपनी यह सोच बनाए रखीै। समाजसेवा को उन्होंने अपने जीवन का ध्येय बना रखा है। आज वह 87 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उनकी लाइफ स्टाइल में जरा भी बदलाव नहीं आया है।

बाहेती जी का कहना है कि दुनिया में आने का उद्देश्य सिर्फ यह नहीं है कि व्यक्ति पैसा कमाने में लग जाए। पैसा भी जीवन के लिए बहुत जरूरी है, लेकिन पैसा ही सुब कुछ नहीं होता। खुशियां सिर्फ पैसे से नहीं प्राप्त होतीं। यदि ऐसा होता तो हर पैसे वाला व्यक्ति सुखी होता। दुनिया में धनकुबेरों की कमी नहीं है, पर अधिकांश धनी व्यक्ति दु:खी देखे गए हैं।

उन्हें किसी न किसी बात पर दु:खी देखा गया है। अपार धन होते हुए भी कोई स्वास्थ्य से दु:खी रहता है, कोई संतान न होने पर दु:खी रहता है और कोई संतान होने के बावजूद सुख प्राप्त न कर पाने के कारण दु:खी रहता है। इसलिए सिर्फ धन को सुख का कारक नहीं मानना चाहिए।


हास्य योग ने दिलाया सम्मान

योग के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें तत्कालीन राज्यपाल द्वारा ‘राजस्थान श्री’ की उपाधि से नवाजा गया। माहेश्वरी समाज, जयपुर की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में भी उन्होंने भरपूर आर्थिक सहयोग दिया है। शिक्षण संस्थाओं के निर्माण एवं उद्घाटनकर्ता के रूप में आप सदैव आगे रहे हैं। श्री बाहेती और हास्य का चोली-दामन का साथ है। हंसने-हंसाने को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है।

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यदि यह कहा जाए कि हास्ययुक्त जीवन बिताने के कारण ही वह बढ़ती उम्र में भी सक्रिय हैं, तो गलत नहीं होगा। श्री बाहेती ने बाकायदा हास्य पर विश्लेषणात्मक काम किया। साथ ही उसे योग का दर्जा दिलाने के लिए उसके वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन भी किया। उन्होंने आज से 53 वर्ष पहले ही हास्य का महत्व समझ लिया था और उन्होंने 1970 में जयपुर में जब हास्यम संस्था की स्थापना की, जो उस समय एक छोटा-सा समूह था।

धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और हास्य क्लब देश का पहला हास्य क्लब बन गया। श्री बाहेती का कहना है कि उनकी यह संस्था गैर व्यावसायिक, गैर-राजनीतिक एवं सामाजिक है। इसकी सदस्यता के लिए भी कोई फीस नहीं है, यह पूरी तरह से नि:शुल्क है।


समाजसेवा में चहुँमुखी योगदान

श्री बाहेती का कहना है कि जीवन की भाग-दौड़ में हताश-निराशा एवं थका मानव इतना भ्रमित एवं परेशान कभी नहीं दिखा। अपनी उलझनों के चक्रव्यूह में फंसकर स्वास्थ्य, निरोगता एवं उल्लास उसके लिए दवाओं और टॉनिकों के मायाजाल में उलझ गया है। व्यक्ति यदि हास्य और योग को अपना ले, तो इन सब चीजों से बच सकता है। उनकी समाजसेवा किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है।

स्वास्थ्य, योग, हास्य, शिक्षा, समाज कल्याण सहित विभिन्न क्षेत्रों में वे सक्रिय हैं। वह एक ओर सामूहिक विवाह कराते हैं, तो दूसरी ओर हास्य क्लब की स्थापना करवाते हैं। योग, स्वास्थ्य, खेल, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में उनकी विशेष रुचि है। वर्ष 1975 में सामूहिक विवाह के आयोजन का श्रेय भी उन्हें है।

यह उत्तर भारत का पहला सामूहिक विवाह था। श्री बाहेती को कई चीजों की शुरुआत का श्रेय जाता है। सामूहिक विवाह भी उनमें से एक है। इसके अलावा हास्य क्लब, लॉयंस क्लब, योग संस्थान मुख्य हैं। लॉयंस क्लब के माध्यम से श्री बाहेती ने कच्ची बस्तियों में शिक्षा की अलख जगाई। कई बस्तियों में उन्होंने प्राथमिक स्कूल भी खुलवाए।


जीर्ण मंदिरों का सौंदर्यीकरण

पुराने व जीर्ण-शीर्ण मंदिरों का सौंदर्यीकरण कराना भी उनका शौक है। जंगलेश्वर मंदिर बनीपार्क सहित दर्जनों मंदिरों का वे सौैंदर्यीकरण करा चुके हैं। आगरा रोड स्थित बद्रिकाश्रम में हनुमान जी व शिवजी की 51 फीट की विशाल मूर्तियों की स्थापना भी बाहेती जी ने करवाई थी।

धार्मिक व प्रशासनिक कामों में भी वह पीछे नहीं हैं। एक वृहद संत सम्मेलन भी वह जयपुर में करवा चुके हैं। स्वास्थ्य योग परिषद की स्थापना का लाभ यहां के सैकड़ों योग साधकों को मिल रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बनीपार्क धर्मार्थ संस्थान योगदान कर रही है। श्री बाहेती कई बार इसके अध्यक्ष रह चुके हैं। इसमें 50 बेड का अस्पताल संचालित है और बाजार से रियायती दर पर विभिन्न जांचें की जाती हैं।

इतनी जिम्मेदारियां उठाने के साथ-साथ वह माहेश्वरी समाज के समारोहों व कार्यक्रमों में नियमित रूप से भाग लेते हैं। कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास कराती है। 87 वर्ष की उम्र में भी उनका यह क्रम टूटा नहीं है।


उनके दीर्घ जीवन का राज

अपने स्वस्थ व हंसमुख रहने का राज बताते हुए वह कहते हैं कि वे रोज सुबह चार बजे उठते हैं और रात्रि 9-10 बजे तक निरंतर किसी न किसी काम में अपने को व्यस्त रखते हैं। वे पैसे से अधिक मोह नहीं रखते। उनका मानना है कि आप जितना दान-पुण्य करेंगे, वह चार गुणा होकर लौटेगा। इसलिए चिंता करने की कोई बात नहीं। वह कहते हैं –

आदमी, आदमी को क्या देगा,
जो भी देगा, वह खुदा देगा।

इस तरह की सोच रखने वाले श्री बाहेती सबकी मदद को तत्पर रहते हैं। वे कहते हैं कि इससे उन्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है।


कई संस्थाओं में योगदान

वे माहेश्वरी समाज जयपुर के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए स्थानीय माहेश्वरी समाज ने उन्हें संरक्षक मनोनीत किया है। अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारत वर्षीय माहेश्वरी सभा के उपाध्यक्ष भी रहे हैं। सांस्कृतिक चेतना जागृत करने के लिए उन्होंने प्रीति क्लब की स्थापना की।

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श्री बाहेती गुलाब उद्यान समिति, बनीपार्क के संस्थापक सदस्य, जयपुर क्लब के संरक्षक व आदित्य विक्रम बिड़ला ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य हैं। जयपुर स्थित पिंजरापोल गोशाला में उन्होंने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कांता देवी बाहेती की स्मृति में लगभग 10 हजार वर्गफुट के वातानुकूलित सभागार का निर्माण सवा करोड़ रुपए से अधिक की लागत से कराया है। यह सभागार धार्मिक, वैवाहिक एवं सामाजिक आयोजनों में उपयोग में लिया जाता है।

इन आयोजनों से प्राप्त राशि गौ सेवा हेतु काम में ली जाती रहेगी। राजस्थान के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री एम.ए. खान (दुर्रुमियां) एवं जयपुर की तत्कालीन महापौर ज्योति खंडेलवाल भी स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए श्री बाहेती को एक हंसी-हजार जिंदगी अलंकरण से सम्मानित कर चुके हैं। श्री बाहेती की संवेदनशीलता, दयालुता, विनम्रता और दूसरों की मदद करने की आदत को देखते हुए सबके मुंह से यही दुआ निकलती है कि वे शतायु हों।


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