पारिवारिक समन्वय के लिये जरूरी काउंसलिंग सेंटर

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पूर्व में संयुक्त परिवार व्यवस्था लागू रहने से परिवार की 3-4 पीढ़ियाँ तक एक साथ रहती थी। इससे उन्हें एक दूसरे को समझने का अवसर मिलता था। लेकिन वर्तमान में संयुक्त परिवार व्यवस्था बिखरती ही जा रही है और अधिकांशतः एकल परिवारवाद हावी हैं। इसी का नतीजा है, दो पीढ़ियों में संवाद की कमी और इससे टकराव की वृद्धि। इस समस्या का एक ही सामाजिक समाधान सम्भव है और वह है, काउंसलिंग सेंटर की स्थापना।

आज संयुक्त परिवार के स्थान पर बढ़ते एकल परिवारों में दो पीढ़ी के बीच पर्याप्त संवाद न होने के कारण अनेक सामाजिक समस्याओं ने जन्म ले लिया है, ऐसे में परस्पर मनमुटाव भी बढ़ रहे हैं। अतः सामाजिक स्तर पर काउंसलिंग सेंटर का होना आवश्यक हो गया है।

इन सेंटर्स पर व्यक्ति अपने मन की बात कह कर बीज रूप में पनपी समस्या का समाधान प्राप्त कर सकता है। कुछ विषय स्पेशल ग्रुप्स में चर्चा-परिचर्चा के माध्यम से मानसिक बदलाव लाने में सहायक हो सकते हैं और कुछ समस्याये व्यक्तिगत चर्चा के बाद। इसमें काउंसलर्स की टीम समस्या का समाधान निकालती है।


कैसे हों काउंसलिंग सेंटर

प्रत्येक गांव या शहर में 4-5 व्यक्तियों की टीम पूर्व निर्धारित समय,स्थान व दिन नियमित रूप से बैठना प्रारंभ करें। इसकी जानकारी नगर के प्रत्येक परिवार तक किसी भी प्रचार माध्यम से पहुंचे। इसमें उस समूह के सदस्यों के नाम व मोबाइल नंबर भी रहें।

इसके लिये टीम के सदस्यों की अर्हताऐँ में समय दान, स्वभाव में संयम, चर्चा को गुप्त रखने की क्षमता, अपने अनुभव के आधार पर समझाने की कला, धैर्य, किसी भी समस्या को सुनकर परस्पर चर्चा कर सलाह देने की क्षमता सदस्यों में अनिवार्यतः हो। कुछ विषयों पर वकील, मनोचिकित्सक, डॉक्टर आदि से भी परामर्श कर सकते हैं। इन विशेषज्ञों को भी टीम का सदस्य माने।


निर्धारित रहे सेन्टर की कार्यप्रणाली

सेन्टर के सही कार्यान्वयन के लिये उसकी कार्यप्रणाली का सुस्पष्ट व निर्धारित होना भी जरूरी है। इसमें सेन्टर की टीम प्रार्थी की समस्या को ध्यान से सुने। उससे लिखित में आवेदन लें अथवा टीम सदस्य उसकी बात को लिखकर उसके हस्ताक्षर करवा लें। एक-दो दिन बाद उसे बुलाकर सलाह या सुझाव दें तथा उसे सोचने का समय दें।

समस्या के स्वरूप के अनुसार प्रार्थी द्वारा बताए गए व्यक्तियों की बात भी सुनें, उनके बयानों पर हस्ताक्षर ले लें। टीम प्रत्येक प्रार्थी की अलग-अलग फाइल बनावे। चर्चा को सार्वजनिक ना करें। टीम सदस्य गहनता से विचार-विमर्श करके उचित राय देंगे तो बहुत संभव है कि छोटी-छोटी समस्याएं प्रारंभिक रूप से ही सुलझ जाएगी।


“ग्रुप डिस्कशन” भी हो अनिवार्य

“ग्रुप डिस्कशन” एक मनोवैज्ञानिक विधि है। अतः इसे अवश्य शामिल करें। किसी भी विषय पर भाषण देना एक औपचारिकता है, परंतु छोटी-छोटी समूह चर्चा अधिक प्रभावी होगी, यह मानसिक परिवर्तन की ओर एक छोटा सा कदम होगा।

इसमें विवाह पूर्व मानसिक तैयारी, जीवनसाथी कैसा हो, परिवार में समरसता लाने में मेरी भूमिका, करियर व परिवार में सामंजस्य, जीवन संध्या को खुशहाल कैसे बनाएं, लड़कों की उच्च शिक्षा की आवश्यकता, टेक्नोलॉजी के कारण बेहतर ग्राम जीवन संभव, संबंध विच्छेद के कारण व निवारण, परंपरा व परिवर्तन कहां तक स्वीकार्य हो, जैसे विषय शामिल हैं।

इस प्रकार और भी सुझाव प्राप्त हो सकते हैं। मेरा आग्रह है कि इसके लिए रुचि रखने वाले सदस्यों की एक समिति बनाई जाए तथा हर शहर में अनुभवी व्यक्तियों का सहयोग लेकर इसे आगे बढ़ाया जाए।

गीता मूंदड़ा, इंदौर
(लेखिका अ.भा. माहेश्वरी महिला संगठन की अध्यक्ष रही हैं।)



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