जिसका चरित्र पारदर्शी वही योग्य ‘राजा’

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महाभारत कुल कलह की कथा है। पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर आदि पाँच भाई बाल्यकाल से ही प्रतिभावान, गुरुजनों के आज्ञाकारी, व्यवहार में विनम्र और सबके हितैषी थे इसलिए लोकप्रिय थे। इसके उलट धृतराष्ट्र के दुर्योधन आदि सभी सौ पुत्र उद्दंड, अवज्ञाकारी और कटु वचनों का व्यवहार करने के कारण लोक में तिरस्कृत होते थे।

जैसे-जैसे समय बीता दोनों पक्षों के मूल स्वभाव के अनुरूप उनके गुण विकसित होते गए। पाण्डवों में सह्रदयता, साहचर्य, संयम और सर्वस्वीकार्य फलित हुआ जबकि कौरवों ने छल, कपट, ईर्ष्या और अहंकार के काँटे फले। परिणाम में कौरव नष्ट हो गए और पाण्डवों को राज्य, सम्पत्ति, मान आदि सब मिला।


इतिहास साक्षी है, जो भी छल, कपट, ईर्ष्या, लोभ, मोह, मद, क्रोध आदि का आचरण करता है, वह अपने अवगुणों के कारण एक दिन नष्ट हो जाता है।

ऐसा व्यक्ति लाख शिक्षित, धनी, बलशाली, पद प्रतिष्ठित और प्रतिभाशाली हो मगर परिवार से लेकर समाज तक उसका दुर्व्यवहार और दुराचरण उसे नाश की नियति तक लाकर खड़ा कर देते हैं।

विशेषकर जब यह ‘फ़ितरत’ जाति व कुटुम्ब के लोगों के साथ की जाए तो करने वाले का अंत उसकी कुटुम्बीजन ही कर डालते हैं। ठीक वैसे ही जैसा महाभारत में हुआ।

पितामह भीष्म धृतराष्ट्र और दुर्योधन के चरित्र को जानते थे, जो कुटुम्बियों से ही छल करके नाश, दुःख और अपमान के भागी बने। इसलिए जब युधिष्ठिर उनके पास राजधर्म का उपदेश लेने पहुँचे तो भीष्म ने सबसे अधिक महत्व चरित्र की शुचिता, सद्कर्म और कुटुम्बियों से सद् व्यवहार का दिया।

महाभारत के शांतिपर्व के 80वें अध्याय में भीष्म ने युधिष्ठिर को सचेत करते हुए कहा, ‘ज्ञातिभ्यश्चैव बुद्धयेथा मृत्योरिव भयं सदा।’ अर्थात् तुम अपने कुटुम्बीजनों से सदा उसी प्रकार भय मानना जैसे लोग मृत्यु से डरते हैं।


ऐसा इसलिए कि यदि स्वजनों के प्रति व्यक्ति का आचरण निष्पक्ष और व्यवहार पारदर्शी होता है तो वे सहयोगी होते हैं अन्यथा विरोधी हो जाए तो शत्रु से अधिक कष्टदायक बन जाते हैं।

भीष्म ने कहा था, ‘अज्ञातिनोएपि न सुखा नावज्ञेयास्तत: परम’ अर्थात् जिसके कुटुम्बी या सगे-सम्बन्धी नहीं होते वह सुखी नहीं रहता। इसलिए कभी भी कुटुम्बियों की अवहेलना नहीं करना चाहिए।

जिसे अपनी जाति या कुटुम्ब में ‘राजा’ बने रहना हो, उसे सबकी शांति के शांतिपर्व के इन सूत्रों का अवश्य अनुसरण करना चाहिए। सबके प्रति समान भाव और मधुर व्यवहार ही राजा को ‘राजा’ बनाए रखता है।

ऐसे में राजा का यही कर्तव्य है कि ‘सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा। कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत्।।’ अर्थात् ‘राजा’ का कर्त्तव्य है कि वह सदा अपने जातीय बंधुओं का वाणी और क्रिया द्वारा आदर-सत्कार करे। वह प्रतिदिन उनका प्रिय ही करता रहे, कभी कोई अप्रिय कार्य न करे।

डॉ. विवेक चौरसिया


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