‘ बेटी को ब्याहो और बहु को पढ़ाओ ‘ नारा कितना कारगर है?

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आजकल बेटियों की उच्च शिक्षा और कैरियर बनाने में विवाह की उम्र बढ़ती जाती है जिससे विवाहोत्तर समस्याएं जन्म लेती हैं। इन समस्याओं से निदान पाने के लिए हमारे समाज बंधुओं ने एक बहुत सुंदर उपाय सुझाया है कि ‘‘बेटी को समय से ब्याहो और बहू को पढ़ाओ ’’। पर क्या इस उपाय पर हर परिवार अमल करेगा? अपनी बहू को विवाह के बाद भी अपनी शिक्षा पूरी करने की आजादी देने के साथ-साथ क्या उसका कैरियर बनाने के लिए यथासंभव सहायता करेगा? क्या बेटी अपनी बहू की जिम्मेदारियों के साथ अपनी शिक्षा से न्याय कर पायेगी ?

अपनी शिक्षा और कैरियर को पूरा करने के सफर में विवाह के बाद बहू के समक्ष अपने ससुराल के परिवार में आपसी मनमुटाव की स्थिति पैदा तो नहीं होगी? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर छुपा है, इस विषय कितना कारगर है, ‘‘बेटी को ब्याहो और बहू को पढ़ाओ ’’ का नारा ? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


आसान नहीं तो मुश्किल भी नहीं है विवाहोत्तर बहू की शिक्षा-दीक्षा
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

विवाहोत्तर समस्याओं से निजात पाने के लिए बच्चों का समय से विवाह हो जाना अतिआवश्यक है परंतु उच्च-शिक्षा पाने और कैरियर बनाने के चक्कर में बढ़ती उम्र को दरकिनार कर दिया जाता है। अगर बेटी का समय से विवाह हो जाये और विवाह के बाद ससुराल में उसकी शिक्षा और कैरियर बनाने में यथासंभव योगदान मिले तो समाज की एक ज्वलंत समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है।

सुमिता मूंधड़ा

बहू को अपनी शिक्षा और कैरियर के लिए ससुराल में अनुमति मिलना अगर आसान नहीं है तो मुश्किल भी नहीं है। रिश्ता जुड़ने के पूर्व ही इस बारे में समझदारी से खुलकर बात कर लेनी चाहिए। सगाई और शादी के बाद भी ससुराल अपनी जुबान पर कायम रहकर बहु का साथ दे। एक निश्चित समय तक बहू पर जिम्मेदारियों का बोझ ना डाला जाए। इसके लिए बहू और ससुरालवालों के बीच आपसी तालमेल और सामंजस्य होना बहुत जरूरी है।

यह आवश्यक नहीं है कि उच्च शिक्षा पाकर हर बेटी-बहू व्यवसाय या नौकरी ही करेगी। कुछ बेटियां अपने शौक के लिए भी उच्च-शिक्षा प्राप्त करना चाहती हैं। भविष्य में आपकी बहू की यही उच्च शिक्षा आपके परिवार के आड़े वक्त में ढाल बन सकती है। समय बदल गया है, रहन-सहन और खान-पान का स्तर बदल रहा है।

ऐसे में परिवार के एक पुरुष सदस्य पर पूरा घर आश्रित रहने के स्थान पर परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों उठाने में अगर बहू साथ दे तो यह शर्म नहीं गर्व की बात है। अगर हम अपनी बेटी की उच्च-शिक्षा और कैरियर के प्रति सजग हैं तो हमें यही नजरिया अपनी बहू के प्रति भी रखना होगा।

बहू के भविष्य के प्रति आपकी सकारात्मक पहल आपसी संबंधों में भी सम्मान और घनिष्ठता बढ़ायेगी।


सही उम्र में ब्याह जरूरी
पूजा काकाणी, इंदौर

यह नारा तो उन्नत हो जायेगा, यदि सभी समाज बंधु अपने सोच बदलेंगे। बेटी को सही उम्र में ब्याह देना चाहिए, ऐसा ससुराल ढूंढो कि वहां वह अपना करियर भी बना सके। सही उम्र में ब्याह देने से संतान भी सही उम्र में हो जाती हैं।

बहू को पढ़ाओ
पूजा काकाणी

आज के समय में 30 की उम्र तो बेटियों को पढ़ाने में ही निकाल देते हैं और उसके बाद ब्याह करते हैं। फिर दुनिया भर के डाक्टरी इलाज कराते हैं, तब जाकर संतान होती है। दूसरे पक्ष में सासरे वाले को भी बहू को बेटी जैसे अधिकार देने चाहिए, जिससे वह अपने आगे का कैरियर चुन सके।

किसी की बेटी हमारे घर की बहू है और हमारी बेटी किसी घर की बहू। हमारी बेटी के पास वही लौटकर जाने वाला है, जो व्यवहार हम अपनी बहू के साथ करेंगे।

विश्व जननी के अनेक रूपों में से एक रूप बेटी है, सदा उसका सम्मान करो क्योंकि, वह है तो ही तुम हो। सही बेटी है तो कल है।


ना किंतू ना परंतू, बिल्कुल पढ़ाओ बहू
अभिषेक प्रेमप्रकाश गोदानी, नागपुर

हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि वह दिन लद गए जब ‘बहू को पर्दे मे ही रखते थे..। यह सोच हुआ करती थी।

बहू को पढ़ाओ
अभिषेक गोदानी

कुछ दशको से तो हमारे समाज में महिलाएं व्यापार व्यवसाय संभालते ही आ रही है। तो हमे उच्चशिक्षा से बहू को नही रोकना चाहिए व बशर्ते बहू अगर उच्च शिक्षा लेना चाहती हो।

सास-ससुर या घर के बड़े सदस्यों को ही बहू को स्वयं मोटीवेट करना चाहिए।

यह कहने के पीछे मेरा कारण है कि किसी भी आपातकाल मे बहू आपके परिवार की जिम्मेदारी का भार उठा पाए व हमारे समाज व परिवार को बिखरने से रोका जाए।


बेटी ब्याहो और बहू को पढ़ाओ
गोपाल रामचंद्रजी मनियार, परभनी

21वी सदी के लिए उपरोक्त वाक्य एक दम सही है, क्योंकि इस 21वी सदी में तो उच्च शिक्षा के नाम पर अक्सर हम बेटी वाले के माता-पिता को कहते हुए सुनते हैं कि अभी तो हमारी बेटी पढ़ रही है। ऐसा कहते-कहते उसकी आधी उम्र तो पढ़ाई में ही जा रही है। उसके बाद शादी बच्चे आदि।

गोपाल मनियार

यह सब होते-होते इतना समय चला जाता है कि अगली पीढ़ी अपने दादा-दादी, नाना-नानी इनके प्यार का, संस्कार का मजा नहीं ले पाती और ना ही दादा-दादी नाना-नानी अपने पोती-पोतों व दोयतो की शादी का हिस्सा बन पाते हैं। हमें एक कदम बढ़ाना चाहिए, सही उम्र में बेटी की शादी करानी चाहिए और उसके ससुराल वाले उसकी अगली शिक्षा पूरी करा कर उसका करियर बनाएं।

हमें अपनी सोच बदलनी होगी। अगर बहू बेटी पढ़ेगी तो आने वाली पीढ़ी भी संस्कारित होगी। जिस तरह हम अपने बेटे को उसके पैरों पर खड़े होने को कहते हैं, उसका करियर बनाने को कहते हैं, ठीक उसी तरह बहू का भी हक है, अपना करियर बनाने का, अपने पैरों पर खड़े होने का। इस बात के लिए हमें उसका पूरा साथ देना चाहिए।


नये नियम और प्रावधान हों लागू
ऋचा बियाणी, देवास

समाज द्वारा सुझाया गई ये युक्ति एक सुखद अनुभूति का अहसास कराती है। सही समय पर विवाह करने के लिए यह बहुत कारगर उपाय है। यदि इसकी सकारात्मक पहल होती है, तो इसे अपनाने में कोई समस्या नहीं है।

ऋचा बियाणी

आज की लड़की अपने सपनों को पूरा करने के साथ-साथ परिवार की ज़िम्मेदारियों का निर्वहन भी बखूबी जानती है, इसलिए नारी हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर पा रहीं हैं। किंतु इसे एक अनिवार्य नियम नहीं बनाया जा सकता, लड़कियों की इच्छा और उनकी पढ़ाई के अनुरूप ही इसे अमल में लाया जा सकता है।

इसके अमल के पूर्व, सर्वप्रथम यह सुनिश्चित करना होगा कि लड़की के ससुराल पक्ष को इससे कोई आपत्ति ना हो और शादी के बाद कोई अड़चन उसकी शिक्षा में ना आने पाये, अन्यथा ये किसी भी इंसान के सपनों और भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

इस सुनिश्चितता के लिए कुछ प्रावधान और नियम बनाने होंगे, जिनका सख्ती से पालन किया जाना अनिवार्य होगा।



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