सटिक ज्योतिष फलित का आधार बनती- कृष्णमूर्ति पद्धति

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वर्तमान में ज्योतिष में फलित कथन के लिये पाराशरी, जैमिनी आदि कई ज्योतिष पद्धतियाँ प्रचलित हैं। वैसे तो यह पद्धतियाँ अपना-अपना महत्व रखती है, लेकिन इनमें मात्र भाव व राशियों के आधार पर ही होने वाला फल कथन सटीक नहीं होता। इसी का समाधान है, कृष्णमूर्ति पद्धति जो 12 राशि के स्थान पर नक्षत्रों, उपनक्षत्रों व उनके भी उपभागों के आधार पर सूक्ष्म गणना हेतु प्रचलित है।


कृष्णमूर्ति पद्धति वैदिक एस्ट्रोलॉजी से अलग सूक्ष्म गणनाओं के लिए प्रसिद्ध है। यदि हम अन्य पद्धतियों की बात करें तो पाराशरी, जैमिनी आदि कई ज्योतिष पद्धतियां हैं, वे भी अपने आपमें पूर्ण हैं। कृष्णमूर्ति पद्धति कोई प्राचीन पद्धति नहीं है। जैमिनी सिद्धांत तो अपने आपमें पूर्ण सिद्धांत है जो हमारे मौसम आदि की गणना के लिए प्रसिद्ध है।

कृष्णमूर्ति पद्धति में राशि को महत्व न देते हुए नक्षत्र को महत्व दिया गया है। दक्षिण भारत के श्री केएस कृष्णमूर्ति ने भारतीय एवं पाश्चात्य ज्योतिष का गहन अध्ययन किया तथा अपनी पद्धति में समावेश भी किया। उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों पद्धतियों में कुछ वैज्ञानिक त्रुटियां महसूस कीं। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय ज्योतिष की कड़ियाँ भारत में एक लम्बे समय तक परतंत्रता के काल में बिखर गयी या लुप्त हो गई।

सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के पश्चात् श्री कृष्णामूर्ति महर्षि पाराशरजी की विंशोत्तरी दशा से भी बहुत प्रभावित हुए। महर्षि पाराशर के अनुसार कुंडली में चंद्र जिस राशि में स्थित होता है, उस राशि का या उसके स्वामी का प्रभाव बहुत कम होता है, किन्तु चंद्र जिस नक्षत्र में होता है, उसके स्वामी की महादशा होती है एवं जो नक्षत्र नवांश होता है, उसकी अंतर दशा होती है, जिसका प्रभाव मुख्यरूप से उस जातक पर होता है।

विंशोत्तरी दशा के नियमों पर आधारित नियमों के आधार पर ही नक्षत्रों का विभाजन उप नक्षत्रों तथा उप उप नक्षत्रों में करके उन्होंने फलादेश की विद्या में एक नई पद्धति को जन्म दिया। यही नहीं, कृष्णामूर्ति जी ने चन्द्रमा ही नहीं, वरन शेष सभी ग्रहों की स्थिति नक्षत्र, उप नक्षत्र, उप नक्षत्रों में बांट दी।


कार्येश है फल कथन का आधार

कृष्णमूर्ति पद्धति किसी भी घटना की भविष्यवाणी करने के लिए यह सबसे सरल और सटीक तकनीक है। इस पद्धति में बहुत सारे श्लोक, सूत्र, अपवाद और अन्य जटिल नियमों को याद करने की आवश्यकता नहीं है। अन्य ज्योतिष पद्धतियों में कई भ्रांतियां भी है।

केपी पद्धति भविष्यवाणी की नक्षत्र प्रणाली और इसके उपस्वामी पर आधारित है। केपी पद्धति के अनुसार एक ग्रह अपने भाव (जिन भावों का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है) के अलावा अपने स्टार-लॉर्ड (नक्षत्राधिपति) के भावों का फल देता है अर्थात वह नक्षत्राधिपति जिन भावों का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है।

किसी भी घटना के होने या ना होने में कार्येश ही भूमिका निभाते हैं। यदि दशांतर्दशा आदि के स्वामी किसी एक घटना के होने के कार्येश हैं तभी उस दशा विशेष में वह घटना घटेगी और वह लाभप्रद होगी या हानिकारक, यह कार्येश का उपस्वामी निर्धारित करेगा।

यदि कार्येष का उपस्वामी भी उस घटना से सम्बन्धित भावों का कार्येष है तो फल मिलेगा अन्यथा नही। यदि नकारात्मक भावो से सम्बन्धित है तो फल नकारात्मक मिलेगा।


ग्रह की अपेक्षा नक्षत्र अधिक बली

शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड में सभी ग्रह 360 डिग्री के काल्पनिक राशि-चक्र में वृत्ताकार पथ पर भ्रमण करते हैं। इस राशि-चक्र को 30 डिग्री के 12 भागों में वर्गीकृत किया गया है, जिसे राशि चिन्ह या ‘राशी’ के रूप में जाना जाता है।

इस प्रकार 360 डिग्री के राशि-चक्र में 27 नक्षत्र होते हैं जिन्हें 249 उपनक्षत्रों में विभाजित कर दिया जाता है और इन 249 उपनक्षत्रों को और भी अधिक 2193 भागों में। 13 डिग्री 20 मिनट के 27 बराबर भाग, जिन्हें नक्षत्र कहा जाता है, फिर से, प्रत्येक तारे को 9 भागों में विभाजित किया जाता है, जिन्हें ‘उप’ के रूप में जाना जाता है।

केपी सिस्टम में ‘सब’ डिवीजनों के लॉर्ड्स को ‘सब लॉर्ड्स’ के रूप में भी जाना जाता है। प्रत्येक राशि चक्र में 2 और 1/4 नक्षत्र होते हैं और हमने केपी प्रणाली में विशेष नक्षत्र के 9 डिवीजनों का अनावरण किया है। इन 9 डिवीजनों में से हर एक भाग कुछ ग्रहों को आवंटित किया गया है।


ऐसे होता है सटिक फल कथन

केपी पद्धति में किसी भी फल के निर्णय के लिये केवल एक भाव नहीं बल्कि भाव का समूह होता है। प्रत्येक भाव से 12वां भाव नकारात्मक परिणाम देता है। किसी घटना के सकारात्मक या नकारात्मक फल ग्रह व कार्येश बताता है।

इसके लिए दशा, भुक्ति अंतर्दशा के ग्रह के कार्येश देखना चाहिए। उदाहरण के लिए विवाह में सकारात्मक भाव – 3,7,11 तथा नकारात्मक भाव – 2,6,10 देखे जाते हैं। अगर सातवें भाव का सबलॉर्ड विवाह के लिए वचनबद्ध है कुंडली में, तो भी उसकी दशा एवं भुक्ति अंतर्दशा में सकारात्मक भाव 2,7,11 होंगे तभी विवाह संभव होगा।

यदि 2,6,10 भाव सक्रिय होंगे तो नकारात्मक परिणाम आएंगे। इसी तरह नौकरी के लिए सकारात्मक भाव – 2,6,10 तथा नकारात्मक भाव – 1,5,9 महत्वपूर्ण हैं। इसी प्रकार अन्य गतिविधियों के लिये भी सटिक फलकथन किया जाता है।


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