जन्मभूमि के “सच्चे लाल”- महावीर प्रसाद काबरा

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आमतौर पर न सिर्फ बच्चे बल्कि परिवार भी अच्छी शिक्षा के लिये गांव से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। लेकिन यह स्थिति सीकर (राजस्थान) के छोटे से गांव रैवास में नहीं है। इसका कारण है, वरिष्ठ समाजसेवी महावीर प्रसाद काबरा तथा उनके परिवार का शिक्षा में योगदान जिसने इसे राजस्थान की प्रमुख शिक्षा स्थली ही बना दिया।


लगभग 200 वर्ष से राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के सीकर जिले में काबरा परिवार का नाम उनके योगदानों के कारण बहुत प्रतिष्ठित रहा है। रैवासा ग्राम के निवासी स्व. श्री मोहनलाल काबरा और उनकी पत्नी श्रीमती कृष्णा देवी के नाम से उनके सुपुत्रों ने 30 वर्ष पूर्व बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने की भावना से एक विद्यालय का निर्माण किया था। आज यह ‘कृष्णा देवी मोहनलाल काबरा राजकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय’ राजस्थान के प्रमुख विद्यालयों में से एक बन चुका है।

इस विद्यालय के विकास में प्रमुख आर्थिक योगदान देने वाले है, महावीर प्रसाद काबरा, जो श्री मोहनलाल काबरा के चौथे पुत्र हैं। स्व. श्री मोहनलाल काबरा श्री छितरमल काबरा के इकलौते पोते थे। पुराने समय में रैवासा को दातार सेठ ‘श्री छितरमल जी काबरा का गाँव’ भी कहा जाता था, क्योंकि वे वहाँ के महादानी माने जाते थे। कुछ वैसे ही दानशील हैं उनके प्रपोत्र महावीर प्रसाद काबरा भी।


परिवार भी सेवा कार्यों में सहभागी

5 अप्रैल 1939 में रैवासा में जन्मे महावीर प्रसाद काबरा, एक सीधे सरल व्यक्तित्व के धनी हैं। बचपन से ही ये आत्म निर्भर, अच्छे तैराक और योग व ध्यान में कुशल रहे हैं। रैवासा और सीकर के विद्यालयों में पढ़ाई कर, उन्होंने कलकत्ता से बीकॉम की डिग्री प्राप्त की। उनका विवाह राजगढ़ के प्रतिष्ठित समाजसेवी श्री रामकुमार मोहता की तीसरी बेटी, ‘संतोष कुमारी मोहता’ से 1961 में हुआ।

महावीर प्रसाद काबरा

शादी के बाद ये दिल्ली शहर में ही रहने लगे। इनकी दो विवाहित बेटियां सीमा-संजय लखोटिया M.D. Sona Farms & Ivory Destinations तथा सारिका-आशीष बाहेती M.D. Vectus Industries Limited तथा सुपुत्र आशीष काबरा शेयर व्यवसायी है। सभी अपनी तमाम व्यावसायिक व्यस्तताओं के बावजूद तन-मन-धन से सेवा गतिविधियों में भी अपने पारिवारिक संस्कारों के अनुरूप योगदान दे रहे हैं।


सेवा गतिविधियों में भामाशाह

श्री काबरा असम के Tea Estate में Auditor की नौकरी से शुरुआत कर एक व्यवसायी बने। 82 वर्ष के ऊर्जावान, मिलनसार और दयावान स्वभाव वाले श्री काबरा, अपने परिवारजन, दोस्तों व पड़ोसियों की ख़ातिर हमेशा तत्पर व सहयोगी रहे हैं। ये जान-अनजान लोगों के प्रति भी सद्भावना रखते हैं और जब भी, जैसे भी जो सके, मदद करने की कोशिश करते हैं।

आज भी हर साल रेवासा धाम, सीकर जाते हैं और ‘कृष्णा देवी मोहनलाल काबरा राजकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय’, ‘जानकीनाथ जी के मंदिर’ और अपने पुश्तैनी घर के सामने स्थित, काबरा परिवार द्वारा बनवाये ‘नरसिंह भगवान के मंदिर’ में ज़रूरत अनुसार आर्थिक योगदान देते हैं। हर माह वहाँ की ‘गौशाला’ में दान देना उनकी कई वर्षों की प्रथा जैसा है।

अपने इस व्यक्तित्व के कारण से रैवासा में उन्हें ‘भामाशाह’ के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। हाल ही में एक प्रख्यात वक्ता ने श्री काबरा के लिए अपने वक्तव्य में कहा था कि ‘अच्छे इंसान तो कई होते हैं, मगर असली इ़ज्ज़त इन जैसे स्वार्थरहित दानवीर की होती है, जो शहर में रहकर भी अपनी जन्मभूमि से जुड़े रहते हैं और वहाँ के वासियों का ख्य़ाल रखते हैं।’


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