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‘रजत पटल’ के ‘शिल्पकार’ राजेश राठी

माहेश्वरी समाज के योगदानों से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। इनमें फिल्म निर्माण व निर्देशन का क्षेत्र भी शामिल है। इस क्षेत्र में गत 30 वर्षों से अपनी सेवा देते हुए फिल्म निर्देशक के रूप में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तक से सम्मानित हो चुके हैं, भगवान महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन में बचपन गुजारने वाले “श्री राठी” राजेश राठी। कला के क्षेत्र में आपको माहेश्वरी ऑफ द ईयर सम्मान अर्पित करते हुए हम गर्व की अनुभूति कर रहे हैं।

फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में न सिर्फ बॉलीवुड अपितु संपूर्ण विश्व के फिल्म जगत में वर्तमान में मुंबई निवासी राजेश राठी एक जाना-माना प्रतिष्ठित नाम बन चुका है। सतत् 35 वर्षों के संघर्ष के बाद उन्होंने जो मुकाम हासिल किया उस पर संपूर्ण समाज गर्व कर सकता है। वर्ष 2014 में जब श्री राठी की अंग्रेजी फिल्म ‘डिजायर्स ऑफ द हार्ट’ का प्रीमियर विश्व प्रसिद्ध कांस फिल्म समारोह में हुआ तो पहली बार बॉलीवुड ने उन्हें बतौर निर्देशक नोटिस किया।

इससे पहले यह फिल्म लॉस एंजिलिस के ला फेम इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2013 में ‘बेस्ट फोरेन फिल्म’ का अवॉर्ड पा चुकी थी। आज तमाम उतार-चढ़ाव के बाद भी श्री राठी अपनी कठोर इच्छाशक्ति और धैर्य से सफलतापूर्वक बॉलीवुड में निरंतर काम कर रहे हैं। इन दिनों श्री राठी एक हिंदी फिल्म लास्ट डील का निर्देशन कर रहे हैं।

यह एक रोचक क्राइम थ्रिलर है। इसके बाद वे एक कॉमेडी फिल्म की योजना बना रहे हैं। फीचर फिल्मों के अलावा जब भी संभव होता है तो राठी शॉर्ट फिल्में भी बनाते हैं और उन्हें अपने निजी यूट्यूब चैनल पर डालकर एक अनोखे अंदाज में अपनी बात समाज के सामने रखते हैं। इन दिनों उनका यूट्यूब चैनल भी काफी देखा व सराहा जाने लगा है।

व्यवसायी परिवार में लिया जन्म:

श्री राठी का जन्म कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय व्यवसायी मारवाड़ी (माहेश्वरी) परिवार में 5 अप्रैल 1958 को श्री गोपीकिशन व श्रीमती गवरादेवी राठी के यहां हुआ। पिता के व्यवसाय से सेवा निवृत्त होने पर उनसे 30 साल बड़े भाई सूरज रतन राठी घर की बागडोर संभालने लगे थे। राजेश सबसे छोटे थे-अपने भतीजी-भतीजों से भी। वे बचपन से ही एकाकी थे और संगीत में रुचि रखते थे।

4-5 साल की उम्र में जब उनकी अंगुलियां अलमारी और टेबल पर थिरकने लगीं तो बाबूजी उनके लिए ढोलक और तबला तथा फिर हारमोनियम और बैंगो ले आए। रोज संध्या वेला में जब मां-मौसी और भाभी हरे कृष्णा का कीर्तन गातीं तो वे उन्हें संगत देने लगे। स्कूल में भी शिक्षकों के प्रोत्साहन से मंच पर गाना गाने लगे। एक बार जब बड़े भाई ऑफिस के काम से अमेरिका जा रहे थे तो उन्होंने कैमरा लाने की फरमाईश कर दी।

इस तरह संगीत के साथ-साथ फोटोग्राफी का शौक भी लग गया। मानो ध्वनि के साथ दृश्य जुड़ने लगे हों। 1971 में कोलकाता से सातवीं पास करने के बाद उनका पूरा परिवार उज्जैन आ गया, जहां बड़े भाई ने एक नई फैक्ट्री का कार्यभार संभाला था।

श्री राठी ने
“श्री राठी”

उज्जैन में ली उच्च शिक्षा:

वहां 11वीं तक पहुंचते-पहुंचते श्री राठी को अपने करियर की, अपने भविष्य की चिंता सताने लगी। उन दिनों दो ही ऑप्शन होते थे। डॉक्टरी या इंजीनियरिंग। पर उनका मन इन दोनों में ही नहीं था। खूब मंथन करने के बाद उन्होंने तय किया कि वो कला को ही अपना पेशा बनाएंगे। हालांकि स्कूल-कॉलेज में फिल्मी गाने गा-गाकर उन्होंने कई प्रतियोगिताएं जीती थीं, खुद एक ऑर्केस्ट्रा ग्रुप भी बनाया था, पर चूंकि संगीत की कोई विधिवत ट्रेनिंग नहीं हुई थी तो सोचा फोटोग्राफी को ही अपना करियर बनाया जाए।

इसके लिए पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से बेहतर कोई मार्ग नहीं था और वहां जाने के लिए हायर सेकेंडरी पास होना ही काफी था। फिर भी चिंता थी, अगर फिल्म इंस्टिट्यूट के बावजूद भी फिल्मों में करियर न बन पाया तो क्या होगा? अतः श्री राठी ने तय किया कि कम से कम ग्रेजुएशन कर लिया जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर किसी नौकरी-धंधे लायक बने रहें। बस यही सोच कर बीएससी में दाखिल ले लिया।

उन तीन सालों में भी उन्होंने कोर्स के अतिरिक्त फिल्म निर्माण से संबंधित बहुत-सी किताबें ढूंढ-ढूूंढकर पढ़ डालीं। प्रैक्टिकल्स के लिए उनके पास एक स्टिल कैमरा और 8 एमएम मूवी कैमरा था ही, जिससे वे घर के शादी-ब्याह व अन्य विशेष अवसर शूट कर लेते थे। हर बार जितनी फिल्म रील मिलती, उनमें से चुपचाप थोड़ी बचा लेते थे, ताकि अपने प्रयोग कर हाथ साफ कर सके।

प्रथम प्रयास में मिली असफलता:

बीएससी होते ही उन्होंने गुपचुप पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट की लिखित परीक्षा दे दी। उसे पास करने के बाद तकनीकी परीक्षा व इंटरव्यूह के लिए पुणे से बुलावा आ गया। तो उन्होंने बहाना ये बनाया कि अपने एक दोस्त के लिए वे लड़की देखने पुणे जा रहे हैं। पर दुर्भाग्य से वहां फाइनल रिजल्ट में उनका 15वां यानी वेटिंग लिस्ट में तीसरा नंबर आया तो बड़े मायूस होकर उज्जैन लौट आए।

इधर घर पर भी पता चल गया था कि पुणे क्यों गए थे? फिर हंगामा तो होना ही था। बड़े भाई चाहते थे वे अमेरिका जाकर एमबीए करें। उनका एक बेटा किशोर वहां पहले से ही जा चुका था। पर राजेशजी ने साफ मना कर दिया और फिल्मों में अपना करियर बनाने पर अडिग रहे।

इस पर घर में शीत युद्ध जैसी स्थितियां बन गई। खुद उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि अब बगैर इंस्ट्यिूट की डिग्री लिए वे फिल्मों में कैसे प्रवेश पाएं? न कोई जान, न पहचान। मुंबई जाकर सिर्फ चप्पलें घिसने का कोई मतलब नहीं था। अनिर्णय की इस स्थिति से उबरने के लिए व सोच-विचार का समय पाने के लिए उन्होंने एमए (अर्थशास्त्र) में दाखिला ले लिया।

निराशा के दौर में बनाई ‘भगोरिया’:

तब उज्जैन जैसे शहर के युवा के लिए बंबई और उस पर भी फिल्मी दुनिया बहुत दूर हुआ करती थी। चंद दोस्तों के सिवाय हर कोई उन्हें फिल्म लाइन में जाने के लिए हतोत्साहित करता था। कई बार अंधेरे कुएं में छलांग लगाने से डर भी लगता था। एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी का आलम था। तो एक दिन यह तय किया कि बंबई जाने से पहले वे खुद एक फिल्म बनाएंगे।

अब तक जितना पढ़ा-समझा था, सब झोंक देंगे ताकि वो फिल्म ही उनका जीता-जागता सर्टिफिकेट बन जाएगी, भले ही वह 8 एमएम पर बनी हो। पर विराट प्रश्न ये था कि क्या फिल्म बनाएं, कैसी फिल्म बनाएं? सुना था झाबुआ के भील आदिवासियों का त्योहार भगोरिया बड़ा रंगीन और आकर्षक होता है।

तो क्यों न उस पर ही एक ड्राक्यूमेंट्री फिल्माई जाए? वहां आने-जाने और फिल्म की रील खरीदने के लिए वे पैसे की जुगाड़ करने लगे। उस चक्कर में उन्होंने अखबार के कई विज्ञापन डिजाइन किए, अपने कैमरे से चुनिंदा शादियां कवर की, उज्जैन के बोहरा मोहल्लों (बाखलों) में अपना 8 एमएम प्रोजेक्टर चलाकर सैयदना साहब की फिल्में दिखाकर भी पैसे जमा किए। पूरा अभियान यार-दोस्तों के सहयोग से, बगैर घरवालों की जानकारी के चलता था।

फिर एक दिन अपने दो दोस्तों की टीम बनाकर श्री राठी शूटिंग के लिए झाबुआ निकल पड़े। पूरे एक हफ्ते झाबुआ के अलग-अलग गांवों में जाकर उन्होंने भगोरिया मेला कैमरे में उतारा। इस दौरान भीलों के जनजीवन से वे इतने प्रभावित हुए कि सोचा सिर्फ भगोरिया ही क्यों, उन्हें भीली जीवन के अन्य पहुलओं को भी छूना चाहिए। और इस तरह उनका शूटिंग अभियान तीन चरणों में चला। श्री राठी ने फिल्म की पटकथा, निर्माण, निर्देशन व फोटोग्राफी के अतिरिक्त इसका बैकग्राउंड स्कोर भी स्वयं तैयार किया।

श्री राठी ने
“श्री राठी”

भगोरिया ने दी जीवन को दिशा:

उन दिनों 8 एमएम फिल्मों की देश में सिर्फ एक ही लैबोरेट्री हुआ करती थी-मुंबई की फिल्मसिटी में। वहां जाकर श्री राठी ने स्वयं फिल्म की एडिटिंग की। उस 8 एमएम की फिल्म को एडिट करना भी किसी चैलेंज से कम नहीं था। इतनी बारीक फिल्म को काटकर जोड़ने के लिए ब्लेड से घिसना, फिर फिल्म सीमेंट से जोड़ना।

मजे की बात यह थी कि बजट न होने की वजह से फिल्म के सारे तकनीकी विभाग राठी को स्वयं संभालने पड़े और इस 30 मिनट की फिल्म ‘‘ग्लिम्पसेस ऑफ भील्स’’ को पूरा करने में उन्हें 2 साल लग गए। उन्हीं दिनों 1983 में कलकत्ता में सुपर 8 फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हो रहा था। श्री राठी ने उसमें अपनी फिल्म भी भेज दी। उसमें शामिल लगभग 30-40 प्रविष्ठियों में से श्री राठी की फिल्म को चौथा ऑडियंस च्वाइस अवॉर्ड मिला और वहां के मशहूर दैनिक द टेलीग्राफ में फिल्म की बहुत अच्छी समीक्षा लिखी गई। इससे पहली बार उनमें यह विश्वास जगा कि वे सही दिशा में जा रहे हैं। अब उन्हें अंधेरे कुएं में छलांग लगाने की हिम्मत आ गई थी।

ऐसे रखा फिल्मी दुनिया में कदम:

बालीवुड में जगमोहन मूंधड़ा आज भी एक मशहूर नाम हैं। वे एक एनआरआई थे और लॉस एंजिलिस में रहते थे। संजीवकुमार और शबाना आजमी के साथ ‘‘सुराग’’ बनाने के बाद वे उन दिनों ‘‘कमला’’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। वहां पढ़ रहे श्री राठी के भतीजे किशोर ने एक बार उनसे भीलों पर बनी फिल्म का जिक्र किया था। इत्तेफाक से जगमोहनजी मुंबई आए हुए थे और वो उस फिल्म को देखना चाहते थे।

तो एक रात अपना 8 एमएम का प्रोजेक्टर व फिल्म उठाकर श्री राठी पहुंच गए उनके घर। वहां कमरे की दीवार पर चलाकर श्री राठी ने उनको फिल्म दिखाई जो उन्हें अच्छी लगी। जगमोहन जी ने उसे दो बार देखा। फिर कुछ महीनों बाद जब कमला की शुरुआत हुई तो उन्होंने श्री राठी को उज्जैन फोन करके कहा कि अगर चाहो तो मेरे साथ बतौर एपरेंटिस काम कर सकते हो।

और बस यहीं से शुरू हुआ श्री राठी का फिल्मी सफर। उन्होंने बतौर मुख्य सहनिर्देशक जगमोहनजी के साथ 9 हिंदी व अंग्रेजी फीचर फिल्में की जिनमें ‘कमला’, ‘मॉनसून’, ‘बवंडर’ , ‘अपार्टमेंट’ ‘नॉटी 40’ आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त महेश भट्ट लिखित ‘हक’ व देव बेनेगल की ‘स्प्लिट वाइड ओपन’ फिल्में भी की। श्री राठी दूरदर्शन के निर्माता-निर्देशक भी हैं जिसके लिए उन्होंने कई टेलीफिल्में व सीरियल बनाए हैं। राठी की फीचर फिल्म ‘डिजायर्स ऑफ द हार्ट’ के बाद जल्द ही ‘लास्ट डील’ रिलीज होने वाली है।

सेवाओं ने दिलाया सम्मान:

श्री राठी इंडियन फिल्म व टीवी डायरेक्टर्स एसोसिएशन मुंबई, स्क्रीन राईटर्स एसोसिएशन तथा इंडियन फिल्म व टीवी प्रोड्यूर्स कौंसिल मुंबई से संबद्ध हैं। फीचर फिल्मों के अतिरिक्त उनकी शॉर्ट फिल्में ‘ब्लाइंड गेम’, ‘मौका (द चांस)’, ‘रेड कार्पेट’, ‘एक्ट्रा करिक्यूलर एक्टिविटीज एट द ऑफिस’, ‘गिरफ्त’ आदि विभिन्न अवॉर्डों से सम्मानित हो चुकी है। श्री राठी को उनकी सेवाओं के लिए ‘उज्जयिनी शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल 2011’ में भारतीय चित्र साधना, साक्षात फाउंडेशन द्वारा ‘भूषण सम्मान’, टाईम्स इंडिया न्यूज द्वारा इंडियन आइकॉन अवॉर्ड, उज्जैन में संवाद टेलीफिल्म अवॉर्ड, भोपाल में डॉ. राजेंद्रकुमार विज्युअल आर्ट अवॉर्ड, उज्जैन में भैराजी सम्मान आदि से सम्मानित भी किया जा चुका है।


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