आजादी के महानायक थे सेठ गोविंददास

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जब देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की चर्चा होती है, तो उसके महानायकों में जबलपुर के स्व. श्री सेठ गोविंददासजी मालपानी का उल्लेख भी अवश्य होता है। कारण सेठजी ने तो देश के लिए अपना सर्वस्व ही न्योछावर कर दिया था। इतना ही नहीं जब देश की आजादी के बाद भी राष्ट्रभाषा की अस्मिता का प्रश्न खड़ा हुआ तो आप अपनी पार्टी के खिलाफ भी विरोध के स्वर ऊंचे करने में पीछे नहीं रहे।

अकूत संपत्ति को भी त्यागा:

इनके इस कार्य से अंग्रेज नाराज हो गए और उन्होंने स्पष्टीकरण मांगा। श्री गोविंददास ने उत्तर में निर्भिकता से लिखा कि जिस प्रकार हम अपने यहां राजा-महाराजाओं का सत्कार करते रहे हैं, उसी प्रकार देश के महान नेता लोकमान्य तिलक का स्वागत करके भी हमने अपने कर्त्तव्य का पालन किया है। जैसे-जैसे आप स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय होते गए, वैसे-वैसे ही आपके पिता दीवान बहादुर सेठ जीवनदासजी पर अंग्रेजों का दबाव बढ़ता ही चला गया।

स्वाधीनता आंदोलन में इनकी सक्रियता देख अंग्रेजों की दमन-नीति से घबराकर आपके पिता दीवान बहादुर ने आपके समक्ष परिवार की संपत्ति के बंटवारे का प्रस्ताव रखा, ताकि सरकार परिवार की सारी संपत्ति जब्त न कर सके। इस पर आपने अपने पिता को पत्र लिखा-‘‘पिता-पुत्र के बीच संपत्ति का बंटवारा कैसा ? वे सारी पारिवारिक संपत्ति का ही त्याग करते हैं।’’ इसके बाद आप सुख-सुविधाओं और ऐशो आराम से युक्त अपने महल को छोड़ अपने परिवार के मंदिर के बगीचे में रहने लगे।

असहयोग आंदोलन का किया नेतृत्व:

सन् १९२० में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु होने पर स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व पूर्ण रूप से महात्मा गांधी के हाथों में आ गया। आजादी की आग सीने में लिए सेठ गोविंददास राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। असहयोग आंदोलन में जबलपुर की बागडोर इन्होंने ही संभाली। आपके आहवान पर देखते ही देखते एक बहुत बड़ी राशि स्वराज फण्ड में एकत्र हो गई। कांग्रेस कमेटी ने सत्याग्रह आंदोलन का निर्णय लिया। इसमें जनभावना को जानने के लिए छह सदस्यीय इन्क्वायरी कमेटी गठित हो गई।

इस कमेटी के जबलपुर भ्रमण व वहां की जानकारी एकत्र करने की जिम्मेदारी भी इन्होंने ही वहन की। क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों को भी इन्होंने वहन किया। गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन के महाकौशल में संचालन की बागडोर सेठजी ने ही संभाली। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सन १९२३, ३०, ३२ और ४२ में लंबी सजा भुगती। कई बार आपके ऊपर जुर्माना हुआ और उसे न देने पर आपकी कार जब्त कर ली गई।

सेठजी के लोकप्रिय व्यक्तित्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आप लगातार २० वर्ष तक महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे।

धर्मपत्नी भी राष्ट्रसेवा की साथी:

आपके जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के कारण महात्मा गांधी का विशेष प्रभाव रहा। जब सेठ गोविंददास मात्र १२ वर्ष के थे, तभी इनका विवाह सीकर राजस्थान की ८ वर्षीय गोदावरीबाई से सन १९०८ में हो गया। गोदावरीबाई शिक्षित नहीं थी, लेकिन गोविंददासजी की प्रेरणा से वे भी शिक्षा की ओर अग्रसर हुई और उन्होंने भी मूलभूत शिक्षा ग्रहण की।

गोदावरीबाई भी स्वतंत्रता आंदोलन सहित अन्य समाज सुधारों में सेठजी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलीं। पर्दा प्रथा का विरोध करने वालों में भी वे आगे रहीं। इसके लिए समाज व रिश्तेदारों के विरोध का सामना करना पड़ा। जिस समय सेठजी जेल में होते थे, तब गोदावरीबाई स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर संभालती थीं।

स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए ही वे महात्मा गांधी की मुंह बोली बेटी कही जाती थीं।

गौरक्षा व हिंदी सम्मान भी सर्वोपरि:

आपके जीवन के तीन लक्ष्य रहे थे प्रथम स्वराज्य प्राप्ति, दूसरा गौरक्षा और तीसरा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर सम्मान दिलवाना। इन तीनों स्वप्नों को साकार करने में आपने अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया। प्रथम स्वप्न पूर्ण हुआ स्वराज्य मिला। १५ अगस्त १९४७ को देश आजाद हो गया।

दूसरा स्वप्न गौरक्षा था, देश आजाद हो गया और सेठजी भी १८ जून १९७४ को इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन यह स्वप्न अभी भी अधूरा है। गोहत्या आजादी से पूर्व भी हो रही थी, वर्तमान में भी हो रही है। तीसरा स्वप्न हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलवाने का था।

यह स्वप्न वैसे तो पूर्ण हुआ। वर्तमान में हिंदी राष्ट्र भाषा है, लेकिन हकीकत में उसे सम्माननीय दर्जा मिल सका या नहीं यह विचारणीय मुद्दा है।

हिंदी साहित्य की अनुपम सेवा:

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लंबी-लंबी जेल यात्रा हिंदी साहित्य के लिए वरदान बन गई। बाल्यकाल से ही सेठ गोविंददास हिंदी साहित्य में रुचि रखते थे। वे बचपन से ही कविता लिखते रहे हैं। जेल अपना साथी बना लिया और साहित्य सृजन में जुट गए। जेल में ही आपने अनेक नाटक और उपन्यास लिखे। सेठजी की ये कृतियां हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं, जिन्हें विभिन्न विवि द्वारा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता रहा है।

जब हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों की चर्चा की जाती है तो मुंशी प्रेमचंद व जयशंकरप्रसाद के साथ सेठ गोविंददास का नाम भी अत्यधिक सम्मान के साथ लिया जाता है। इसके साथ ही ऐतिहासिक सामाजिक एवं बायोग्राफिकल नाटक, कविता, यात्रा कथा और जीवन वृत्त आदि भी लिखे गए हैं। कहते हैं कि साहित्य साहित्यकार के जीवन का आइना होता है।

सेठजी चाहे राजकीय परिवार से संबद्ध रहे, लेकिन साहित्य देखकर लगता है कि वे अत्यंत सरल स्वभाव के प्रति व्यक्ति थे।

देश के शिखर सम्मानों से अलंकृत:

हिंदी साहित्य में उनके योगदान ने उन्हें सदैव ही सम्मान दिया। चाहे उन्होंने औपचारिक रूप में किसी विवि से उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की लेकिन उनका भाषा ज्ञान, विचारों की अभिव्यक्ति अनोखी थी। इसी का परिणाम है कि हिंदी का गढ़ समझे जाने वाले उत्तरप्रदेश तथा राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा उनके साहित्य को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया गया।

भाषा के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान को लेकर देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्रप्रसाद द्वारा उन्हें पद्मभूषण अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसी तरह रानी दुर्गावती विवि जबलपुर जो अब जबलपुर विवि के नाम से जाना जाता है के द्वारा पीएचडी की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया।


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