पितरों से आशीर्वाद प्राप्ति का पर्व श्राद्ध

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कहा जाता है कि आशीर्वाद में वह शक्ति है जो असंभव को भी संभव कर सकती है और फिर वे आशीर्वाद हमारे पितृों के हों तो ईश्वर भी उन्हें सत्य करने में सहयोगी बनता है। १६ दिवसीय श्राद्ध पक्ष वास्तव में ऐसा ही विशिष्ट पर्व है जिसमें हम उनसे अपनी व अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक की १६ दिवसीय अवधि महालया श्राद्ध पक्ष है अर्थात् इस लोक में एक तरह से पितृों का सामूहिक मेला होता है। सभी पितर पृृथ्वीलोक पर रहने वाले अपने सगे सम्बन्धियों के यहाँ बिना आह्वान के भी पहुंचते है और उनके द्वारा प्रदान किये गये ‘‘कव्य’’ से तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। इससे श्राद्धकर्ता सभी प्रकार के सुखों का भोग करते हुए आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत करता है। जब श्राद्ध न किये जाने पर ये अतृप्त होकर लौटते हैं, तो ऐसे अतृप्त पितृों के कोप से परिवार अनेक दुःखों को प्राप्त करता है।

किनका करें श्राद्ध:

श्राद्ध माता पिता के साथ ही, भाई, बहन, चाचा, चाची, नाना, नानी, दादा, दादी आदि तीन पीढ़ियों के पूर्वज के साथ ही गुरू, ससुर, सास, बहनोई, भतीजा, शिष्य, जमाता, भांजा, फूफा, मौसा, पुत्र, मित्र आदि का भी किया जा सकता है। संयुक्त परिवार में माता-पिता आदि पूर्वजों का श्राद्ध सबसे बड़े भाई अथवा उनकी अनुपस्थिति में सबसे छोटे भाई को करना चाहिये। सामान्यतः मृतक की अंतिम संस्कार की तिथि को ही संबंधित का श्राद्ध किया जाता है।

कैसे करें श्राद्ध कर्म:

यदि हम किसी भी तीर्थ स्थान, किसी भी पवित्र नदी, किसी भी पवित्र संगम पर नहीं जा रहे हैं तो सरल एवं संक्षिप्त कर्म घर पर अवश्य करें। खीर (अर्थात दूध में पकाए हुए चावल में शकर एवं सुगंधित द्रव्य जैसे इलायची, केशर मिलाकर तैयार की गई सामग्री को खीर कहते हैं) बनाकर तैयार कर लें। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्जवलित कर लें। उक्त प्रज्जवलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दे दें।

इसके नजदीक (पास में ही) जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें। इस द्रव्य को अगले दिन किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें। भोजन में से सर्वप्रथम गाय, कुत्ते, और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें। इसके तत्पश्चात् ब्राह्मण को भोजन कराएँ फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात् ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।

इनका रखें विशेष ध्यान:

किसी भी दिवंगत परिजन का प्रथम श्राद्ध मृत्यु वर्ष से तृतीय वर्ष में श्राद्धारम्भ दिवस अर्थात् पूर्णिमा को ही पूरे धार्मिक नियमों के साथ किया जाता है।
1. जिन व्यक्तियों की सामान्य एवं स्वाभाविक मृत्यु चतुर्दशी को हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को कदापि नहीं करना चाहिए, बल्कि पितृपक्ष की त्रियोदशी अथवा अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करना चाहिए।
2. जिन व्यक्तियों की अपमृत्यु हुई हो अर्थात् किसी प्रकार की दुर्घटना, सर्पदंश, विष, शस्त्राघात, हत्या, आत्महत्या या अन्य किसी प्रकार की अस्वाभाविक मृत्यु हुई हो, तो उनका श्राद्ध मृत्युतिथि वाले दिन कदापि नहीं करना चाहिए। अपमृत्यु वाले व्यक्तियों का श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो।
3. सौभाग्यवती स्त्रियों की अर्थात् पति के जीवित रहते हुए भी मरने वाली सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध भी केवल पितृपक्ष की नवमी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो।
4. संन्यासियों का श्राद्ध केवल पितृपक्ष की द्वादशी को ही किया जाता है, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो।
5. नाना तथा नानी का श्राद्ध भी केवल आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो।
6. पूर्णिमा के दिन स्वाभाविक रूप से मरने वालों का श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को करना चाहिए।


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