अत्यंत विस्मयजनक है- वास्तुशास्त्र

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वास्तुशास्त्र वास्तव में क्या है? यह बहुत ही गहन प्रश्न है, परंतु सरल भाषा में कह सकते हैं कि किसी भी वस्तु में उसके स्वरूप का स्थापन प्रकृति के नियमों के अधीन रहकर करना, उसे हम वास्तु कह सकते हैं। लेकिन वास्तु वास्तव में यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आवास – व्यवसाय ही नहीं सम्पूर्ण स्थापत्य अर्थात् निर्माण को प्रभावित करता है।


वास्तु शब्द वैशाख महिने में बार बार सुनने में आता है। खास करके अक्षय तृतीया पर अनेक मकानों की वास्तु शान्ति तथा नये मकान का भूमि पूजन होता है। ‘राजवल्लभ’ वास्तुशास्त्र का एक अनुपम, विस्तृत एवं दुर्लभ ग्रंथ है, यह पुस्तक 100 वर्ष पहले ईस्वी सन 1891 में प्रकाशित हुई थी, इसकी प्रस्तावना की जानकारी के अनुसार 550 वर्ष पहले संवत 1480 में उदयपुर के महाराणा कुंभकर्ण के समय में श्री मंडन सुक्रधर ने एक ग्रंथ रचा था उसके आधार पर ‘राजवल्लभ’ सौ वर्ष पहले लिखा गया था।

राजवल्लभ पुस्तक में शार्दुलबिक्रिडित छंद में एक श्लोक लिखा हुआ है उसके हिसाब से गृह आरम्भ एवं गृह प्रवेश करने से शोक उत्पन्न होता है, वैशाख में धन की प्राप्ति होती है, ज्येष्ठ में मृत्यु, आषाढ़ में पशुनाश, श्रावण में पशु की वृद्धि, भादवा में घर शून्य, अश्विन में क्लेश, कार्तिक में सेवकों का नाश, मार्गशीर्ष एवं पोष में धन-धान्य की प्राप्ति, माघ में अग्नि का भय एवं फाल्गुन मास में गृह आरम्भ या प्रवेश करें तो लक्ष्मी की वृद्धि होती है।


अधिकांश पुराणों में भी उल्लेख

वास्तु के मायने क्या हैं? वास्तुशास्त्र क्या है? वैसे तो यह बहुत ही गहन प्रश्न है, परंतु सरल भाषा में कह सकते हैं कि किसी भी वस्तु में उसके स्वरूप का स्थापन प्रकृति के नियमों के अधीन रहकर करना, उसे हम वास्तु कह सकते हैं।

उदाहरणार्थ – कोई मंदिर बनाकर भगवान की मूर्ति रखने को केवल स्थापत्य कह सकते हैं, मतलब इमारत से विशेष कुछ नहीं परंतु मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद उसमें भगवान आकर बस गये ऐसा समझा जाता है और लोग पूजा करने लगते हैं। ये जो प्राण प्रतिष्ठा है इसको ही वास्तु पूजन कह सकते हैं। वास्तु पूजा कोई निरर्थक व्यायाम नहीं है।

हिंदू पुराणों तथा वेदों में अथर्वेद, यजुर्वेद, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, वायु पुराण, पदम पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, गर्ग संहिता, नारद संहिता, शार्रडगधर संहिता, वृहत संहिता आदि अनेक ग्रंथों में वास्तुशास्त्र का महासागर पड़ा हुआ है।

वेदों, पुराणों, संहिताओं में छूटे, भूले वास्तु के साहित्य को संकलित करके ‘राजवल्लभ’ मय शिल्पम, शिल्प रत्नाकर, समरांगण सुत्रधार आदि अनेकों महाग्रंथ रचे गये थे जो अब मुश्किल से मिलते हैं एवं दुर्लभ हैं।


वास्तु विरूद्ध निर्माण कष्टप्रद

वास्तुशास्त्र का मतलब कुदरत के नियमों सिद्धांतों के अधीन रहकर निर्माण, घर, मंदिर, शहर, किला, बगीचा, खेत, फैक्ट्री, ऑफिस सहित कोई भी बाँधकाम/निर्माण करना आता है। इसमें नियम एवं सिद्धांत भंग करते हैं तो मनुष्य द्वारा किये गये निर्माण से कष्ट, हानि, मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक हानि, नुकसान उठाना ही पड़ेगी, इसमें संदेह नहीं।

इन बातों को विज्ञान का लेप चढ़ाकर समझाना है तो इस प्रकार है कि पृथ्वी के चुम्बकीय प्रवाहों, दिशाओं, सूर्य की किरणों, वायु प्रवाह एवं गुरूत्वाकर्षण के नियमों का समन्वय पूर्णरूपेण वास्तुशास्त्र में है। हिंदू धर्म ग्रंथों में इस समय पर विस्तृत लिखा गया है।

इसलिये इस विषय का कोई भी जानकार मनुष्य स्थापत्य के निर्माण में कमी हो तो तुरंत पहचान लेगा। यह आग, चोरी, लूटपाट, कोर्ट कचहरी के झंझट, बीमारी, मृत्यु, आर्थिक एवं मानसिक परेशानी एवं हानि इत्यादि प्रकार के खराब प्रभावों की चेतावनी दे सकता है।

जहाँ प्रकृति के नियमों के अनुरूप पालन किया हो तो उसमें रहने वाले, सुख समृद्धि एवं यश, धन, धान्य प्राप्ति करते हैं, ऐसा कहा गया है। हम लोग कई बार देखते हैं कि एक छोटे से रूम में रहने वाला मनुष्य बहुत धनवान बनकर बंगले में रहने जाता है, परंतु पहले वाले रूम को बहुत शकुनी मानकर बेचता नहीं है, इसमें कितना योगानुयोग, वहम और तथ्य है, हम नहीं जानते परंतु इन घटनाओं के पीछे कोई अदृश्य बल काम करता है ऐसा मानने का मन जरूर होता है।


हर जगह वास्तु का प्रभाव

‘वास्तुशास्त्र’ केवल भवन निर्माण/बांधकाम के साथ ही निर्मित भवन के उपयोगों को भी विस्तृत रूप से बताता हैं। जैसे घर में रसोईघर, पूजाघर, शयनकक्ष, पानी की जगह, टायलेट, बाथरूम आदि, फैक्ट्रियों में मशीन के प्लेसमेंटस, रॉ मटेरियल रूम, स्टॉक रूम, स्टोर रूम, बैठक, जनरेटर रूम,अण्डग्राउण्ड वाटर टैंक, बोरवेल इत्यादि, आफिसों में मेन केबीन, अकाउन्टस रूम, तिजोरी, स्टॉक रूम, सेल्सरूम इत्यादि सभी निर्माणों के अंदर किस निर्माण में कैसे, किस जगह क्या काम, किस तरह करना चाहिये इसके लिए वास्तुशास्त्र विस्तृत दिशा निर्देश देता है।

ऐतिहासिक एवं प्राचीन इमारतों को वास्तुशास्त्र की दृष्टि से निहारों तो आपको उनके बांधने की खूबियों, खामियों तथा उनके मालिकों के उतार चढ़ाव की हकीकतों का अदभुत सम्मिश्रण मिलेगा।

दंग रह जाने लायक प्रयोगों के रूप में हमारे मित्रों और पड़ोसियों के घर, दुकान, फैक्ट्रियों आफिसों में फेरफार करके दिशा निर्देश दिये तो धंधा ही नहीं बाकी दूसरी मानसिक, आर्थिक, शारीरिक परेशानियां भी दूर हो गई।


शुद्ध वैज्ञानिक है वास्तुशास्त्र

वास्तु के तत्वों को अब वर्तमान वैज्ञानिक मूल्यों के साथ विनियोजन करते हैं। एक उदाहरण देकर समझाता हूँ- शास्त्रों के प्रमाण के अनुसार अग्नि को प्रज्जवलित करने के लिए अग्निकोण श्रेष्ठ है, पानी के लिए ईशान कोण श्रेष्ठ है। इसी आधार पर आपके घर, होटल का रसोईघर, फैक्ट्री का बायलर, जनरेटर, ट्रांसफार्मर रूम अग्निकोण में ही होना चाहिये।

पानी की जगह अग्नि तथा अग्नि की जगह पानी का उपयोग करते हैं तो बहुत ही अनर्थ होता है और शांति तथा समृद्धि में बाधा, रूकावटें निरंतर बनी रहती है। इसी हिसाब से अग्नि रखने की जगह कुआं या पानी की टंकी हो तो धन हानि, स्त्री हानि, पुत्र हानि,बैर दुश्मन बढ़ने तक की शंका रहती है।

पर यह घबराने की बात नहीं है, आपके स्थानापन्न को देखकर, फेर बदलकर इन गलतियों को दूर किया जा सकता है। वास्तुशास्त्र में दरवाजों का भी बहुत महत्व है। राजवल्लभ में ५वें अध्याय के मालिनी छंद में एक श्लोक है।

उसका अर्थ इस प्रकार है- यदि दरवाजे अपने आप खुलते एवं बंद होते हैं तो भय पैदा करते हैं। द्वार की एक शाखा मोटी या दूसरी पतली हो तो भय पैदा करती है, शाखा के बिना द्वार हो तो स्त्री अथवा पुरूष का नाश होता है।


भूमि परीक्षण से शुरूआत

समय के बदले हुये दृष्टिकोण में जाति का महत्व आजकल केवल चुनाव में ही रह गया है, परंतु वास्तुशास्त्र वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही जमीन पसंद करने को कहता है। उत्तर की तरफ पानी का बहाव जाता हो तो, ढाल वाली जमीन ब्राह्मण के लिये श्रेष्ठ है, पूर्व की तरफ पानी की गति वाली जमीन क्षत्रियों के लिए श्रेष्ठ है।

दक्षिण की तरफ गति वाली जमीन वैश्यों के लिए श्रेष्ठ है तथा पश्चिम की तरफ बहाव, ढाल वाली जमीन शुद्रों के लिए उत्तम है। जिस जमीन पर घर बनाना हो उस जमीन पर पानी का बहाव पूर्व, ईशान और उत्तर दिशा की तरह हो तो सुख मिलता है।

अग्निकोण की तरफ हो तो अग्नि का भय उत्पन्न करता है, दक्षिण की तरफ हो तो मृत्यु का नेर्ऋत्य की ओर हो तो चोरी का, वायव्य कोण की तरफ हो तो धन्य का नाश तथा पश्चिम दिशा की ओर हो तो शोक व भय उत्पन्न करती है।

इस शास्त्र में जमीन परिक्षण, वृक्ष लगाने, घर-मंदिर, तिजोरी रखने से लेकर शहर, उपशहर के आयोजन का स्पष्ट वर्णन दिया गया है। संस्कृत के छंदों वाले इस शास्त्र में छंद, अंकगणित, भूमि विज्ञान, ज्योतिष, नक्षत्र, सूर्य किरणों, चुम्बकीय, प्रवाहों आदि का इतना सुंदर समन्वय किया गया है कि दिमाग चकरा जाये। इस शास्त्र के निर्माण करने वाले अपने पूर्वजों का अनायास ही आदरपूर्वक स्मरण हो जाता है।


आज के आर्किटेक्ट के लिये भी मार्गदर्शक

राजवल्लभ के अनुसार ‘शिल्पी स्थपति’ (आर्किटेक्ट)’ को स्थापत्य विद्या उपरांत, सामुद्रिक, ज्योतिष, वास्तुप्रत्यमान, लम्बाई, चौड़ाई, पत्थर का जड़ाव, चुनाई, गणित, छंद शास्त्र, यंत्र कर्म और पाषाण सिद्धी जैसी विद्या का ज्ञान होना चाहिये। आजकल के आर्किटेक्टों से इस विद्या की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं, पर परिस्थिति इतनी हताशा जनक नहीं है।

आज के विद्यार्थियों को गांव में भेजकर पुराने महलों, हवेली, झोपड़ों व घर की रचनाओं तथा उसमें रहने वालों के रहन-सहन का अभ्यास करने को कहना चाहिये। वास्तु शास्त्र में मध्य भाग ब्रह्म अथवा शक्ति केंद्र खुला रख कर तथा उस पर कोई चुनाई नहीं करने को कहता है तो आज के आर्किटेक्ट पश्चिम का अंधानुकरण कर स्काय स्केपर बनाते जा रहे हैं।

वास्तु अनुसार सामान्य आदमी को मकान खरीदते, बनवाते समय मकान का मुंह आज बाजू के रास्ते, घर का दरवाजा, बांधनी देखनी चाहिये तथा मन में खटका पैदा करे इस प्रकार का कुछ महसूस नहीं होना चाहिये। घर के अंदर दरवाजे, रसोई, पानी रखने की जगह, सोने की जगह, पूजाघर इत्यादि योग्य होना चाहिये।

सामान्य तरीके से उत्तर और पूर्व की तरफ जिस प्लॉट के रास्ते जाते हो वो श्रेष्ठ है, दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व के रास्ते हो तो उस जगह से दूर रहना ही श्रेयस्कर है तथा पश्चिम, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण और पश्चिम के कोने में जाने वाले रास्ते के प्लॉट या मकान साधारण फल प्रदान करते हैं। जिस प्लॉट या मकान के चारों और रास्ते हों वो सर्वश्रेष्ठ है, उसका कोई सानी नहीं हो सकता।


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