मत रोको बहते हुए आँसू

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आपको लग रहा होगा कि दीपावली जैसे पावन पर्व की बेला में भला आंसूओं का क्या काम? हम महालक्ष्मी का पूजन सुखी जीवन के लिये करते हैं, मात्र धन के लिये ही नहीं। ऐसे में यदि हम जीवन के स्वास्थ्य के आधार बिंदू आंसुओ का चिंतन न करें तो पर्व का लक्ष्य ही अधूरा रह जाऐगा। आईये देखे क्यो इतने महत्वपूर्ण हैं, आँसू ?

भावनात्मक आँसू व्यक्ति को उदासी, अवसाद व गुस्से से मुक्त होने के योग्य बनाते हैं। यही आँसू नकारात्मकता ग्रस्त व्यक्ति को हद से बाहर जाने से भी रोकते हैं। रोने से मन का सारा मैल धुल जाता है। विश्व की प्राचीनतम और पूर्ण वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ने आँसू रोकने से होने वाले रोगों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि आँसुओं को रोकने से जुकाम, आँखों व सिर में दर्द, हृदय पीड़ा, अरूचि, चक्कर आना आदि रोग हो जाते हैं। एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में औसतन 60 लीटर आँसू बहाता है। आँसू में सोडियम क्लोराइड होता है जो उसे नमकीन बनाता है। इसके अलावा इसमें प्राकृतिक कीटाणुनाशक, लाइसोजाइम एंजाइम और एंटीबाडीज होते हैं, जो आँखों को संक्रमण से बचाते हैं।


जीवन की अनिवार्यता हैं आँसू

अमेरिका के ‘टीचर रिसर्च सेन्टर’ में क्राइंग (रोना) थेरेपी पर अध्ययन कर रहे डॉ. विलियम फ्रे का कथन है कि – ‘चिकित्सा की दृष्टि से कहा जाए तो आँसू हमारे शरीर में एक प्रकार के उत्सर्जक हैं। जिस प्रकार पसीना हमारे शरीर से अत्यधिक नमक बाहर निकालता है, उसी प्रकार आँसू ‘टाक्सिन‘ (ज्वगपद) बाहर निकालते हैं। आँसू आँखों को संक्रमण से बचाते हैं। साथ ही उनमें नमी बनाए रखते हैं। यह नमी आँखों को धूल-मिट्टी और कीटाणुओं से सुरक्षित रखती है, तनाव को कम करती है और मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।

आज की जटिल एवं तनावग्रस्त जीवन पद्धति में आँसुओं की महत्ता एवं उपयोगिता के संबंध में अमेरिका के डॉ. जेम्स बॉड ने अपने कई वर्षों के अनुसंधान के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि पुरूष कभी-कभी रो लिया करें तो उनके स्वास्थ्य में काफी सुधार हो सकता है, क्योंकि मनुष्य ही एक ऐसा संवेदनशील प्राणी है जो मानसिक आघातों से त्रस्त होकर आँसू बहा सकने में समर्थ है।


दीर्घ आयु का भी कारक

रोना एक निश्छल भाव है। कई अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि जो लोग सहज भाव से रोते हैं वे अधिक स्वस्थ रहते हैं और उनका जीवन के प्रति नजरिया भी सकारात्मक रहता है। विशेषज्ञों का यहाँ तक कहना है कि रोने से दिमाग में पूर्व निर्मित नकारात्मकता आँसूओं के साथ बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर सकारात्मकता का प्रवेश होता है। अब मनोचिकित्सकों ने अनेक वर्षों के अध्ययन एवं अनुसंधान से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘हँसने की तरह रोना भी एक स्वास्थ्यवर्द्धक टॉनिक है।’

अमेरिका के एक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. विलियम ब्रियान के अनुसार अमेरिका के पुरुष से वहाँ की स्त्रियों की लम्बी आयु का रहस्य रोना ही है, क्योंकि स्त्रियाँ अपनी पीड़ा व मनोव्यथा को अक्सर आँसुओं के सहारे बाहर निकालती रहती है। डॉ. ब्रियान के कथनानुसार अमरीकी स्त्रियाँ ऐसी फिल्में देखने की बड़ी शौकीन होती है जिनमें रोना आता हो जबकि पुरुष ऐसी फिल्में कम देखते हैं। शायद रो-रो कर वे अपनी आयु बढ़ा लेती है। भारत में हृदय रोग एवं रक्तचाप से पीड़ित लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। लेकिन यह वृद्धि पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं में बहुत कम है। इसीलिए पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में दिल के दौरे के केस कम ही सुनने में आते है क्योंकि स्त्रियाँ रोने के द्वारा अपना दिल हल्का कर लेती है।


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