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हम भगवान को याद करते हैं या भगवान हमको याद करते हैं?

इस लेख की प्रेरणा मुझे मेरे बाबुजी स्व. गोपीदासजी बागडी के जीवन याद करते रहते मिली। मेरे बाबुजी गृहस्थ मे होते हुए भी अपने जीवन मे संत थे। हमारे जीवन में हम समय-समय पर भगवान के मंदिर जाते है, पूजा, हवन, जप-तप,मंत्रों का जाप आदि करते हैं। सबसे पहले हमें यह समझना जरूरी है कि हमारे मन मे भगवान की पूजा करने का विचार कैसे आता है?

हमारे शास्त्रों मे हमने सुना है और अपने जीवन मे अनुभव भी किया है कि भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। हम भगवान को याद नहीं करते बल्कि भगवान हमारा चयन करते हैं और भगवान हमको अपने पास बुलाते हैं। भगवान समय-समय पर अपने होने का व अपने अस्तित्व का अहसास अलग-अलग तरीकों से हमको कराते हैं, लेकिन हम भगवान की इच्छा के बिना भगवान के ईशारों को समझ नहीं पाते हैं।


पूजा-प्रार्थना का सही लक्ष्य

हम ट्रेन, प्लैन आदि में सफर करते हैं तब हमारा उद्देश्य सफर करना नहीं बल्कि अपने लक्ष्य (Destination) तक पहुंचना होता है उसी तरह पुजा करने का सही अर्थ भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं होती बल्कि भगवान के गुण अपनाकर अपने आप को भगवान की तरह निर्मल, सरल, सहज बनाना होता है। जब भगवान हमको सुधारना चाहते है और हमारा भविष्य अच्छा होना रहता है तब हम दिल से भगवान को याद करते हुए भगवान की ओर जाने की इच्छा होती है।

जाने अनजाने में हमारे मन मे यह विचार कई बार आते है कि क्या भगवान हमारी पूजा, प्रार्थना स्वीकार करते है? क्या हम भगवान की पूजा, प्रार्थना सही तरीकों से कर रहे हैं? क्या हमारी पुजा, जप आदि भगवान तक पहुंच रही हैं? क्या हमको हमारी पुजा का फल मिलता है?? कहीं ना कहीं हमारे दिल मे यह विचार, शिकायत आती हैं कि भगवान हमारी पूजा का उचित फल नहीं देते ?


पूजा-प्रार्थना का सही तरीका

हम भगवान की पूजा-जप-प्रार्थना को मोबाईल नेटवर्क से समझने का प्रयत्न करते हैं। हम एक छोटे से गाँव में बैठकर हजारों किलोमीटर दुर विदेश मे अपने किसी परिचित का मोबाइल नंबर लगाते हैं या ईमेल भेजते हैं। हजारों किलोमीटर दुर बैठे परिचित का मोबाईल कनेक्ट होकर बात करने के लिए सही नेटवर्क और मोबाइल नंबर सही होना जरूरी होता है, ईमेल के लिए पासवर्ड, आईडी सही होना जरूरी होता है।

भगवान की पुजा, मंत्र जप करने से पहले हमे उस भगवान के सत्गुणों को अपना जरूरी है। सही नेटवर्क अर्थात हमारा दिल, दिमाग सात्विक, निर्मल, राग, द्वेष, जलन, अहंकार मुक्त विचार, दया, करुणा होना चाहिये। हम सब अधिकतर एक मशीन की तरह भगवान को याद करते हैं और हम शरीर से भगवान की पूजा-पाठ करते हैं अर्थात हम मोबाइल नंबर डायल करते हैं।

लेकिन दिल, दिमाग में कहीं ना कहीं राग, द्वेष, अहंकार, गुस्सा, नफरत, छल, कपट, जलन व बदले की भावना रखते हैं अर्थात हमारा नेटवर्क प्रदुषित, कटा-फटा रहता है। हमें भगवान पर और अपनी प्रार्थना पर पुरा भरोसा नहीं होता है। हमारे हाथ मे माला होती हैं, जबान पर भगवान का नाम होता है लेकिन दिलों, दिमाग में दुनिया भर के विचार आते रहते हैं। हमें पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए भगवान पर पुरा विश्वास तथा एकाग्रता जरूरी होती हैं।


क्या हमारी पुजा, प्रार्थना भगवान तक पहुंच रही

भगवान हमारी पूजा को स्वीकार कर रहे हैं या हमारी पूजा-प्रार्थना भगवान तक पहुंच रही है? जानने, समझने के लिए हमे खुद का आत्मनिरिक्षण, आत्ममंथन करना जरूरी है। हमारी पूजा,जप आदि की सफलता की सबसे पहली निशानी होती है कि हमारा चरित्र अच्छा होने लगता है अर्थात हमारे दिल मे दुसरों के प्रति प्रेम, करुणा, दया की भावना जागने लगती हैं। हम दूसरों की तकलीफ, दुख-दर्द में दुखी होकर दूसरों की मदद करने की भावना आ जाती हैं।

दूसरी निशानी मे हमारा अपने आप मे आत्मविश्वास बढता है तथा हम सकारात्मक होने लगते है। हम लोगों मे अच्छाइयां देखकर सबको माफ करना शुरू करते हैं अर्थात हमारे दिल दिमाग से नफरत, बदले की भावना खत्म होने लगती हैं। धीरे-धीरे हमारे जबान पर सरस्वती बैठती हैं, हमारी वाणी मधुर हो जाती हैं, हमारे विचार पवित्र, निर्मल होने लगते है तथा हम राग, द्वेष, जलन, बदले की भावना से दुर होकर सबका भला करने की सोचने लगते हैं।


शरद गोपीदासजी बागड़ी, नागपुर


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